NL Charcha

Oct 24 2020 61 mins 247

हफ्ते भर के समाचार का समावेश| संचालन: अतुल चौरसिया https://www.newslaundry.com/hindi Click here to support Newslaundry: http://bit.ly/paytokeepnewsfree See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.





बिहार चुनाव, पार्टियों के घोषणापत्र और फ्री कोरोना वैक्सीन
Oct 24 2020 68 mins  
एनएल चर्चा के 139वें एपिसोड में बातचीत विशेष रूप से बिहार चुनावों पर केंद्रित रही. जिसमें बीजेपी समेत अन्य पार्टियों के मेनिफेस्टो की चर्चा हुई, अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों की आखिरी डिबेट, दिल्ली की बिगड़ती हुई हवा और पेरिस में पैगंबर मोहम्मद साहब के व्यंग्य चित्रों को साझा करने पर हुई टीचर की हत्या समेत कई अन्य विषयों का जिक्र हुआ.इस बार चर्चा में रेडियो नीदरलैंड के इंडिया कंसर्न, लव मैटर्स इंडिया की सोशल मीडिया ऑफिसर और लेखिका अनु शक्ति सिंह, स्तंभकार आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने चर्चा की शुरुआत बिहार चुनावों में बीजेपी द्वारा मुफ्त वैक्सीन देने की घोषणा पर आनंद से सवाल करते हुए कहा,  “जो महामारी की स्थिति है उसमें कोरोना वैक्सीन का बिहार के लोगों को फ्री देने का क्या मतलब है, जबकि पूरी दुनिया महामारी से ग्रस्त है. क्या म हामारी का चुनावी फायदा उठाना नाजायज है? यह कितना जरूरी मुद्दा है.” आनंद कहते हैं,  “मुझे लगता हैं यह अनावश्यक विवाद है. हम राजनीति मासूमियत के दौर में नहीं रह रहे हैं. पब्लिक हेल्थ से जुड़ा कोई वादा अगर किया जाता है तो वह स्टेट लिस्ट में आता है. दूसरी बात मेरा आकलन है कि बिहार के चुनावों में कोरोना उतना बड़ा मुद्दा नहीं है. एक समय था जब पलायन के चलते कोरोना का मुद्दा लोगों के जहन में था लेकिन अब वह मुद्दा नहीं दिख रहा.” आनंद के मुताबिक मुफ्त में वैक्सीन की घोषणा से अन्य राज्यों में भी एक स्पर्धा बढ़ेगी और वह भी अपने यहां इसे फ्री में देने का ऐलान कर सकते हैं. राजनीतिक  चर्चा में अनु को शामिल करते हुए अतुल कहते हैं, "अगर कोई पार्टी कहे कि हम साफ़ हवा देंगे, लेकिन हवा जैसी चीज़ पर उसका कोई हक़ नहीं है. अगर महामारी जैसी स्थिति है तो इस तरह की चीज़ों का पॉलिटिकल फायदा लेना ठीक है. अगर विपक्ष के ध्यान में यह आता तो वो ऐसा कर सकते थे, लेकिन चुनाव आयोग के कुछ दिशा निर्देश बहुत साफ़ हैं कि किन चीज़ों का इस्तेमाल आप चुनाव में कर सकते हैं और किसका नहीं. आनंद कह रहे हैं कि कोरोना वायरस चुनावीं मुद्दा ही नहीं है. क्या आपको भी ऐसा लगता है?.” इस पर अनु कहती हैं, "मैं आनंद से कुछ हद तक सहमत हूं. मुझे बीजेपी के मेनिफेस्टो का यह हिस्सा बहुत हास्यास्पद लगा. कुछ दिनों पहले ही प्रधानमंत्री ने देश के नाम संबोधन में कहा था कोरोना वैक्सीन जैसे ही आएगी, देश के हर व्यक्ति के लिए उपलब्ध होगी. क्या बिहार भारत से बाहर है कि वहां के लोगों को वैक्सीन मिलेगी और बाकी देशवासियों को नहीं. जैसा प्रधानमंत्री ने नारा दिया था कि आपदा में अवसर, वैसा ही कुछ बिहार के चुनावों में देखने को मिल रहा है.”  यहां मेघनाथ को चर्चा में शामिल करते हुए अतुल कहते हैं बिहार में रोजगार की बहुत बात की गई. आरजेडी ने कहा 10 लाख नौकरी देंगे और बीजेपी ने कहा 19 लाख रोजगार देंगे. जब लोगों ने सवाल किया कि कैसे 19 लाख रोजगार देंगे तो चालाकी दिखाते हुए उन्होंने कहा हम नौकरी नहीं  देगें, हम लोगों को स्किल डेवलपमेंट करेंगे ताकि लोग खुद ही रोजगार पाने में सक्षम हो जाएंं. 15 साल सरकार में रहने के बावजूद जब उनकी सरकार नौकरी नहीं दे पाई तो अब 19 लाख का वादा करना यानि झूठ की पराकाष्ठा है.”  इस पर मेघनाथ कहते हैं, “तेजस्वी यादव ने कहा 10 लाख सरकारी नौकरी देंगे, वहीं बीजेपी ने यह नहीं बताया की कितनी नौकरी सरकारी होगी. पार्टी ने अपने मेनिफेस्टो में 19 लाख नौकरी देने की जो बात कही वह अलग-अलग क्षेत्रों में काम देने को मिलाकर बताया गया है. सवाल यह हैं कि इतनी बढ़ी मात्रा में सरकारी कर्मचारियों की जरूरत है भी या नहीं. आरजेडी और बीजेपी के नौकरी देने के वादे पर कहीं ना कही बीजेपी का वादा ठीक लगता है. रही बात कोरोना वैक्सीन की तो, निर्मला सीतारमण ने जो बयान दिया उससे यह संकेत मिला कि वैक्सीन जब आएगी तब सबसे पहले बिहार के लोगों को दी जाएगी, इसी वजह से यह विवाद तेज   अन्य विषयों के लिए पूरी चर्चा सुनें और न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करना न भूलें.क्या देखा पढ़ा और सुना जाए.अनु शक्ति सिंहपंकज मिश्रा - ब्लैंड फनेटिक्सवैश्निक मुद्दों को पढ़ेमेघनाथशर्मिष्ठा - अनु शक्ति सिंहहाउ डेमोक्रेसी डाइ - स्टिवेन लैविटस्काय और डैनियल जिबलाटइंडियन एक्सप्रेस का एक्सप्लेनर- हैदराबाद बाढ़ पर बोराट सब्सिक्यूंट मूवीफिल्म आनंद वर्धनपोस्ट मंडल पॉलिटिक्स इन बिहार - संजय कुमार की किताब बैटल फॉर बिहार  - अरुण सिन्हा की किताब द रिपब्लिक ऑफ बिहार - अरविंद नरायण दास की किताबअतुल चौरसियाद ब्रदर्स बिहारी - संकर्षण ठाकुर मिर्जापुर सीज़न -2 See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 138: बॉलीवुड का विरोध, तनिष्क का विज्ञापन और पारले-बजाज की घोषणा
Oct 17 2020 74 mins  
एनएल चर्चा के 138वें एपिसोड में हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री द्वारा कुछ मीडिया संस्थान और पत्रकारों पर दायर मुकदमा, तनिष्क के विज्ञापन का विरोध और कर्मचारी को मिली ट्विटर पर धमकियां, पारले और बजाज द्वारा ज़हर उगलने वाले टीवी चैनलों को विज्ञापन नही देने की घोषणा और मार्च 2021 तक बांग्लादेश का जीडीपी भारत से ज्यादा होने के अनुमान पर चर्चा हुई.इस बार चर्चा में स्क्रीनराइटर और पूर्व पत्रकार अनु सिंह चौधरी और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. क्या देखा पढ़ा और सुना जाए.अनु सिंह चौधरीआर्या सीरीज़ - डिजनी हॉटस्टारजस्टिस लीला सेठ की किताब-  टॉकिंग ऑफ जस्टिस: पीपुल्स राइट्स इन मॉडर्न इंडियामिस अमेरिकाना - नेटफ्लिक्समिसेस अमेरिका - डिजनी हॉटस्टारप्रियंका दूबे की किताब - नो नेशन फॉर वुमेनमेघनाथटीआरपी स्कैम एक्सप्लेनरजॉन अलीवर पॉडकास्ट - सुप्रीम कोर्ट और बैलेट पेपररिप्लाय 1988 - कोरियन ड्रामा फिल्मएनएल टिप्पणी एपिसोड 34ps://youtu.be/-_Ps5WeAlyEअतुल चौरसियासेवन ईयर इन तिब्बत - फिल्ममुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की किताब - खोया पानी See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 137: हाथरस में अंतरराष्ट्रीय साजिश और टीआरपी रेटिंग में रिपब्लिक टीवी की धांधली
Oct 10 2020 59 mins  
एनएल चर्चा का 137वां एपिसोड कोरोना के बढ़ते मरीज, योगी सरकार द्वारा हाथरस मामले को बताया गया अंतरराष्ट्रीय साजिश, तमिलनाडु में दलित परिवारों को समाज से अलग करने, बिहार चुनाव में जेडीयू और बीजेपी के बीच सीटों का बंटवारा, केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन जैसे विषयों पर केंद्रित रहा. साथ ही मुंबई पुलिस द्वारा टीवी रेटिंग में धांधली को लेकर रिपब्लिक टीवी और दो अन्य चैनलों पर दर्ज केस भी चर्चा में बहस का विषय रहा.इस बार चर्चा में द वायर की पत्रकार इस्मत आरा और शार्दूल कात्यायन शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस ने किया. हाथरस मामले से चर्चा की शुरुआत करते हुए मेघनाथ ने इस्मत से सवाल किया, "अभी वहां पर माहौल क्या है. आप वहां कितने दिन थी. अपने वहां क्या देखा."इस्मत बताती हैं, "मैं वहां पर दो से तीन दिन के लिए थी. उस वक्त वहां पर माहौल बहुत ही तनावपूर्ण था, क्योंकि जो मैंने वहां पर देखा वो ये था कि गांव में लगभग सौ घर थे जिनमें में सिर्फ चार घर दलितों के थे, और उन लोगों के मन में एक खौफ़ बैठ गया था.” आरा कहती हैं, “वह कह रहे थे कि हम इस गांव में नहीं रह सकते, वो इस डर के साथ रह रहें हैं. जब मैं वहां थी तो मैंने ठाकुर परिवारों से भी बात की. पीड़ित परिवार के घर से सौ मीटर दूर ठाकुरों के घर में मैं बैठी थी. कुछ ठाकुरों से बात कर रही थी. मैने उनसे पूछा, “क्या हुआ था”, तो उन्होंने बताया कि हम इन सब चीजों से मतलब नहीं रखते हैं. जैसे दूध में से मक्खी निकाल दी जाती है, इ, केस से हम लोगों को ऐसे ही निकाल दिया है.”आरा के मुताबिक वहां के लोग इस मामले पर पहले बात ही नहीं करना चाह रहे थे. एक-दो दिन के बाद जब हमने उनसे फिर से बात की, तो नया नैरेटिव सामने आया जिसके मुताबिक यह रेप का नहीं बल्कि ऑनर किलिंग का मामला है. गांव वाले पहले से ही इसे मान रहे हैं.मेघनाथ ने शार्दूल को चर्चा में शामिल करते हुए पूछा, “जो अभी उत्तर प्रदेश सरकार कह रही है, कि यह अंतरराष्ट्रीय साजिश है और इस घटना के बहाने जातीय दंगे भड़काने की साजिश रची जा रही थी. इस आरोप को आप कैसे देखते हैं.”इस पर शार्दूल कहते है, "इस घटना के बारे में अब सभी लोग जानते हैं. पीड़ित के साथ, क्या व्यवहार हुआ उसे भी सब जानते हैं. इन सब के बीच सीबीआई जांच के आर्डर दिए गए और फिर इसमें अंतरराष्ट्रीय साजिश की बात बाहर आई है. पुलिस ने इस मामले में 21 एफ़आईआर दर्ज किए हैं और घटना के बाद से गांव में हर जगह पुलिस दिख रही है.”“पीड़ित के परिवार के डर, दुख की कल्पना करिए, क्योंकि हमारे यहां लोग महसूस नहीं करते है. उन्हें लगता है कि तो दूसरे के साथ हो रहा है. आप अपनी जगह सोच कर देखिए. जब आप के साथ इतना अत्याचार हुआ हो और आप पुलिस में रिपोर्ट कराए, उसके बाद पुलिस आप को ही कैद कर दे, सोचिए कैसा लगेगा,” शार्दूल ने कहा. शार्दूल साजिश के सवाल पर कहते हैं, “इस मामले में विपक्षी दल पीड़ित परिवार से मिल चुके हैं. यह केस पूरे भारत में फैल हुआ है. इसके बाद आप कहते हैं अंतरराष्ट्रीय साजिश इसका मतलब क्या है. आप को लगता है कि अंतराष्ट्रीय साजिश के लिए हाथरस जिला, जो ना तो बहुत विकसित है और ना ही राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, उस जिले के एक छोटे से गांव की एक गरीब परिवार के द्वारा अंतराराष्ट्रीय साजिश की गई."अन्य विषयों के लिए पूरी चर्चा सुने और न्यूज़लॉन्द्री को सब्सक्राइब करना ना भूलें.अन्य विषयों के लिए पूरी चर्चा सुनें और न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करना न भूलें.क्या देखा पढ़ा और सुना जाए.रेफरेंसहाथरस मामले पर बीबीसी की रिपोर्टन्यूज़लॉन्ड्री पर प्रकाशित हाथरस से ग्राउंड रिपोर्ट - पार्ट 1 और पार्ट 2 बार्क की रेटिंग पर न्यूज़लॉन्ड्री पर प्रकाशित लेखइंडिविजवल वर्सेस ग्रुप आइडेंटिटीसलाह और सुझावइस्मत आराइस्मत आरा की द वायर पर प्रकाशित रिपोर्टएड्रियन  मारी ब्राउन की किताब प्लेजर एक्टिविज्मशार्दूल कात्यायनव्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की किताब - अपनी-अपनी बीमारीरेटिंग पर न्यूज़लॉन्ड्री में प्रकाशित लेखमेघनाथबैड बॉय बिलेनियर - नेटफ्लिक्सएफसीआरए पर एक्सप्लेनरइंडिया टूडे की रिपोर्टर की फोन टैपिंग मामले पर प्रकाशित आकांक्षा की रिपोर्टन्यूसेंस का 106 एपिसोड See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 136: हाथरस की पीड़िता, बाबरी मस्जिद विध्वंस और कोरोना पॉजिटिव डोनाल्ड ट्रंप
Oct 03 2020 64 mins  
एनएल चर्चा के 136वें एपिसोड में हाथरस गैंगरेप पीडिता के साथ पुलिस की मनमानी और आनन-फानन में किया गया अंतिम संस्कार, एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर दिन होता है 87 रेप, देश में बढ़ते कोरोना के मामले, चीन द्वारा एलएसी को खारिज करना, बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सभी आरोपियों की रिहाई, और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों की पहली डिबेट के बाद राष्ट्रपति ट्रंप हुए कोरोना संक्रमित. इस बार की चर्चा में फेमिनिस्ट टास्क फ़ोर्स की ग्लोबल मेंबर बिराज स्वेन, न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन और शार्दूल कात्यायन शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. सलाह और सुझावबिराज स्वेनरफीफ जिदाह: वी टीच लाइफ सररफीफ जिदाह: शेड्स ऑफ एंगरसेबली सैमुअल का लेख- वाट शी वोर न्यूज़लॉन्ड्री पर प्रकाशित लेख - वैन मैन डू ऑल द टांकिग ऑन टीवीआनंद वर्धनएमजे अकबर की किताब- गांधी हिंदुइज्म: द स्ट्रगल अगेन्स्ट जिन्नास इस्लामशार्दूल कात्यायनपी साईनाथ का लेख - अ दलित गोज टू कोर्ट माधव आचार्य की किताब - सर्व दर्शन संग्रहअतुल चौरसियाअशोक कुमार पाण्डेय की किताब- ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 135: कृषि विधेयक और राज्यसभा में उपसभापति का रवैया
Sep 26 2020 69 mins  
एनएल चर्चा का 135वें अंक में कृषि सुधार बिल, एनसीबी द्वारा दीपिका पादुकोण को समन, रिपब्लिक टीवी के पत्रकार प्रदीप भंडारी के साथ हुई मारमीट, पूर्व क्रिकेटर डीन जोंस की आकस्मिक मौत, केंद्रीय राज्यमंत्री की कोरोना से हुई मौत और सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुधा भारद्वाज की रद्द किया गया जमानत याचिका समेत कई अन्य विषयों पर चर्चा हुई.इस बार की चर्चा में गांव कनेक्शन के असिस्टेंट एडिटर अरविंद शुक्ला, न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. सलाह और सुझावमेघनाथइनोला होम्स - नेटफ्लिक्सअनवर मक़सूद के साथ अतुल चौरसिया की बातचीत डोंट अंडर लॉर्ड - गेमआनंद वर्धनयोगेंद्र यादव की किताब मेकिंग सेन्स ऑफ इंडियन डेमोक्रेसीअरविंद शुक्लाआज भी जिंदा है Mother India के सुक्खी लाला, किसान ने बेटे के इलाज के लिए लिया कर्जा, हड़प ली पूरी जमीनअतुल चौरसियाद सोशल डिलेमा - नेटफ्लिक्सप्रताप भानु मेहता का इंडियन एक्सप्रेस पर प्रकाशित लेख See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 134: संसद सत्र से अपेक्षा और अन्य घटनाएं
Sep 19 2020 72 mins  
एनएल चर्चा का 134वां अंक संसद के मानसून सत्र में कोविड-19 के मद्देनजर किए गए बदलावों और सरकार द्वारा अध्यादेशों के जरिए लागू किए गए नए कानूनों पर केंद्रित रहा. इस दौरान सरकार की कृषि नीति से नाराज़ होकर बरवक़्त एनडीए में भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी अकाली दल ने विरोध शुरू कर दिया है, अकाली दल के कोटे से केंद्र सरकार में मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इस्तीफ़ा, भारत- चीन के बिगड़ते रिश्ते, और कृषि नीतियों के दीर्घकालिक प्रभाव का जिक्र भी हुआ. इस बार की चर्चा में खास मेहमान साकेत सूर्या जुड़े, जिनका संबंध पीआरएस लेजिस्लेटिव से है. यह संस्था, संसद की गतिविधियों और नीतियों पर शोध और विश्लेषण का काम करती है. न्यूज़लॉन्ड्री के सह संपादक शार्दुल कात्यान भी चर्चा में शामिल हुए. इस अंक का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस ने किया.सलाह और सुझाव:मेघनादअ टेकी एंड अ न्यूरोसाइंटिस्ट रिव्यु ‘द सोशल डिलेमा’फेसबुक कर्मचारी का 6600 शब्द के मेमो के खुलासेगेम - अमंग असशार्दूलकॉन्स्टिट्यूशन - भारतीय संविधान पर सीरीज़फिल्म कैफीनगेम - द एल्डर स्क्रोल्स 5 - स्कायरिम- See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 133: कंगना के घर पर बीएमसी का बुलडोजर और रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी
Sep 12 2020 86 mins  
एनएल चर्चा का 133वां अंक खास तौर पर कंगना रनौत और शिवसेना के बीच जारी जुबानी तकरार, बीएमसी द्वारा तोड़ा गया कंगना का ऑफिस और रिया चक्रवर्ती की ड्रग मामले में हुई गिरफ्तारी पर केंद्रित रहा. इसके अलावा हमने भारत चीन सीमा पर जारी तनाव के बीच एलएसी पर हुई गोलीबारी, ऑल्ट न्यूज के सह संस्थापक मोहम्मद जुबैर के खिलाफ दर्ज केस में दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दी गई राहत और बीजेपी राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी और अमित मालवीय के बीच चल रहे ट्विटर वार का भी जिक्र हुआ. इस बार की चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.सलाह और सुझाव:अजय ब्रह्मात्मजक्रैश लैंडिग आन यू - नेटफ्लिक्समेघनाथद सिग्नल सीरीज - नेटफ्लिक्सएनएल इंटरव्यू: अतुल चौरसिया और अजय लांबा की बातचीतमनीषा पांडे का रिपब्लिक टीवी के पूर्व कर्मचारियों से की गई बातचीत पर आधारित लेखजीडीपी एक्सप्लेनरशार्दूल कात्यायनहाउ टू फिक्स डेमोक्रेसी - द ईकोनॉमिस्ट पर प्रकाशित लेखब्रॉडवॉक एम्पायर - फिल्मनंदन और कादंबिनी पत्रिका बंद होने और निकाले जा रहे पत्रकार - अश्वनी सिंह की रिपोर्टअतुल चौरसियामनीषा पांडे का रिपब्लिक टीवी के पूर्व कर्मचारी तेंजिदर सिंह सोढी के साथ की गई बातचीतराशीद किदवई की किताब - ‘नेता अभिनेता’ See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 132: माइनस में जाती अर्थव्यवस्था और संसद में प्रश्नकाल का संकट
Sep 05 2020 86 mins  
एनएल चर्चा के 132वें अंक में जीडीपी में आई भयावह गिरावट, संसद में प्रश्नकाल खत्म करने को लेकर विपक्षी पार्टियों का विरोध, सुदर्शन टीवी से अमूल द्वारा विज्ञापन वापसी, फेसबुक द्वारा टी राजा सिंह का अकांउट अपने प्लेटफॉर्म से हटाना या, प्रशांत भूषण पर एक रुपए का जुर्माना आदि चर्चा का विषय रहे.इस बार की चर्चा में द वायर की बिजनेस की एडिटर मिताली मुखर्जी, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.सलाह और सुझाव:मिताली मुखर्जीद ग्रेट हैक - नेटफ्लिक्समेघनाथएडम एल्टर की किताब - इररेसिस्टिबलजीडीपी की हालात पर मिताली मुखर्जी का एक्सप्लेनरशार्दूल कात्यायननेहरू का इंटरव्यू - बीबीसी पर प्रकाशितद बॉयज: पार्ट 2 - अमेजन सीरीजअतुल चौरसियागनिंग फॉर द गॉडमैन: स्टोरी बिहाइंड आसाराम बापू कन्विक्शन - अजय लांबाजस्टिस अरूण मिश्रा पर लाइव लॉ पर प्रकाशित योगेश प्रताप सिंह का आर्टिकल See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 131: अधर में कांग्रेस का नेतृत्व और जेईई-नीट परीक्षा कराने पर अड़ी सरकार
Aug 29 2020 70 mins  
एनएल चर्चा के 131वां अंक खासतौर पर कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व पर उठे सवालों और हंगामेदार सीडब्ल्यूसी की बैठक पर केंद्रित रही. इसके अलावा जेईई-नीट परीक्षा कराने को लेकर अड़ी सरकार से छात्रों के टकराव और इसके औचित्य पर भी विस्तार से बात हुई. ब्लूम्सबरी पब्लिकेशन द्वारा दिल्ली दंगो पर आने वाली किताब का प्रकाशन स्थगित करने का निर्णय, एक्सेंचर कंपनी द्वारा भारत में 5 प्रतिशत कर्मचारियों को निकालना, जीएसटी काउंसिल की बैठक में राज्यों द्वारा हिस्सेदारी की मांग और जापानी प्रधानममंत्री शिंजो आबे के इस्तीफे का भी चर्चा में जिक्र हुआ.       इस बार की चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. इसका संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 130: फेसबुक और बीजेपी के बीच रिश्ते और प्रशांत भूषण का अवमानना केस
Aug 22 2020 84 mins  
एनएल चर्चा के 130वें अंक में वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में फेसबुक द्वारा बीजेपी के नेताओं को हेट स्पीच मामले में ढील देने का आरोप, कांग्रेस द्वारा इस मामले पर की गई जेपीसी की मांग, प्रशांत भूषण के अवमानना मामले में सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई, आमिर खान और टर्की के फर्स्ट लेडी से मुलाकात के बाद सोशल मीडिया पर हुई ट्रोलिंग, सुशांत सिंह राजपूत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दिया सीबीआई जांच का आदेश और बिहार में आई बाढ़ आदि मुद्दों पर चर्चा की गई. इस बार की चर्चा में सिटीजन फोरम फॉर सिविल लिबर्ट्रीज़ के सदस्य डॉ गोपाल कृष्ण, न्यूज़लॉन्ड्री से स्तंभकार आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. इसका संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.  See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 129: बंगलुरु हिंसा और सचिन पायलट की घर वापसी
Aug 15 2020 80 mins  
एनएल चर्चा के 129वें अंक में बेंगलुरु में हुई सांप्रदायिक हिंसा की घटना, उत्तर-पूर्वी दिल्ली में कारवां पत्रिका के पत्रकारों के साथ हुई मारपीट और सचिन पायलट की कांग्रेस पार्टी के साथ सुलहनामे पर विस्तार से बातचीत हुई. इसके अलावा लेबनान में हुए ब्लास्ट के बाद प्रधानमंत्री समेत पूरी कैबिनेट का इस्तीफा, रामजन्म भूमि तीर्थक्षेत्र के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास का कोरोना पॉजिटिव आना, केरल में दुर्घटनाग्रस्त हुआ एयर इंडिया का विमान और मशहूर शायर राहत इंदौरी के इंतकाल की घटना का जिक्र हुआ. इस बार की चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार सबा नक़वी, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. इसका संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.  See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 128: 370 समाप्ति का एक बरस और और पाकिस्तान का नया राजनीतिक नक्शा
Aug 08 2020 60 mins  
एनएल चर्चा का 128वां अंक विशेष तौर पर धारा 370 की समाप्ति के एक बरस पूरा होने और पाकिस्तान द्वारा अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी करने पर केंद्रित रहा. इसके साथ ही राममंदिर भूमिपूजन पर हुई टीवी रिपोर्टिंग, लेबनान में हुआ धमाका, भारत में हुई एक दिन में सबसे ज्यादा कोरोना मरीज़ों में बढ़ोतरी और सीबीआई द्वारा रिया चक्रवर्ती पर दर्ज किया गया केस आदि विषयों का भी जिक्र किया गया.  इस बार की चर्चा में बीबीसी के लिए पाकिस्तान-अफग़ानिस्तान से रिपोर्ट करने वाले पत्रकार सिकंदर किरमानी, दैनिक भास्कर के स्पेशल कॉरेस्पोंडेंट राहुल कोटियाल और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. इस चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 127: नई शिक्षा नीति की समीक्षा
Aug 01 2020 68 mins  
एनएल चर्चा का 127वां अंक विशेष तौर पर केंद्र सरकार द्वारा घोषित नई शिक्षा नीति 2020 पर केंद्रित रहा. साथ ही राफेल का भारत में आगमन, दिल्ली विश्वविघालय के एसोसिएट प्रोफेसर हनी बाबू की गिरफ्तारी, सुशांत सिंह राजपूत के पिता द्वारा रिया चक्रवर्ती के खिलाफ दर्ज कराए गए एफ़आईआर, दिल्ली सरकार का नया जॉब पोर्टल आदि विषयों का जिक्र हुआ. इस बार की चर्चा में आईपी यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर श्वेता सिंह, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. इस चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 126: असम, बिहार में बाढ़ और यूपी की बदहाल कानून व्यवस्था
Jul 25 2020 86 mins  
एनएल चर्चा का 126वां अंक विशेष रूप से असम और बिहार में आई बाढ़ पर केंद्रित रहा. इसके अलावा उत्तर प्रदेश तेजी से बढ़ रहे अपराध, लचर कानून व्यवस्था के अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण को जारी किया अवमानना नोटिस भी इस चर्चा के विषयों रहे.  इस बार की चर्चा में असम से स्वतंत्र पत्रकार सादिक़ नक़वी जुड़े, साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. इस चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 125: ट्रांसजेंडर कानून ड्राफ्ट और सचिन पायलट की कलाबाजी से राजस्थान में आया सियासी तूफान
Jul 18 2020 73 mins  
एनएल चर्चा के 125वें अंक में ट्रांसजेंडर कानून 2019 को लागू करने संबंधी नियमावली पर जनता से मांगा गया सुझाव, राजस्थान में जारी राजनीति रस्साकसी के बीच सामने आया गजेंद्र सिंह शेखावत का कथित ऑडियो टेप, भारत-चीन सीमा पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह का दौरा, कॉमेडियन अग्रीमा जोशवा के खिलाफ दर्ज हुआ केस और मध्यप्रदेश के गुना में किसान दंपति की पिटाई जैसे विषयों पर बातचीत हुई.इस बार की चर्चा में पीआरएस रिसर्च की अन्या भारत राम, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. इस चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 124: फिल्मी तर्ज पर हुआ विकास दुबे का एनकाउंटर
Jul 11 2020 73 mins  
एनएल चर्चा के 124वें अंक में विकास दुबे का एनकाउंटर, सीबीएसई द्वारा पाठ्यक्रम से हटाए गए सब्जेक्ट, अमेरिका आधिकारिक तौर पर डब्लूएचओ से अलग हुआ, दैनिक भास्कर के पत्रकार की आत्महत्या और ऑनलाइन एक्जाम पर बढ़ता विरोध समेत कई और विषयों पर बातचीत हुई.कतिपय कारणों से इस बार चर्चा में अतुल चौरसिया शामिल नहीं हो सके, लिहाजा चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस ने किया. इस बार की चर्चा में पूर्व आईएएस अधिकारी सूर्य प्रताप सिंह, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन भी शामिल हुए. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 123: भारत सरकार द्वारा बैन किए गए 59 चीनी ऐप्स और प्रधानमंत्री का लेह दौरा
Jul 04 2020 62 mins  
एनएल चर्चा के 123वें अंक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लेह दौरा, तमिलनाडु में पिता और बेटे की पुलिस हिरासत में हुई मौत, सीआरपीएफ एनकाउंटर के दौरान आतंकवादियों द्वारा मारे गए सिविलियन की वायरल होती तस्वीर, सीमा पर भारत और चीन के बीच जारी बातचीत, भारत द्वारा बैन किए गए 59 चीन ऐप्स, प्रसार भारती में स्थापित होने जा रही रिक्रूटमेंट बोर्ड और पीटीआई की रिपोर्टिंग पर प्रसार भारती द्वारा भेजे गए नोटिस समेत कई और विषयों पर विस्तार से बातचीत हुई.इस बार चर्चा में पॉलिसी रिसर्चर कांक्षी अग्रवाल, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़ल़ॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 122: भारतीय क्षेत्र में चीन की बढ़ती घुसपैठ और पतंजिल की कोरोना दवाई
Jun 27 2020 66 mins  
एनएल चर्चा के 122वें अंक में भीरतीय सीमा में घुसकर चीन द्वारा किया जा रहा निर्माण, महाराष्ट्र सरकार द्वारा चीनी कंपनियों को दिए गए ठेका को निरस्त करना, सुप्रीम कोर्ट द्वारा जगन्नाथ रथयात्रा को हरी झंडी और बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि द्वारा बनाई गई कोरोना की दवा की दवाई जैसे विषयों पर विस्तार से बातचीत हुई.इस बार चर्चा में एनडीटीवी इंडिया की सीनियर एडिटर और एंकर नगमा सहर, न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन और न्यूज़ल़ॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 121: चीन ने की 20 भारतीय सैनिकों की हत्या और अभिनेता सुशांत सिंह की आत्महत्या
Jun 20 2020 64 mins  
एनएल चर्चा के 121वें अंक में भारत-चीन सेना की बीच हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिकों के शहीद हो जाने की ख़बर, सुशांत सिंह की अकस्मात आत्महत्या, लॉकडाउन की शुरूआत होने के बाद से पूरे देश में करीब 55 पत्रकारों के खिलाफ दर्ज हुए मुकदमें और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों द्वारा कोरोना वायरस के इलाज के लिए डेक्सामेथासोन दवा के प्रभाव आदि विषयों पर विस्तार से बातचीत हुई. इस बार चर्चा में वरिष्ठ फिल्म समीक्षक और पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़ल़ॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 120: सामुदायिक प्रसारण का बढ़ता खतरा और एलजी ने रद्द किया दिल्ली सरकार का फैसला
Jun 13 2020 68 mins  
एनएल चर्चा के 119वें अंक में आईसीएमआर प्रमुख का कोरोना के सामुदायिक प्रसार संबंधी बयान, एलजी अनिल बैजल द्वार बदला गया दिल्ली सरकार का फैसला, दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का बढ़ते कोरोना केस को लेकर चिंता, भारत-चीन सीमा विवाद, दलित उत्पीड़न की घटनाएं और वेस्टइंडीज के क्रिकेटर डैरेनसामी का रंगभेदी बयान को लेकर भारतीय क्रिकेटरों पर लगाया गया आरोप आदि विषयों पर विस्तार से बातचीत हुई.इस बार चर्चा में गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर श्वेता सिंह, न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन और न्यूज़ल़ॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 119: भारत-चीन सीमा विवाद, तुषार मेहरा और अमेरिका में जारी विद्रोह
Jun 06 2020 57 mins  
एनएल चर्चा के 119वें अंक में महाराष्ट्र और गुजरात में आए निसर्ग तूफान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों पर किया गया हमला, भारत-चीन के बीच जारी तनाव, अमेरिकी अश्वेत नागरिक जार्ज\ फ्लायड की हत्या के बाद अमेरिका में भड़ी हिंसा आदि विषयों पर बातचीत की गई.इस बार चर्चा में प्रभात ख़बर के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख प्रकाश के रे और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 117: योगी और कांग्रेस का बस विवाद, ज़ी न्यूज़ में कोरोना और अन्य
May 23 2020 65 mins  
एनएल चर्चा के 117वें अंक में केंद्र सरकार द्वारा घोषित 20 लाख करोड़ के विशेष आर्थिक पैकेज, उत्तर प्रदेश सरकार और कांग्रेस पार्टी के बीच बस विवाद, कोरोना वायरस के बीच अम्फान तूफान की तबाही, नेपाल-भारत के बीच सीमा विवाद और रेडियो रंवाडा नरंसहार के आरोपी की पेरिस से 25 साल बाद हुई गिरफ्तारी आदि विषयों पर बातचीत की गई.इस चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.





एनएल चर्चा 113: पालघर में साधुओं की मॉब लिंचिंग और फेसबुक- रिलायंस जियो का गठबंधनharcha Episode -113
Apr 25 2020 57 mins  
चर्चा के इस एपिसोड में महाराष्ट्र के पालघर में साधुओं के साथ हुई हिंसा,कश्मीर के तीन पत्रकारों पर दर्ज हुए केस, वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत कीगिरती रैंकिंग, फेसबुक द्वारा रिलायंस जियो में किया गया निवेश और चीन केसेंट्रल बैंक का एचडीएफसी बैंक में हिस्सेदारी खरीदने के बाद एफडीआई नियमोंमें सरकार द्वारा किए गए बदलाव पर चर्चा हुई.इस बार चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार अनिंद्यो चक्रवर्ती, न्यूज़लॉन्ड्री के संवाददाताप्रतीक गोयल, शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथएस शामिल हुए. चर्चा का संलाचन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुलचौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 112: मुंबई में उमड़ा लोगों का हुजूम और अमेरिका द्वारा डब्ल्यूएचओ की फंडिग पर रोक
Apr 18 2020 59 mins  
एनएल चर्चा का यह लगातार चौथा एपिसोड है जिसमें हम कोरोना वायरस औरउससे पैदा हुई वैश्विक चुनौतियों की चर्चा कर रहे है. कोरोना वायरस के अलावाचर्चा के 112वें एपिसोड में 3 मई तक लॉकडाउन बढ़ाए जाने, मुंबई के बांद्रा स्टेशनपर जुटे हजारों की संख्या में मजदूरों और इस मामले में गिरफ्तार हुए एबीपीमाझा के पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, बांद्रा की तरह ही गुजरात के सूरत मेंइकट्ठा हुए मजूदर और डोनाल्ड ट्रंप द्वारा विश्व स्वास्थ संगठन की फंडिग पररोक लगाने आदि विषयों पर चर्चा की गई.इस बार चर्चा में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन, शार्दूल कात्यायन औरन्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संलाचनन्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 111: दो डॉक्टरों के अनुभव और एक सर्वाइवर की आपबीती
Apr 11 2020 67 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के 111वें एपिसोड में कोरोना वायरस से मरने वालों की बढ़ती संख्या, हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन दवा को लेकर ट्रंप की धमकी और कोरोना से बढ़ती बेरोजगारी आदि पहलुओं पर चर्चा हुई.इस सप्ताह चर्चा में कोरोना वायरस के इलाज और बचाव को बताने के लिए लंदन से ओवरसीज डॉक्टर एसोसिएशन की सेक्रेटरी डॉ नेहा शर्मा, एम्स पल्मोनरी मेडिसिन के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विजय हड्डा और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. डॉ नेहा शर्मा खुद कोरोना सर्वाइवर हैं. चर्चा का संचालन न्यूजलॉन्ड्री के संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 110 : तब्लीगी जमात ने कोरोना वायरस से जारी लड़ाई को किया कमजोर
Apr 04 2020 65 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के 110वें एपिसोड में हमने कोरोना वायरस के वैश्विकदुष्परिणाम, तब्लीगी जमात के दिल्ली मरकज से फैली महामारी, सुप्रीम कोर्ट मेंखबरों की स्क्रीनिंग का मसला और महामारी में मदद करने के लिए स्थापितपीएम केयर फंड आदि पहलुओं पर चर्चा की.इस सप्ताह चर्चा में एशियाविल वेबसाइट के पत्रकार अमित भारद्वाज, न्यूज़लॉन्ड्रीके साथी शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एसशामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया नेकिया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 109 : कोरोना का विश्वव्यापी संकट और 21 दिनों का लॉकडाउन
Mar 28 2020 53 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के 109वें एपिसोड में हमने दुनिया भर के लिए मुसीबत बन चुके कोरोना वायरस की महामारी पर चर्चा हुई. यह वैश्विक महामारी दिन ब दिन हजारों लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है. जिसके कारण भारत में भी 21 दिनों तक लॉकडाउन किया गया है.इस सप्ताह चर्चा में कोरोना वायरस के चिकित्सकीय पक्ष को समझाने के लिए ऑल्ट न्यूज़ की साइंस एडिटर सुमैया शेख़, न्यूज़लॉन्ड्री के साथी शार्दूल कात्यायन और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.



एनएल चर्चा 106 : कोरोना वायरस, दिल्ली दंगा और अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव
Mar 07 2020 54 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के इस एपिसोड में हमने दिल्ली समेत देश के अन्य हिस्सों में फैल रहे कोरोना वायरस और इसको लेकर फैलाए जा रहे भ्रम, दिल्ली दंगों में मरने वालो की बढ़ती संख्या, आम आदमी पार्टी के निष्कासित पार्षद ताहिर हुसैन की गिरफ्तारी, केजरीवाल सरकार द्वारा कन्हैया कुमार के खिलाफ राजद्रोह के केस की मंजूरी देने और अमेरिका में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की दावेदारी के मुद्दो पर चर्चा की. इस सप्ताह चर्चा में हिदुस्तान हिंदी के वरिष्ठ संवाददाता हेमंत राजौरा, बीबीसी हिंदी के संपादक मुकेश शर्मा और न्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाथ एस शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. चर्चा की शुरुआत अतुल ने कोरोना वायरस की फैलती हुई समस्या से किया. उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में अभी तक कुल करीब 90 हजार प्रभावित लोगों की संख्या पहुंच गई हैं. इसमें भी सर्वाधिक संख्या चीन में है. वहीं भारत में 30 प्रभावित लोगों की जानकारी मिली हैं. वायरस के मद्देनजर बहुत से स्कूल भी बंद किए गए हैं, बहुत से ऑफिस में लोगों को छुट्टियां दी जा रही हैं. अतुल पैनल से पूछते हुए कहते है कि कोरोना वायरस का अभी तक कोई इलाज नहीं है और इसका कोई खास लक्षण भी नहीं है जिससे इसे पहचाना जा सकें. क्या यही वजह है कि यह एकदम नए किस्म की बीमारी हैं? इस प्रश्न के जवाब में मुकेश शर्मा कहते हैं “कई लोग इसे जैविक हथियार से भी जोड़ कर देख रहे हैं, और लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो रहा है कि सर्दी-खांसी उनके लिए जानलेवा हो सकती है. शायद इसलिए इससे बचाव की चर्चा अधिक हो रही है क्योंकि इसका कोई टीका उपलब्ध नहीं है. जब हम ऑफिस से निकलते हैं या आते हैं तो कहा जाता है की सैनिटाइजर से हाथ धोए और यह भी बताया जा रहा है कि कैसे हाथ धोएं. इस वायरस के कारण ही होली मिलन जैसे कार्यक्रम से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री ने दूरी बना ली है और कई समाजिक संगठनों ने भी सार्वजनिक तौर पर होली ना मनाने की घोषणा की है.” अतुल ने चर्चा में हेमंत रजौरा को शामिल करते हुए पूछा, “आप ग्राउंड से रिपोर्टिंग करते हैं तो अस्पतालों और अन्य जगहों से आपके पास क्या ख़बर है. अतुल के सवाल का जवाब देते हुए हेमंत कहते हैं.” हेमंत कहते हैं, “अभी दिल्ली में कोरोना वायरस के कुल नौ मामले सामने आए हैं और देशभर में 30 मामले सामने आए हैं. जो नौ मामले सामने आए हैं वह सभी लोग सफदरगंज अस्पताल में भर्ती हैं. अस्पताल में 106 बेड का एक आईसोलेशन सेंटर बनाया गया है और इटालियन पर्यटकों को मेंदाता अस्पताल में भर्ती कराया गया है. कल जब हम एम्स के डाक्टर करण से बात कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि अभी तक की जानकारी के अनुसार हमें इतना डरने की जरुरत नहीं है क्योंकि इसका डेथ रेट तीन प्रतिशत है. चूंकि यह बहुत जल्दी फैलता है, इसलिए हमें इसके प्रिवेंशन पर ध्यान देना चाहिए.” इसके बाद अतुल ने यूपी और बिहार में इस वायरस के फैलाव पर मेघनाद से चर्चा की. मेघनाथ सभी श्रोताओं और दर्शकों को संबोधित करते हुए कहते है कि कोरोना वायरस के बारे में सबसे सही और सटीक जानकारी के लिए आप विश्व स्वास्थ संगठन (डब्ल्यूएचओ) की वेबसाइट पर जाएं क्योंकि यहीं आपको सही और विश्वसनीय जानकारी मिलेगी. इस वेबसाइट पर एक डैशबोर्ड है जहां आपको लाइव जानकारी मिल सकेगी, हर देश में कितने कोरोना वायरस के मामले है. गुरुवार को चर्चा के समय तक 95,270 केस अभी तक पूरे विश्व में दर्ज किए गए है. वहीं 3,280 लोगों की इससे मौत हो चुकी है. इस वायरस के मरीज अभी तक 79 देशों में पाए गए हैं. बाकी विषयों पर भी विस्तार से चर्चा हुई. पूरी चर्चा सुनने के लिए पॉडकास्ट सुने साथ ही न्यूजलॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और गर्व से कहें- 'मेरे खर्च पर आज़ाद हैं खबरें.' See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 105: दिल्ली के सांप्रदायिक दंगे
Feb 29 2020 53 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के 105वें संस्करण में चर्चा का मुख्य बिंदु नॉर्थ-ईस्ट दिल्लीमें भड़की साम्प्रदायिक हिंसा रही. हिंसा के दौरान दिल्ली पुलिस का बर्ताव,दिल्ली पुलिस द्वारा सीसीटीवी कैमरा तोड़ा जाना, हिंसा वाले जगहों पर शूट एटसाइट आर्डर, दंगाइयों को खुलेआम छूट आदि चर्चा का विषय रहा. साथ-साथकेजरीवाल की दिल्ली में सेना तैनात करने की मांग, कपिल मिश्रा का भड़काऊबयान, दिल्ली हाईकोर्ट के जज मुरलीधर का रातो-रात तबादला आदि पर भीचर्चा हुई. इस सप्ताह चर्चा में दिल्ली पुलिस की भूमिका के मद्देनजर मेहमान के तौरपर उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने हिस्सा लिया. इसके अलावान्यूज़लॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद भी शामिल हुए. चर्चा का संचालनन्यूजलॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत नार्थ ईस्ट दिल्ली में भड़के दंगे से करते हुए अतुल ने विक्रमसिंह से सवाल किया, जिस समय दिल्ली में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्पका दौरा चल रहा था. उनके मद्देनजर सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था भी की गई थी,पूरे शहर की सुरक्षा व्यवस्था हाई एलर्ट पर थी, इसके बावजूद इतनी संगठितहिंसा हुई जिसमें 30 से ज्यादा लोग मारे गए. ये सुरक्षा महकमे के ऊपर बहुतबड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है?इसका जवाब देते हुए विक्रम सिंह ने कहा, दिल्ली पुलिस देश की सबसेबेहतरीन पुलिस है. आप इस ट्रेंड को पीछे से देखिए. 2 नवंबर को तीस हजारीकोर्ट में पुलिस को संरक्षण नहीं मिला, इससे ज्यादा दुखदाई और कष्टपूर्ण क्याहो सकता है. इस मामले के बाद उनका मनोबल गिरा और मनोबल सभीवर्दीधारी की आत्मा होती है.अतुल ने फिर विक्रम सिंह से सवाल किया, कई ऐसे वीडियो दिखे जिसमेंपुलिस खुद हिंसा कर रही है. बदमाश उसके बगल में है और कह रहे हैं पुलिसहमारे साथ है. पिछले 4 महीनों में हमने देखा पुलिस पब्लिक प्रॉपर्टी को भीतोड़ रही है ताकि उसकी उसकी गतिविधियां कैमरे में कैद न हो. आपको नहींलगता इसकी जांच होनी चाहिए और दोषियों पर एफआईआर भी होनी चाहिए?”अतुल के ही सवाल में मेघनाद ने अपना एक सवाल जोड़ा और विक्रम सिंह सेपूछा, एक वीडियो ऐसा भी आया है जिसमें पुलिस गाड़ियों को तोड़ रही है. येतो प्राइवेट प्रॉपर्टी है. इस पर आप क्या कहेंगे?दोनों लोगों के सवालों का जवाब देते हुए अतुल कहते हैं, सामान्यतः सब ठीकरहता है. एक-दो पुलिसकर्मी भी गड़बड़ निकलते हैं तो संयम और मर्यादा टूटजाती है. पुलिस स्थिति को नियंत्रण करने के पहले कई तरह के एहतियातीउपाय करती है. इलाके के बदमाश कौन हैं? आसपास अस्पताल कहां है? ये सबपता रहता है. पुलिस का दंगा नियंत्रण न करने के बजाय खुद दंगाई बन जानाचिंताजनक है.चर्चा में पुलिसिंग के तौर तरीकों, उसकी कार्यप्रणाली, राजनीतिक दबाव आदि केऊपर विस्तार से बात हुई. पूरी बातचीत के लिए हमारा पॉडकास्ट सुनें औरन्यूजलॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और गर्व से कहें- मेरे खर्च पर आजाद हैं खबरें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 104: जामिया पुलिस लाठी चार्ज का वीडियो, ट्रंप की भारत यात्रा और अन्य
Feb 22 2020 55 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के इस भाग में हमने डोनाल्ड ट्रंप का भारत दौरे, जामिया मेंहुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा किए गए बर्बर लाठीचार्ज, ट्रंप के दौरे कोलेकर अहमदाबाद में हो रही तैयारियां पर विस्तार से चर्चा की. इसके साथ हीआम आदमी के पार्टी के विधायक द्वारा अपने विधानसभा क्षेत्र में प्रत्येकमंगलवार को सुंदरकांड पाठ के आयोजन, नरेंद्र मोदी द्वारा सीएए, एनआरसीऔर 370 पर दिया गया ताजा बयान और सुप्रीम कोर्ट का शाहीनबाग मामले मेंनियुक्त की गई दो सदस्यों की कमेटी के मसले पर भी चर्चा हुई.इस सप्ताह चर्चा में दिल्ली यूनिवर्सिटी के एकेडमिक काउंसिल की सदस्य गीताभट्ट, न्यूज़लॉन्ड्री के सीनियर एडिटर मेहराज लोन शामिल हुए. चर्चा कासंचालन कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत जामिया हिंसा से करते हुए अतुल ने गीता से सवाल किया,पुलिस ने जिस तरह से जामिया हिंसा को लेकर दावा किया था और साउथईस्ट दिल्ली के डीसीपी चिन्मय बिस्वाल, जिनका बाद में चुनाव आयोग नेट्रांसफर भी कर दिया था, उनका कहना था कि कैंपस में कोई टीयर गैस नहींछोड़ी गई, पुलिस कैंपस में नहीं घुसी, लाठीचार्ज भी नहीं हुआ. इन सब के बादजो वीडियो सामने आया है ये कई सवाल खड़े करते हैं. आपकी इस पर क्याराय है?अतुल के सवाल का जवाब देते हुए गीता कहती हैं, देखिये पहली बात तो ये हैकि जब भी कोई प्रदर्शन निकलता है अगर वो कहीं भी किसी तरह से हिंसकहोता है, वहां पत्थरबाजी और मारपीट होती है या बस जलाई जाती हैं तो हिंसाकी रिपॉन्स पुलिस द्वारा ऐसा ही रहता है. ये बात तो साफ है कि उपद्रवीकैंपस के अंदर घुस गए थे और भीतर से भी पत्थरबाजी हुई थी. वीडियो भीदोनों तरह के सामने आए हैं. लेकिन जो लोग अंदर मुंह पर कपड़ा बांध कर पढ़रहे, ऐसे तो कोई नहीं पढ़ता है.इसपर अतुल गीता को जवाब देते हैं, इसका एक और वर्जन है कि बाहर टीयरगैस छोड़ी जा रही थी तो हो सकता है छात्र इसलिए कपड़े बांध रखे हो? इसकेबाद अतुल ने मेहराज से सवाल किया, वीडियो आने के बाद पुलिस की रवैयादेखने के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?मेहराज कहते हैं, पुलिस ने जो जामिया में किया है वहीं चीजें जेएनयू औरअलीगढ़ में भी हुई हैं. चलिए मान लेते हैं कि जामिया में बाहर के लोग घुसेहुए थे. लेकिन पुलिस का प्रोसीजर पहले जांच करने का, लोगों को पहचानने काहोता है. एक तरफ छात्र हैं दूसरे तरफ स्टेट की ताकत है और उनके हाथ मेंबंदूकें हैं, ऐसे में फिर दोनों में फर्क क्या रहा और हर जगह पर ऐसे ही क्यों होरहा है? इस देश में जवाबदेही की रवायत कभी भी नहीं रही है. आम आदमी केपास कोई भी शक्ति नहीं है.बाकी विषयों पर भी विस्तार से तथ्यपरक चर्चा हुई. पूरी चर्चा सुनने के लिएपॉडकास्ट सुने साथ ही न्यूजलॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और गर्व से कहें- मेरेखर्च पर आज़ाद हैं खबरें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 103: दिल्ली चुनाव, अरविंद केजरीवाल, अमित शाह
Feb 15 2020 58 mins  
न्यूजलॉन्ड्री चर्चा का 103वां संस्करण दिल्ली चुनावों के इर्द-गिर्द सिमटा रहा. इसके तहत आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत, नार्थ-ईस्ट दिल्ली में सबसे ज्यादा हुए मतदान का कारण, भाजपा नेताओं की उग्र और नफरत भरी बयानबाजी, बीजेपी के बड़े नेताओं का दिल्ली में हुए प्रचार का प्रभाव आदि विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई. इस सप्ताह चर्चा में राजनीतिक विश्लेषक ममता कालिया, न्यूजलान्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन, न्यूजलॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद एस शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 102: केंद्रीय बजट, दिल्ली चुनाव, हनुमान चालीसा और अन्य
Feb 08 2020 79 mins  
न्यूजलॉन्ड्री चर्चा के 102वें संस्करण में केंद्रीय बजट 2020-21, दिल्ली चुनाव में घोषित तीनों बड़ी पार्टियों के चुनावी घोषणापत्र, शाहीन बाग के प्रदर्शन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टिप्पणी, अरविंद केजरीवाल का हनुमान चालीसा पाठ, दिल्ली पुलिस द्वारा शाहीन बाग़ में फायरिंग करने वाले शख्स का आम आदमी पार्टी से जुड़े होने का फ़ोटो जारी करना, उक्त पुलिस अधिकारी पर चुनाव आयोग द्वारा की गई कारवाई और कोरोना वायरस जैसे मुद्दे चर्चा का विषय रहे.इस सप्ताह चर्चा में पीआरएस की रिसर्चर प्राची मिश्रा, प्रसार भारती बोर्ड के सलाहकार ज्ञानेंद्र भरथरिया और न्यूजलॉन्ड्री के एसोसिएट एडिटर मेघनाद शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूजलॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 101: नीतीश कुमार, दिल्ली चुनाव, कुणाल कामरा और अन्य
Feb 01 2020 83 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के 101वें संस्करण में चर्चा का मुख्य विषय रहा स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा चीन में कोरोना वायरस के चलते पैदा हुई आपात स्थिति पर जारी की गई सलाह, स्टैंड अप कॉमेडियन कुणाल कामरा द्वारा अर्नब गोस्वामी की खिंचाई के बाद उड्डयन कंपनियों द्वारा उन्हें एकतरफा उड़ान से प्रतिबंधित करना, बीजेपी के केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा द्वारा दिया गया आपत्तिजनक सांप्रदायिक बयान और उसके चलते चुनाव आयोग की कर्रवाई, शरजील इमाम पर देशद्रोह का मामला और प्रशांत किशोर और पवन कुमार की जेडीयू से बर्खास्तगी.इस सप्ताह चर्चा में बीबीसी मराठी के संपादक आशीष दीक्षित, वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी और न्यूज़लॉन्ड्री के सोशल मीडिया एडिटर मेघनाद चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 100: जेपी नड्डा, सीएए, दिल्ली विधानसभा चुनाव और अन्य
Jan 25 2020 65 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा पॉडकास्ट का यह 100 वां संस्करण है. चर्चा को प्यार देने के लिए सभी श्रोताओं को शुक्रिया. न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और गर्व से कहें- ‘मेरे खर्च पर आज़ाद हैं ख़बरें.’चर्चा के 100 वें संस्करण में वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ख़ास मेहमान रहे. इसके अलावा इस हफ़्ते की चर्चा में हिंदी साहित्यकार वंदना राग और न्यूज़लॉन्ड्री के मेघनाद शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के इस 100 वें संस्करण में बीजेपी के नए अध्यक्ष जेपी नड्डा की ताजपोशी और उनके आने के बाद पार्टी में आने वाले संभावित बदलावों, दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए नामांकन के दौरान अरविन्द केजरीवाल को हुई परेशानी, दिल्ली पुलिस को दिल्ली के गवर्नर द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत दिया गया गिरफ्तारी का विशेषाधिकार, बीजेपी की लखनऊ में हुई रैली में अमित शाह का सीएए की वापसी के संबंध में बरकरार अड़ियल रवैया, जेएनयू के सर्वर रूम में मारपीट के संबंध में आरटीआई के तहत मिली चौंकाने वाली जानकारी और निर्भया मामले में वकील इंदिरा जयसिंह के बयान पर मचे बवाल आदि पर चर्चा हुई. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 94: सीएए, एनआरसी, नागरिकता और अन्य
Jan 18 2020 6 mins  
चर्चा के 94 वें संस्करण में बातचीत मुख्यत: नागरिकता कानून संशोधन अधिनियम के इर्द-गिर्द घूमती रही. इस कानून को लेकर पूरे देश में विरोध की स्थिति पैदा हो गई है. विश्वविद्यालयों में विरोध चल रहा है. शहरों में विरोध चल रहे हैं. इसे अलावा दिल्ली के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन और आगजनी की घटनाएं हुई हैं. जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस द्वारा छात्रों पर जबर्दस्त बल प्रयोग की घटना सामने आई. इसी तरह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी पुलिस के बल प्रयोग की बात सामने आई है. असम में जहां से इस कानून की विरोध की शुरुआत हुई थी और पूर्वोतर के अन्य राज्यों में विरोध का सुर धीरे धीरे कम होने लगा है. लेकिन देश के दूसरे हिस्से में विरोध तेज हो गया है. ज्यादातर जगहों पर आंदोलन अहिंसक रहे है लेकिन कुछ जगहों से हिंसा की खबरें भी सामने आई हैं. इस सप्ताह चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अजीत अंजुम के साथ चर्चा की शुरुआत करते अतुल ने पूछा कि सरकार ये सफाई दे रही है कि नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी ये दोनों अलग अलग चीजें है. विपक्षी इसको एक साथ मिलाकर लोगों को भरमा रहे हैं. आपकी का राय है? सरकार जो कह रही है वो सही है या इसकी आड़ में सरकार कुछ छुपा रही है? इस पर अजीत अंजुम ने कहा, “एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानून अलग-अलग तो हैं, इसमें कोई शक़ नहीं है. लेकिन संसद में अपने भाषण में अमित शाह ने कहा कि पहले पर सीएबी लाएंगे और उसके बाद ध्यान से सुनना भाईयों हम एनआरसी भी लाएंगे. एनआरसी केवल असम में नहीं देश के बाकी हिस्सों में भी लाएंगे. आप नागरिकता कानून जो लाए है उसमें छह धर्मों को शामिल किया. सिर्फ एक धर्म को छोड़कर. आज चेतन भगत ने सीएए को लाइफ जैकेट कहा है. यानी जब एनआरसी आयेगा तो यह कुछ लोगों के लिए लाइफ जैकेट का काम करेगा. इस सबको एक साथ देखें तो बेहद खतरनाक स्थिति की तरफ देश को ले जाया जा रहा है. बहुलतावादी ये देश है. उस देश में अचानक ऐसी चीज की क्या ज़रूरत थी. इसके खतरे बहुत बड़े है आने वाले समय में."इसी पर अपनी बात रखते हुए आंनद वर्धन कहते हैं, “पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश, इन तीनों देशों में मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं. तो वहां के लिए तो सीएए ठीक है. लेकिन एनआरसी के साथ व्यवहारिकता की समस्या है. नौकरशाही इतनी सक्षम नहीं है कि इतने बड़े देश में सबकी नागरिकता संबंधी कोई सफल व्यवस्था कर सके. खासकर भारतीयों में दस्तावेजों की जो स्थिति है. उसे लागू करने में चुस्ती दिखानी होगी. नहीं तो छोटी-छोटी वजहों से लोग नागरिकता खो सकते हैं.” इस पूरे विवाद को लेकर गर्मागरम, दिलचस्प और तथ्यपरक चर्चा हुई. पूरी चर्चा सुनने के लिए पूरा पॉडकास्ट सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 95: सीएए, एनआरसी, नागरिकता और अन्य
Jan 18 2020 48 mins  
चर्चा के 94 वें संस्करण में बातचीत मुख्यत: नागरिकता कानून संशोधनअधिनियम के इर्द-गिर्द घूमती रही. इस कानून को लेकर पूरे देश में विरोध कीस्थिति पैदा हो गई है. विश्वविद्यालयों में विरोध चल रहा है. शहरों में विरोधचल रहे हैं. इसे अलावा दिल्ली के कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन और आगजनीकी घटनाएं हुई हैं. जामिया मिल्लिया इस्लामिया में पुलिस द्वारा छात्रों परजबर्दस्त बल प्रयोग की घटना सामने आई. इसी तरह अलीगढ़ मुस्लिमयूनिवर्सिटी में भी पुलिस के बल प्रयोग की बात सामने आई है. असम में जहांसे इस कानून की विरोध की शुरुआत हुई थी और पूर्वोतर के अन्य राज्यों मेंविरोध का सुर धीरे धीरे कम होने लगा है. लेकिन देश के दूसरे हिस्से में विरोधतेज हो गया है. ज्यादातर जगहों पर आंदोलन अहिंसक रहे है लेकिन कुछजगहों से हिंसा की खबरें भी सामने आई हैं.इस सप्ताह चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकारआनंद वर्धन शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादकअतुल चौरसिया ने किया.अजीत अंजुम के साथ चर्चा की शुरुआत करते अतुल ने पूछा कि सरकार येसफाई दे रही है कि नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी ये दोनों अलगअलग चीजें है. विपक्षी इसको एक साथ मिलाकर लोगों को भरमा रहे हैं.आपकी का राय है? सरकार जो कह रही है वो सही है या इसकी आड़ में सरकारकुछ छुपा रही है?इस पर अजीत अंजुम ने कहा, “एनआरसी और नागरिकता संशोधन कानूनअलग-अलग तो हैं, इसमें कोई शक़ नहीं है. लेकिन संसद में अपने भाषण मेंअमित शाह ने कहा कि पहले पर सीएबी लाएंगे और उसके बाद ध्यान सेसुनना भाईयों हम एनआरसी भी लाएंगे. एनआरसी केवल असम में नहीं देश केबाकी हिस्सों में भी लाएंगे. आप नागरिकता कानून जो लाए है उसमें छह धर्मोंको शामिल किया. सिर्फ एक धर्म को छोड़कर. आज चेतन भगत ने सीएए कोलाइफ जैकेट कहा है. यानी जब एनआरसी आयेगा तो यह कुछ लोगों के लिएलाइफ जैकेट का काम करेगा. इस सबको एक साथ देखें तो बेहद खतरनाकस्थिति की तरफ देश को ले जाया जा रहा है. बहुलतावादी ये देश है. उस देशमें अचानक ऐसी चीज की क्या ज़रूरत थी. इसके खतरे बहुत बड़े है आने वालेसमय में."इसी पर अपनी बात रखते हुए आंनद वर्धन कहते हैं, “पाकिस्तान, अफगानिस्तानऔर बांग्लादेश, इन तीनों देशों में मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं. तो वहां केलिए तो सीएए ठीक है. लेकिन एनआरसी के साथ व्यवहारिकता की समस्या है.नौकरशाही इतनी सक्षम नहीं है कि इतने बड़े देश में सबकी नागरिकता संबंधीकोई सफल व्यवस्था कर सके. खासकर भारतीयों में दस्तावेजों की जो स्थितिहै. उसे लागू करने में चुस्ती दिखानी होगी. नहीं तो छोटी-छोटी वजहों से लोगनागरिकता खो सकते हैं.”इस पूरे विवाद को लेकर गर्मागरम, दिलचस्प और तथ्यपरक चर्चा हुई. पूरी चर्चासुनने के लिए पूरा पॉडकास्ट सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 96: एनपीआर, पुलिस की हिंसा, झारखंड चुनाव और अन्य
Jan 18 2020 47 mins  
इस सप्ताह चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्म निर्माता विनोद कापड़ी और झारखंड चुनाव की कवरेज करके लौटे द क्विंट के संवाददाता शादाब मोइज़ी बतौर मेहमान शामिल हुए. साथ में पश्चिमी उत्तर प्रदेश का दौरा कर रहे न्यूज़लॉन्ड्री के संवाददाता आयुष तिवारी और बसंत कुमार ने सीधे ग्राउंड से जानकारियां दी. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत बसंत कुमार और आयुष तिवारी से उत्तर प्रदेश के वर्तमान हालात का जायजा लेते हुएअतुल चौरसिया ने शुरू की. इसी सन्दर्भ में विनोद कापड़ी से सवाल करते हुए अतुल ने पूछा, “यूपी में पुलिस का जो साम्प्रदायिक रूप निकल कर सामने आया है उसे आप किस प्रकार से देखते हैं?”इस पूरे विवाद में एनपीए औऱ एनआरसी के पक्ष पर भी काफी विस्तार से चर्चा हुई. साथ में झारखंड चुनाव के नतीजों पर भी दिलचस्प और तथ्यपरक विश्लेषण हुआ. इस पूरी चर्चा को सुनने के लिए पूरा पॉडकास्ट सुनें. और हां न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और गर्व से कहें- ‘मेरे खर्च पर आज़ाद हैं ख़बरें.’ See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 97: नृत्य गोपालदास, दिनेंद्र दास के साथ साक्षात्कार
Jan 18 2020 30 mins  
9 नवम्बर को बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद न्यूज़लॉन्ड्री ने इस विवाद से जुड़े तमाम क़ानूनी पक्षकारों के साथ साक्षात्कार की श्रृंखला शुरू की है. इसके तहत हम हिन्दू पक्ष और मुस्लिम पक्ष के तमाम पैरोकारों की राय को आपके सामने ला रहे है.निर्मोही अखाड़ा रामजन्मभूमि विवादित स्थल का सबसे पुराना दावेदार रहा है. इसी तरह श्री राम जन्मभूमि न्यास का इस विवाद से सीधा रिश्ता रहा है. चर्चा में इस हफ्ते निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेंद्र दास और श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास से हुई बातचीत पेश है.महंत दिनेंद्र दास का कहना है 9 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया वो भगवान राम के नाम पर आया है और यह अच्छा रहा. इसलिए उनको यह फैसला मंज़ूर है.न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने दिनेंद्र दास से पूछा, “हाल ही में एक ऑडियो क्लिप सामने आया है जिसमें बीजेपी के पूर्व सांसद रामविलास वेदान्ती भी राम मंदिर निर्माण के लिए बनायी जाने वाली कमेटी में शामिल होने की इच्छा जता रहे हैं. और भी तमाम लोग है जो इसमें शामिल होना चाहते हैं, क्या अब यह बड़ी सत्ता और पैसे से जुड़ा मामला हो गया है इसीलिए इसमें सब अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं?”इसका जवाब देते हुए दिनेंद्र दास कहते हैं, “निर्मोही अखाड़ा कोर्ट में रामजन्मभूमि का पक्षकार रहा है. तो जहां तक अयोध्या बैठक का मामला है हमें उचित पक्ष मिल ही जाएगा.”1885 से 1992 तक निर्मोही अखाड़ा वहां पूजा पाठ करता था यह दस्तावेज़ों में भी दर्ज है. 1992 में रिसीवर की नियुक्ति के बाद से वहां सतेन्द्र दास पूजा-पाठ का काम देखते हैं.इस सन्दर्भ में अतुल महंत से सवाल पूछते हैं कि, पूजा पाठ जो निर्मोही अखाड़ा करता था क्या आप उसपर दावा पेश करेंगे?”इस सवाल का जवाब देते हुए महंत दिनेंद्र दास कहते हैं, “नहीं हम दावा तो नहीं करेंगे. लेकिन निर्मोही अखाड़ा वहां अनादिकाल से पूजा करता आ रहा था. हम लोगों का हमेशा से सौभाग्य रहा वहां पूजा पाठ करने का. इस लिहाज़ से वो पद हमे मिलना चाहिए. हमारा लक्ष्मीजी से कोई प्रेम नहीं है. हमे राम-राम ही पढ़ना है. इतना ही हमारे लिए काफी है.”इस तरह महंत नृत्य गोपाल दास के साथ भी राम जन्मभूमि से जुड़े कई सारे रोचक पहलुओं पर बात हुई. इस पूरी चर्चा को सुनने के लिए पूरा पॉडकास्ट सुनें. और न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और गर्व से कहें- ‘मेरे खर्च पर आज़ाद हैं ख़बरें.’ See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 98: जेएनयू हिंसा, अमेरिका-ईरान तनाव और अन्य
Jan 18 2020 47 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के इस संस्करण में मुख्यतः चर्चा का विषय रहा पिछले रविवार को जेएनयू में हुई हिंसा, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका और ईरान के बीच पैदा हुआ तनाव, पाकिस्तान के ननकाना साहिब गुरुद्वारे पर हुई पत्थरबाजी और आगामी दिल्ली चुनाव. बीते रविवार की शाम तक़रीबन 50-60 की संख्या में नकाबपोश हमलावरों ने जेएनयू कैंपस में घुस कर छात्रों, अध्यापकों एवं कर्मचारियों के साथ बेरहमी से मारपीट की. इस हिंसा में जेएनयूएसयू की अध्यक्ष आइशी घोष समेत 36 लोगों को गंभीर चोट लगी है. आइशी के सर पर 16 टांके लगे हैं. दिल्ली पुलिस ने यह मामला क्राइम ब्रांच को सौंप दिया है.इस बीच चुनाव आयोग ने दिल्ली में विधानसभा चुनाव की घोषणा कर दी है. फ़रवरी 8, 2019 को दिल्ली में मतदान होगा और परिणामों की घोषणा 11 फ़रवरी को होगी. बीते शुक्रवार को इराक में अमरीकी ड्रोन हमले में ईरान के सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत होने के बाद से अमेरिका और इरान के बीच तनाव और गहराता दिख रहा है. पिछले हफ्ते पाकिस्तान स्तिथ ननकाना साहिब पर भी कुछ लोगों के समूह ने पत्थरबाज़ी की. उस समूह का नेतृत्व करने वाले इमरान नामक व्यक्ति ने धमकी दी थी की हम ननकाना साहिब का नाम बदल कर गुलाम-ए-मुस्तफा कर देंगे.इस सप्ताह चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार मयंक मिश्रा और द वायर की सलाहकार संपादक अरफ़ा ख़ानम शेरवानी बतौर मेहमान शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल ने मयंक मिश्र से जेएनयू में हुई हिंसा पर सवाल करते हुए शुरू की कि, “जिस तरह से जेएनयू में हमले को अंजाम दिया गया, बहुत सारे हथियारबंद लोग कैंपस में घुस गए, पुलिस गेट के बाहर खड़ा रहकर उनको बाहर जाते देखती रही, पूरे इलाके में बिजली काट कर अंधेरी किया गया, पत्रकारों को पुलिस के सामने पीटा गया लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी रही. यह सब एक सुनियोजित साजिश का इशारा करता है. मयंक आप पुलिस और प्रसाशन की इस भूमिका को किस तरह देखते हैं?”मयंक ने अपने जवाब में कहा, “मेरा एक ही इमोशन है जिसे में एक ही शब्द में कहूंगा शर्म, मुझे शर्म आती है. जेएनयू में जो कुछ भी हुआ उसे शर्मनाक के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता. अगर कोई लड़का या लड़की बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा के किसी गांव में जेएनयू या डीयू में पढ़ने का सपना देख रहा होगा तो उसके सपने मिट्टी में मिल गए होंगे. दूरदराज के परिजन इस भयावह नजारे के बाद अफने बच्चों को जेएनयू में भेजने से डरेंगे. अगर दिल्ली में विश्वविद्यालय सुरक्षित नही हैं तो सोचिये की लाखों बच्चों का क्या होगा.”इस मसले पर अपनी टिप्पणी करते हुए अरफा खानम शेरवानी ने दिल्ली पुलिस पर तंज कसा, “जेएनयू में जो हुआ उसे समझने के लिए कोई राकेट साइंटिस्ट होने की ज़रुरत नहीं है. हो सकता है पुलिस को न पता हो की हमलावर कौन थे. जिन्होंने नकाब पहना था, उनका नकाब क्यों नही उतारा गया. लेकिन उनके नकाब अब उतर चुके हैं. जो लोग नकाब पहने थे उनके नकाब काले ज़रूर नज़र आ रहे थे लेकिन वो भगवा नकाब थे.”पूरी चर्चा का मुख्य बिंदु जेएनयू हिंसा बना रहा साथ में ईरान अमेरिका तनाव का भारत पर किस रूप से प्रभाव पड़ेगा इस पर विस्तार से चर्चा हुई. पाकिस्तान में ननकाना साहिब पर पत्थरबाज़ी से जो नया विवाद उत्पन्न हुआ है उस पर भी पैनलिस्टों ने अपने अपने विचार रखे.इस पूरी चर्चा को सुनने के लिए पूरा पॉडकास्ट सुनें. और हां न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और गर्व से कहें- ‘मेरे खर्च पर आज़ाद हैं ख़बरें.’ See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 99: देविंदर सिंह, शाहीन बाग, चंद्रशेखर आजाद और अन्य
Jan 18 2020 55 mins  
न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के 99वें संस्करण में चर्चा का मुख्य विषय रहा जम्मू कश्मीर पुलिस द्वारा अपने ही एक डिप्टी एसपी देविंदर सिंह की तीन आतंकियों के साथ गिरफ्तारी. इसके अलावा जेएनयू हिंसा से जुड़े मामले पर इंडिया टुडे का स्टिंग ऑपरेशन और हिंसा की योजना बनाने के लिए इस्तेमाल में लाया गया व्हाट्सएप ग्रुप पर न्यायालय द्वारा जांच का फैसला, भीम आर्मी के चीफ चंद्रशेखर आज़ाद की ज़मानत के मामले पर कोर्ट द्वारा विपक्ष के वकील को लगाई गई फटकार, दिल्ली के शाहीन बाग़ में जारी महिलाओं का विरोध प्रदर्शन आदि.इस सप्ताह चर्चा में स्वतंत्र पत्रकार राहुल कोटियाल और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल ने देविंदर सिंह की गिरफ्तारी के मसले से की. उन्होंने पूछा कि, “देविन्दर सिंह को लेकर मिली-जुली जानकारियां सामने आ रही है. जिस तरह से पुलिस ने उन्हें पकड़ा उससे ऐसा लग रहा है कि कोई पुलिस वाला भ्रष्ट होकर आतंकियों से जा मिला. लेकिन इस मामले में बात यहां तक सीमित नहीं लगती. लोग मान रहे हैं कि इस मामले में और भी कुछ चीज़ें चल रहीं थी. क्या लगता है देविंदर सिंह का मामला सिर्फ़ एक भ्रष्ट पुलिस वाले का मामला है या यह उससे आगे की बात है?”इस सवाल के जवाब में राहुल कहते हैं, “नहीं, यह उससे कहीं आगे की बात है. क्योंकि भारत में जहां भी हमारी खुफिया एजेंसियां सबसे ज्यादा सक्रिय है, जहां सबसे ज्यादा आर्मी की तैनाती है कश्मीर उन स्थानों में से एक है. ऐसी स्थिति में इतनी बड़ी चूक हो जाना बिलकुल हल्के में नहीं ली जा सकती. दूसरी बात देविंदर सिंह की जहां तैनाती थी वो अपने आप में महत्वपूर्ण है. उनकी तैनाती हवाई अड्डे के “एंटी हाइजैक यूनिट” में थी जहां से उनकी गिरफ्तारी हुई.”राहुल पुलवामा में आतंकी हमले और कश्मीर से 370 हटाए जाने के बाद से वहां के लोगो में जिस तरह के भाव हैं, वहां जिस तरह के खतरे हैं और घुसपैठ की जितनी बातें आ रही हैं उन पर चिंता जताते हुए आगे अपनी बात रखते हैं, “इतना सब कुछ होने के बाद ये मामला कितने गंभीर सवाल खड़े करता है. हवाई अड्डे पर “एंटी हाईजैक यूनिट” में आतंकियों का कोई आदमी सीधे-सीधे मौजूद है, उसका कितना बुरा अंजाम हो सकता था इसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है.”अतुल ने देविंदर सिंह से जुड़े मामले पर ही बीबीसी की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए आनंद की टिप्पणी ली, “बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार जिस डीआईजी के सामने देविन्द्र सिंह की गिरफ्तारी हुई उसके सामने देविंदर सिंह ने पहला बयान दिया कि ‘सर यह एक बड़ा गेम है, आप इस गेम को खराब मत कीजिए’ तो आनंद आपको क्या लगता है ये केवल पुलिस सिस्टम में रहकर उसका ही फायदा उठा रहा था या उससे भी आगे कि चीज़ है जिसमें डीप स्टेट भी शामिल हो सकता है?”आनंद जवाब देते हुए कहते हैं, “डीप स्टेट दो तरीके का हो सकता है जो आतंकवादी नेटवर्क है, जिसमें प्रॉक्सी वॉर भी शामिल है उसका भी अपना डीप स्टेट होता है. बीबीसी की रिपोर्ट कितनी विश्वसनीय है या खुद देविंदर सिंह अपने बयान पर कब तक कायम रहते हैं इस पर तो मैं कुछ नहीं कह सकता. लेकिन यह ज़रूर हो सकता है कि पुलिस महकमे में ऐसे और भी लोग शामिल हों. क्योंकि डीएसपी बहुत बड़ी पोस्ट नहीं है पुलिस विभाग में. यह माध्यम दर्जे की पोस्ट है. हो सकता है वो अपने बयान के ज़रिये ये इशारा कर रहे हों कि जम्मू कश्मीर में ऐसे और भी कई बड़े अधिकारी शामिल हो सकते हैं जो पैसे या किसी और लालच में ऐसा करते हों.”इसी तरह अन्य विषयों पर भी पैनलिस्टों ने अपने-अपने विचार रखे.इस पूरी चर्चा को सुनने के लिए पूरा पॉडकास्ट सुनें. न्यूज़लॉन्ड्री को सब्सक्राइब करें और गर्व से कहें- ‘मेरे खर्च पर आज़ाद हैं ख़बरें.’ See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 93: अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका की तैयारी
Dec 07 2019 29 mins  
इस बार चर्चा में अतुल चौरसिया ने बाबरी मस्जिद-रामजन्म भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले और उसपर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा पुनर्विचार याचिका दायर करने की तैयारी को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सचिव ज़फ़रयाब जिलानी से बातचीत की है.ज़फ़रयाब जिलानी वो पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने इस मामले में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने की बात कही थी. हालांकि अभी तक ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अपनी तरफ से पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं की है. उम्मीद है कि अगले कुछ दिनों में वो अपनी याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करेगा.इस बीच मुस्लिम पक्ष की तरफ से एक अन्य पुनर्विचार याचिका जमीयत उलेमा ए हिंद के सदर अरशद मदनी की तरफ अधिवक्ता अरशद रशीदी ने दाखिल कर दिया है.ज़फ़रयाब जिलानी का कहना है, ‘‘हम इस मामले में कोर्ट के सामने कोई नया तथ्य या कोई नया सबूत नहीं रखने वाले है. हम कोर्ट के फैसले में जो विसंगतियां हैं या फिर जिनकी ठीक से व्याख्या नहीं की गई है उसपर सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार करने के लिए कहेंगे. हमारा मानना है कि इस फैसले में कई ऐसी बातें हैं जो मूल फैसले से विरोधाभास पैदा करती हैं.’’ See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 92 : महाराष्ट्र में नई सरकार, प्रज्ञा ठाकुर का बयान और अन्य
Nov 30 2019 45 mins  
चर्चा के 92वें संस्करण में कई महत्वपूर्ण घटनाओं पर बहस हुई. ज्यादातर राजनीतिक घटनाक्रम ही देखने को मिला. महाराष्ट्र में चल रहा राजनीतिक घटनाक्रम इस सप्ताह थमता नजर आ रहा है लेकिन वहां कई सारे उतार चढ़ाव देखने को मिले. मसलन आधी रात को राष्ट्रपति शासन हटा दिया गया. उसके बाद सुबह-सुबह देवेन्द्र फडणवीस की ताजपोशी हुई. उन्हें फिर से मुख्यमंत्री बना दिया गया. फिर तीन दिन बाद उनका इस्तीफा हुआ. अब जो सूरत है उसमें तीन बड़ी पार्टियां एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना मिलकर सरकार बना चुकी हैं. यह पहली बार होगा जब ठाकरे परिवार से कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बनेगा. इसके अलावा अजित पवार जो कि शरद पवार के भतीजे हैं, उन्होंने जिस तरह अपने परिवार के खिलाफ पाला बदला और फिर वापस शरद पवार के खेमे में आ गए उसने भी कई तरह के सवालों को जन्म दिया है. बीते सप्ताह लोकसभा के सत्र के दौरान भोपाल की सांसद मालेगांव विस्फोट की अभियुक्त प्रज्ञा ठाकुर पर एक बार फिर नाथूराम गोडसे को देश भक्त बताने का आरोप लगा. इससे एक राजनीतिक विवाद की स्थिति पैदा हो गई. इसके अलावा एक और बड़ी घटना इलेक्टोरल बांड को लेकर हुई. आपने हिंदी में न्यूज़लॉन्ड्री पर छह हिस्सों की श्रृंखला में पढ़ा कि किस तरह से मनमाने ढंग से इलेक्टोरल बॉन्ड की व्यवस्था लागू हुई. इस पूरी सीरिज़ को लेकर अब कई सारी चीजें हमारे सामने है. मसलन प्रधानमंत्री और रेलमंत्री पियूष गोयल का बयान हमारे सामने है. इस सप्ताह चर्चा में लेखक शांतनु गुप्ता और वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार शामिल हुए. चर्चा का संचालन ल्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 91: इलेक्टोरल बॉन्ड, जेएनयू, बीएचयू और अन्य
Nov 23 2019 55 mins  
इस सप्ताह की एनएल चर्चा में जेएनयू में छात्रों का फीस वृद्धि को लेकर चल रहा आंदोलन प्रमुखता से छाया रहा. इसके अलावा बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में छात्रों के एक गुट द्वारा एक मुस्लिम प्रोफेसर की नियुक्ति का विरोध और इस पूरे सप्ताह इलेक्टोरल बांड को लेकर न्यूज़लॉन्ड्री हिंदी पर प्रकाशित हुई विशेष सिरीज़ चर्चा के केंद्र में रही. ये पूरी सिरीज बताती है कि कैसे सरकार ने चुनावी व्यवस्था में काले धन को संस्थागत रूप दे दिया. दिल्ली में हवा और पानी की जो खराब स्थिति है उस पर भी चर्चा हुई.इस हफ्ते चर्चा में दो खास मेहमान, बीबीसी इंडिया के डिजिटल एडिटर मिलिंद खांडेकर और मैगज़ीन एडिटर, न्यूज़ 18 मनीषा पाण्डेय शामिल हुईं. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 90: अयोध्या का फैसला, महाराष्ट्र में नई सरकार और अन्य
Nov 16 2019 56 mins  
इस सप्ताह एनएल चर्चा सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों के इर्द-गिर्द रही. सुप्रीम कोर्ट से कई सारे फैसले आए हैं. अयोध्या में लम्बे समय से चल रहे राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय हिन्दू पक्ष में दिया. कोर्ट ने कहा कि विवादित जमीन हिन्दुओं को मिलेगी और उसके बदले में पांच एकड़ जमीन मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही अन्यत्र दी जाएगी. इसके अलवा सबरीमाला मंदिर मामले को अब सुप्रीम कोर्ट ने सात जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया है. इस मामले में पहले कोर्ट ने पिछले साल मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी थी जिसको कोर्ट में चुनौती दी गई. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर को आरटीआई के अंतर्गत लाने का फैसला लिया है. इसे बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है. महाराष्ट्र में नई सरकार बनाने के लिए चल रही उठापटक के बीच वहां राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया है. अब ख़बर आ रही है कि एक नए समझौते के तहत शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस सरकार बनाने पर सहमत हो चुके हैं. इसके अवाला जेएनयू में फीस वृद्धि को लेकर छात्र सड़कों पर है. प्रसार भारती द्वारा द गार्डियन में लिखे एक लेख पर हमला किया गया.इस चर्चा में दो खास मेहमान, द क्विंट वेबसाइट के लीगल एडिटर वकाशा सचदेवा और आनंदवर्धन शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 89: व्हाट्सएप जासूसीकांड और आरसीईपी पर गोविंदाचार्य से बातचीत
Nov 09 2019 25 mins  
व्हाट्सएप के जरिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की जासूसी का मामला इन दिनों चर्चा में हैं. आरएसएस के विचारक और पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य ने अब इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाकर चर्चा में ला दिया है. गोविंदाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि व्हाट्सएप जासूसी मामले की जांच एनआईए से करवाई जाय और जो भी सच्चाई है उसे सामने लाया जाय. गौरतलब है कि गोविंदाचार्य अतीत में भी फेसबुक और गूगल को आदालत में घसीटते रहे हैं. उनका तर्क है कि इन कंपनियों की बैलेंस शीट की जांच होनी बेहद जरूरी है और साथ ही इन कंपनियों को भारत के नियम कायदों के दायरे में मजबूती से बांधने की दरकार है. गोविंदाचार्य का यह भी मानना है कि ये जितनी भी बड़ी टेक कंपनियां हैं वे कायदे से अपनी कमाई का टैक्स नहीं चुकाती हैं. उनसे टैक्स वसूली की प्रक्रिया की जांच होनी चाहिए. एक और मामला सर्वर का है. ये सब कह देती हैं कि सर्वर इनका सिंगापुर या कैलिफोर्नियां में हैं. अब अगर ये कोई गड़बड़ी वहां से करती हैं तो उन्हें भारत में कैसे एकाउंटेबल बनाया जाएगा इस पर सरकार विचार नहीं कर रही है इसलिए उन्हें सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाना पड़ा. इस मामले में सरकार जासूसी सॉफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी एनएसओ ग्रुप से कोई जवाबदेही नहीं मांग रही है. अब तक जितनी बातें सामने आई हैं उसके मुताबिक व्हाट्सएप इस मामले में एक लिहाज से पीड़ित नज़र आता है जिसे एनएसओ के जासूसी सॉफ्टवेयर के जरिए निशाना बनाया गया है. इस सवाल पर गोविंदाचार्य कहते हैं, “हमें नहीं पता कि कौन सही बोल रहा है और कौन गलत. इसलिए एनआईए से जांच होनी चाहिए. सरकार क्या करती है यह उसका अपना मामला है. मैं तो सरकार में हूं नहीं.”इस मामले के तमाम अन्य पहलुओं पर भी गोविंदाचार्य से बातचीत हुई. साथ ही भारत के आरसीईपी समझौते से अलग होने, मोदी सरकार और स्वदेशी जागरण मंच के रिश्तों पर भी उन्होंने अपनी राय जाहिर की. पूरा इंटरव्यू सुनने के लिए यह पॉडकास्ट सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 88: व्हाट्सएप जासूसीकांड, मादी शर्मा, अरविंद केजरीवाल और अन्य
Nov 02 2019 53 mins  
इस सप्ताह एनएल चर्चा व्हाट्सएप पर पत्रकारों, मानवाधिकाकर्मियों और अकादमिकों की हुई जासूसी मुख्य रूप से केंद्रित रही. इसके अलावा यूरोपियन यूनियन सांसदों के समूह की कश्मीर यात्रा, महाराष्टर में नई सरकार को लेकर शिवसेना और भाजपा के बीच जारी नाराकुश्ती, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा महिलाओं को मुहैया करवाई गई मुफ्त बस यात्रा की सुविधा भी चर्चा का विषय रहे. “एनएल चर्चा” में इस बार दो मेहमान पत्रकारों ने शिरकत की. प्रभात ख़बर अखबार के ब्यूरो प्रमुख प्रकाश के रे और साथ ही ऑब्जर्वर रीसर्च फाउंडेशन की डिजिटल एडिटर स्वाति अर्जुन बतौर मेहमान चर्चा का हिस्सा बने. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 86: महात्मा गांधी की 150वीं जयंती, खुले में शौच से मुक्त भारत और अन्य
Oct 05 2019 54 mins  
इस सप्ताह एनएल चर्चा में जो विषय शामिल हुए उनमें महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर प्रमुखता से चर्चा हुई. इसके अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाकों में जाते हुए मानसून के कहर, बाढ़ के अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी एक्ट में बदलाव को खारिज करने संबंधी आदेश और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश को खुले में शौच से मुक्त होने संबंधी घोषणा प्रमुखता से छायी रही. इस हफ्ते की चर्चा में खास मेहमान के रूप में मौजूद रहे दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज के प्रोफेसर रतनलाल और वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी. कार्यक्रम का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया है. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एन एल चर्चा 85: हाउडी मोदी, शिवपुरी में दलित बच्चों की हत्या और अन्य
Sep 28 2019 52 mins  
इस सप्ताह एनएल चर्चा में जो विषय शामिल हुए उनमें अमेरिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यक्रम 'हाउडी मोदी', कश्मीर और भारत-पाक के संबंधों के ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प का बयान, 16 साल की युवा कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग का भाषण, टेलीग्राफ के एडिटर द्वारा बाबुल सुप्रियो पर गाली गलौज का आरोप, शरद पवार को ईडी का नोटिस और हमारे सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को दिया गया दादा साहब फाल्के सम्मान आदि विषय शामिल रहे. मध्य प्रदेश में दो दलित बच्चों को खुले में शौच करने की वजह से की गई हत्या पर विशेष चर्चा हुई.चर्चा में लेखक और पत्रकार अनिल यादव में साथ ही टेलीविजन पत्रकार स्मिता शर्मा भी शामिल हुए. कार्यक्रम का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया है. चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने खुले में शौच करने की वजह से मध्य प्रदेश में मारे गए दलित बच्चों के मामले से की. जिस जिले में बच्चों की हत्या की गई वो जिला खुले में शौच से मुक्त हो चुका है. उसके बाद इस तरह के मामले का सामने आया है? इन बच्चों की हत्या सवर्ण बिरादरी से ताल्लुक रखने वाले किसी शख्स ने नहीं किया बल्कि ओबीसी से संबंध रखने वाले दो लोगों ने किया है. यह हमारी जाति व्यवस्था का एक और घिनौना सच है जिसमें पिछड़ी जातियां भी दलितों की शोषक दिखाई देती हैं, जबकि वे स्वयं जाति व्यवस्था के पीड़ित हैं.इस पर अनिल यादव ने बताया कि हमारे समाज के हर पायदान पर जाति ही अंतिम सत्य है. हमारे यहां तमाम राजनीति दल जाति के आधार पर ही टिकट देती है. लेकिन मध्य प्रदेश वाली जो घटना है उसके मूल में शौचालय या उस जिले का खुले से शौच मुक्त होना नहीं है. इसमें कोई दो राय नहीं कि शौचालय जो बने है उनमें से ज़्यादातर तो ख़राब ही है. हालांकि इस घटना के मूल में जातीय नफऱत है. जिन बच्चों की हत्या हुई है उसके पिताजी से हत्यारे अपने यहां कम पैसे में मज़दूरी कराना चाहते थे. उसने मना कर दिया तो उसकी खुन्नस उन्होंने बच्चों पर निकली. यह जो नफऱत है वो पूरे भारत में फैली हुई है. और इस तरह की घटनाएं हर रोज हो रही है.इसी मुद्दे पर बोलते हुए पत्रकार स्मिता शर्मा ने कहा, "निश्चित रूप से इस तरह की खबरें परेशान करती हैं. सुबह-सुबह जब उन बच्चों का शव सफेद कपड़े में लिपटा हुआ दिखा. वो भी उस कुटिया में जहां कोई सुविधा है ही नहीं. दूसरी तरफ आप खुले में शौच से मुक्त की बात कर रहे है. वो तस्वीर दिल दहलाने वाली है. यह तस्वीर हमें तब देखने को मिलती है जब हमारे प्रधानमंत्री विदेश में जाकर अलग-अलग भाषाओं में कहते हैं भारत में सब ठीक है. भारत की गुलाबी तस्वीर दिखाते हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि जातीय तल्खियां हैं. लेकिन जो आग लगाई जा रही है. मॉब लिंचिंग की सूरत में हमें नज़र आ रहा है. ये आग रुक नहीं रही है और ये हमारे लिए बहुत चिंता होनी चाहिए. लोग आज सोचते हैं कि वे मॉब लिंचिंग से अछूते हैं. लेकिन ये जो भीड़ है. जिसका कोई चेहरा नहीं होता. जो सोचते हैं कि वे इस भीड़ से बचे रहेंगे मुझे लगता है उन लोगों को सोचने की ज़रूरत है."चर्चा की आखिरी में अनिल यादव ने केरल के कवि रहीम पोन्नड की लिखी कविता 'भाषा निरोधनम' का पाठ किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 84: एनआरसी, एक देश, एक भाषा और अन्य
Sep 21 2019 58 mins  
एनएल टीमइस सप्ताह एनएल चर्चा में जो विषय शामिल हुए उनमें हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह द्वारा दिया गया ‘एक देश एक भाषा’ वाला बयान प्रमुखता से चर्चा में रहा. इसके अलावा सरकार द्वारा ई-सिगरेट पर प्रतिबंध, जीडीपी में आई गिरावट और देश में फैली आर्थिक मंदी और साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जन्मदिन इस हफ्ते की प्रमुख सुर्खियां रहीं. ‘‘एनएल चर्चा’’ में इस बार पत्रकार लेखक व पत्रकार अनिल यादव के साथ ही वरिष्ट पत्रकार प्रशांत टंडन ने शिरकत किया. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 83 : हिंदी दिवस, स्वामी चिन्मयानंद, मीडिया उद्योग में संकट और अन्य
Sep 14 2019 55 mins  
इस सप्ताह एनएल चर्चा में जो विषय शामिल हुए उनमें सबसे महत्वपूर्ण रहा हिंदी दिवस के बहाने भाषाओं की राजनीति पर चर्चा. मीडिया उद्योग में मंदी का दौर और लगातार नौकरियों से हाथ धो रहे पत्रकार भी इस बार चर्चा का विषय बने. वहीं उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक लड़की ने बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी चिन्मयानन्द पर बलात्कार का आरोप लगाया है. रेल मंत्री पीयूष गोयल और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने हाल में अर्थव्यवस्था को लेकर जो बयान दिए वह सवाल खड़ा करता है कि देश की अर्थव्यवस्था का बागड़ोर जिनके हाथों में हैं वे कितने गंभीर और योग्य लोग हैं. चरंचा के अंत में अनिल यादव ने मशहूर हिंदी लेखक मुक्तिबोध की कविता का पाठ किया.‘’एनएल चर्चा’’ में इस बार के मेहमान थे पत्रकार-लेखक अनिल यादव और डोचे वैले के संपादक चारू कार्तिकेय. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 82 : कश्मीर मुद्दा, मिर्जापुर के पत्रकार पर एफआईआर और अन्य
Sep 07 2019 59 mins  
इस हफ्ते जो विषय एनएल चर्चा में शामिल हुए उनमें डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से अमेरिकी राष्ट्रपति के उम्मीदवारी की होड़ में शामिल अमेरिकी सीनेटर बर्नी सांडर्स द्वारा कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाने जाने की फैसले पर नाराजगी जताई है. कश्मीरी पत्रकार गौहर गिलानी को दिल्ली स्थिति आईजीआई एयरपोर्ट पर अंतिम क्षणों में विदेश जाने से रोक दिया गया. इसके अलावा हाल ही में एनआरसी का लिस्ट जारी हुई जिसमें 19 लाख लोगों की भारतीय नागरिकता खतरे में बताई जा रही है. इसके अलावा आईएनएक्स मीडिया के मामले में पूर्व वित्त मंत्री पी चितंबरम को न्यायिक हिरासत में भेजने का निर्णय कोर्ट ने दिया है. चिदंबरम फिलहाल तिहाड़ जेल में हैं. साथ ही उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में मिडडे मील में नमक रोटी दिए जाने की घटना उजागर करने वाले पत्रकार पवन जायसवाल पर पुलिस ने साजिश का आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज किया है. इस हफ्ते इन्हीं विषयों के इर्द गिर्द चर्चा हुई.'एनएल चर्चा' में इस बार दो खास मेहमान शामिल हुए. कार्यक्रम में पत्रकार मोहम्मद सैफ और लेखक व वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव बतौर पैनलिस्ट मौजूद रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 81 : पी चिदंबरम, अमेजॉन में लगी आग, कश्मीर और अन्य
Aug 31 2019 48 mins  
इस सप्ताह की चर्चा के केंद्र में पी चिदंबरम की आईएनएक्स मीडिया के मामलेमें हुई गिरफ्तारी है, जिसने देश की राजनीति में काफी बवाल पैदा किया है.साथ ही जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर के जो हालातसामने आ रहे है, पाकिस्तान का जो रवैया अब तक रहा है वह भी बहस काविषय रहा. साथ ही पूर्व वित्त मंत्री और बीजेपी के दिग्गज नेता अरुण जेटली केनिधन के बाद भारतीय जनता पार्टी की संस्कृति में एक अहम बदलाव देखनेको मिल सकता है. इसके अलावा अमेज़ॉन के जंगलों में लगी भयानक आगपैनल के बीच एक औऱ चिंता के तौर पर शामिल हुआ. भारत सरकार की नईडिजिटल मीडिया नीति, बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा भीमा कोरेगांव मामले के एकआरोपी वर्नोन गोंजाल्विस की जमानत पर सुनवाई के दौरान ‘वॉर एन्ड पीस’उपन्यास पर की गई आदि विषय इस हफ्ते सुर्खियों में रहे.इस हफ्ते के पॉडकास्ट में उपरोक्त सभी मसलों पर चर्चा करने के लिए दोख़ास मेहमान मौजूद रहे. न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया केसंचालन ने चर्चा का संचालन किया जबकि न्यूज़लॉन्ड्री के मेघनाद और भारतीयजनसंचार संस्थान के महानिदेशक रह चुके प्रोफेसर केजी सुरेश बतौर मेहमानमौजूद रहे.अतुल ने चर्चा की शुरुआत करते हुए मेघनाद से आईएनएक्स मामले के बारे मेंविस्तार में जानकारी चाही. मेघनाद कहते हैं, "2007 में आईएनएक्स मीडियाकरके एक कंपनी थी जिनके मालिक इन्द्राणी मुखर्जी और पीटर मुखर्जी थे.उनको विदेशी फंडिंग चाहिए थी. वो उस समय विदेश मंत्रालय के पासएफआईपीबी क्लीयरेंस के लिए गए. उन्होंने वादा किया कि उनका एक शेयरदस रुपये कीमत का होगा और इसमें तीन विदेशी इन्वेस्टर्स से पैसा आएगा.तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने उन्हें मंज़ूरी दे दी पर उन्होंने एक शर्त रखीकि वो आईएनएक्स न्यूज़ प्राइवेट लिमिटेड के लिए इन्वेस्ट नहीं कर सकते हैं.पर हुआ ये कि उन्होंने मंज़ूरी मिलने के बाद आईएनएक्स ने अपने शेयर्स कादाम 86 गुना बढ़ा दिया यानि 860 रुपए कर दिया और 305 करोड़ रुपये काइन्वेस्टमेंट कंपनी में मॉरिशस के जरिए हुआ. साथ ही उन्होंने डाउनस्ट्रीमइन्वेस्टमेंट यानि न्यूज़ प्राइवेट लिमिटेड में भी कर दिया जो क्लीयरेंस केखिलाफ था. यहां कथित तौर पर दो गड़बड़ी सामने आती है, एक तो निवेश कीसीमा से ज्यादा पैसा लिया गया और दूसरा उसे न्यूज़ वेंचर में डाला गया.इसके बाद एफआईपीबी ने और इनकम टैक्स ने उनके खिलाफ चांज शुरू की.उन्हें लगा कि अब वो फंस गए है तो उन्होंने चेस मैनेजमेंट प्राइवेट लिमिटेडकंपनी को हायर किया ताकि वो उनकी तरफ से वित्त मंत्रालय से उनके लिएबात करें. इस कंपनी के फाउंडर पी चिंदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम हैं. इसीमामले में ईडी और सीबीआई को लगता है कि कार्ति चिदंबरम को पैसा मिला हैऔर ये मामला फिर पी चिदंबरम से भी जुड़ता है.”इस पर अतुल कहते हैं, "इसमें एक बात सामने आई कि सीबीआई की मूलएफआईआर में पी चिदंबरम का नाम तक नहीं है, तो इस लिहाज़ से जो कहाजा रहा है कि ये एक राजनीतिक कार्रवाई है. कहीं न कहीं ये नहीं लगता है किसरकार ने जल्दबाज़ी की है?”इस पर केजी सुरेश कहते है, ‘‘मुझे लगता है. इसके कई पहलू हैं. एक पहलू है किइस देश में जब कभी भी जो गाज गिरती है तो वो छोटे लोगों पर गिरती हैं.छोटे कर्मचारियों पर गिरती हैं. बड़े लोग अक्सर बचकर निकल जाते हैं.चिदंबरम की गिरफ्तारी ने या इससे पहले जो लालू प्रसाद यादव के साथ हुआहै या चौटाला के साथ हुआ, सुखराम के साथ हुआ तो एक मैसेज ये जाता है किआप कितने ताकतवर क्यों न हो कानून आपको बख्शेगा नहीं. पर जिस तरीकेसे चिदंबरम के घर पर घटनाक्रम हुआ, सीबीआई के लोग उनके घर में दीवारफांद कर घुसे, उससे अच्छा संदेश नहीं गया.”इसी प्रकार बाकी विषयों पर भी दिलचस्प औऱ गंभीर चर्चा हुई. पूरी चर्चा सुननेके लिए ‘एनएल चर्चा’ का यह ख़ास पॉडकास्ट सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 80: प्रधानमंत्री का लाल क़िले से भाषण, अनुच्छेद 370, पहलु खान और अन्य
Aug 17 2019 58 mins  
कश्मीर से धारा 370 हटाये जाने के बाद अभी भी वहां संचार के सारे माध्यम बन्द है. सेना की बड़े पैमाने पर तैनाती जारी है. इसी बीच कश्मीर के सौरा इलाके में हुए एक प्रदर्शन का वीडियो जारी करने के कारण बीबीसी न्यूज़ कुछ लोगों के निशाने पर है. वहीं राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद कांग्रेस ने अपना नया अध्यक्ष चुन लिया है. एक बार फिर से सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बन गई हैं. राजस्थान के अलवर में दो साल पहले पहलू खान की भीड़ द्वारा की गई हत्या के मामले में निचली कोर्ट ने हत्या के सभी आरोपियों को बरी कर दिया है. वहीं 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से देश को संबोधित किया. इन तमाम मुद्दों के इर्दगिर्द इस बार की एनएल चर्चा केंद्रित रही. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. वरिष्ठ पत्रकार शांतनु गुप्ता और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनन्द वर्धन इस बार चर्चा में शामिल हुए. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 79: धारा 370, राम मंदिर विवाद, स्वराज का निधन और अन्य
Aug 10 2019 52 mins  
तमाम सियासी उठापटक के कारण ये सप्ताह बेहद चर्चित रहा. इस सप्ताह संसद में जो फैसले लिए गए उनमें से कुछ भारत में और कुछ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का कारण बने. संसद द्वारा कश्मीर की स्वायत्ता से जुड़े अनुच्छेद 370 और 35A को समाप्त करने का फैसला लिया गया है. इस फैसले के बाद जम्मू और कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त हो गया और उस पर केंद्र सरकार के निर्णय सीधे तौर पर लागू होंगे. इसी के साथ जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन सम्बन्धी बिल भी पास किया गया है. जम्मू और कश्मीर का विभाजन दो हिस्सों में किया गया है. जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश होगा इसके साथ ही लद्दाख़ भी विधानसभा रहित केन्द्रशासित प्रदेश होगा. इसके अतिरिक्त 6 अगस्त से राम मंदिर के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में रोज़ाना सुनवाई शुरू कर दी गई है. लोकसभा द्वारा पोस्को एक्ट से सम्बंधित एक बिल पास किया गया ही जिसके बाद अब बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दोषी पाए जाने पर आरोपी को मृत्युदंड देने का प्रावधान किया गया है. इसके अलावा एक और दुखद खबर दिल्ली से आई जहां बीते मंगलवार 6 अगस्त को दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री और पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का हार्ट अटैक से निधन हो गया.हमारे इस ख़ास पॉडकास्ट ‘एनएल चर्चा’ में उपर्युक्त सभी मसलों पर चर्चा करने के लिए तीन ख़ास मेहमान मौजूद रहे. न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया के संचालन में वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव, न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन और ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पाण्डेय की उपस्थिति में चर्चा की गई. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 78: डोनाल्ड ट्रंप का कश्मीर समस्या में दखल, सोनभद्र में कत्लेआम और अन्य
Jul 27 2019 46 mins  
देश और दुनिया में चल रही तमाम अस्थिरताओं के कारण बीता हफ्ता ख़बरों से भरा रहा. केरल हाईकोर्ट के जज जस्टिस चितम्बरेश ने विवादित बयान देते हुए कहा कि “आरक्षण जातिगत नहीं आर्थिक आधार पर होना चाहिए,” साथ ही उन्होंने कुछ गुणों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन गुणों के कारण ब्राह्मणों को ही उच्च पदों में होना चाहिए. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान से बात करते हुए यह दावा किया की भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर विवाद में अमेरिका को मध्यस्थता करने की अपील की है. हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी राष्ट्रपति के इस दावे को ख़ारिज किया है. इसके साथ ही बीते हफ्ते लोकसभा में आरटीआई अमेंडमेंट बिल पास किया गया. इस बिल पर काफी विवाद मचा हुआ है. एक अन्य खबर उत्तरप्रदेश के सोनभद्र जिले से आई, जहां जमीनी विवाद में 10 आदिवासियों की गोली मार कर हत्या कर दी गई. बीते दिनों दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का देहांत हो गया. इसके अलावा भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘इसरो’ ने चंद्रयान-2 का लौंच सफलतापूर्वक पूरा करके अपने खाते में एक और उपलब्धि बढ़ा ली है.इन सभी मुद्दों पर दो ख़ास मेहमानों के साथ न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने चर्चा की. न्यूज़लॉन्ड्री के ख़ास कार्यक्रम ‘एनएल चर्चा’ में उपरोक्त मुद्दों पर बात करने के लिए वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव और राज्यसभा टीवी के एंकर अनुराग पुनेठा मौजूद थे. चर्चा का संचालन अतुल चौरसिया द्वारा किया गया.चर्चा की शुरुआत में अतुल ने कहा कि “चर्चा की शुरुआत केरल हाईकोर्ट के जज जस्टिस चितम्बरेश के उस बयान से करते हैं जो उन्होंने कोच्चि में ग्लोबल ब्राह्मण सम्मेलन में दिया है. अपने बयान में उन्होंने कहा कि- “ब्राह्मण अपने कर्मों से इतना पुण्य कमाता है कि वह द्विज होता है, यानि उसका दो बार जन्म होता है.” दरअसल सारे सवर्ण ही द्विज कहलाते हैं यानि ऐसा कहा जाता है कि उनका दो बार जन्म होता है जबकी शूद्र को उसके कर्मों का फल एक ही जन्म में मिल जाता है. इस प्रकार यह जो पुनर्जन्म की धारणा को समर्थन करती हुई बात उन्होंने कही है वह आज़ादी के बाद जो एक बहस चली जिसमें कहा गया कि वैज्ञानिक सोच वाले लोग ऐसे पदों पर पहुंचने चाहिए, से टकराती हुई दिखती है. मेरा सवाल यह है कि क्या किसी जज का ऐसे किसी कार्यक्रम जो किसी धर्म,संप्रदाय या जाती विशेष के लिए हो, में शामिल होना जायज़ है.”इसी विषय से संबंधित अतुल के सवाल का जवाब देते हुए अनिल यादव कहते हैं कि “मुझे लगता है कि एक बेहतर मनुष्य होने, प्रोग्रेसिव होने और जज या वैज्ञानिक होने के बीच कोई रिश्ता है नहीं. यह सारे संस्थान लकीर के फ़कीर हैं. सभी किसी ख़ास विषय में पारंगत लोगों का चयन करते हैं, बिना इस बात की परवाह किये कि वह निजी जीवन में कैसा है. मसलन यदि कोई व्यक्ति भौतिकी के नियम जानता है तो वह निजी ज़िन्दगी में भले ही झाड़-फूंक में विश्वास करता हो, वह वैज्ञानिक कहलाएगा. तो मुझे यह मामला ज्यूडिसरी का मामला नहीं लगता. मुझे लगता है कि सिर्फ़ ब्राम्हणों में ही नहीं, बल्कि हर जाति में रिवाईवलिज्म का फेस चल रहा है. ये जो ग्लोबल तमिल सम्मलेन चल रहा था ऐसे ही कई सम्मेलन कुर्मियों के, यादवों के, ठाकुरों के चल रहे हैं. और देखने वाली बात यह है कि जो लोग इसका आयोजन करते हैं उनकी इतिहास दृष्टि बेहद घटिया है. जैसे वह कहेंगे कि सम्राट अशोक इसलिए महान थे, क्योंकि वह मौर्य थे. इसका कारण यह है कि हमारे यहां 70 साल सिर्फ और सिर्फ जाति की राजनीति हुई है.”इस विषय के साथ ही हफ्ते की अन्य ख़बरों पर ख़ास मेहमानों के साथ अतुल चौरसिया के संचालन में चर्चा की गई. कार्यक्रम के अंत में अनिल यादव द्वारा अज़गर वजाहत के आत्मकथात्मक उपन्यास ‘सात आसमान’ के अंश का पाठ किया गया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 77: कुलभूषण जाधव पर फैसला, एनआईए बिल, असम में कवियों पर एफआईआर और अन्य
Jul 20 2019 53 mins  
पिछले हफ़्ते में देश से लेकर विदेश तक कई ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं जो अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण होने के कारण चर्चा का विषय रहीं. बीते दिनों पाकिस्तानी जेल में बंद भारतीय नागरिक कुलभूषण जादव पर अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने फैसला सुनाया है. बीते लोकसभा चुनाव से पहले शुरू हुए 'तिरंगा टीवी' के बंद हो जाने के कारण वहां के कर्मचारियों पर बेरोज़गारी का संकट गहरा गया है. तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने भाषण चोरी करने के झूठे आरोप को लेकर ज़ी टीवी के एडिटर इन चीफ़ सुधीर चौधरी पर मानहानि का मुकदमा दायर किया है. हाल ही में लोकसभा और राज्यसभा द्वारा एनआईए बिल पारित किया गया. एक मामले के संबंध में अपना फैसला सुनाते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि अब कोर्ट में आने वाले व्यक्ति को जज के नाम के आगे 'मे लॉर्ड' जैसे शब्दों का प्रयोग करने की आवश्यकता नहीं होगी. इसके अलावा, एक अन्य ख़बर असम से आयी जहां स्थानीय भाषा के 10 कवियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गयी है.उपरोक्त सभी मसलों पर न्यूज़लॉन्ड्री के खास पॉडकास्ट प्रोग्राम 'एनएल चर्चा' में 3 खास मेहमानों के साथ चर्चा की गयी. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी, न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन और लेखक व वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव बतौर पैनलिस्ट मौजूद रहे.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने कहा कि "अंतरराष्ट्रीय कोर्ट द्वारा कुलभूषण जादव की फांसी पर रोक लगा दी गयी है. कोर्ट द्वारा उन्हें काउंसलर मुहैया कराने का आदेश दिया गया है. दूसरी ओर पाकिस्तान द्वारा कहा जा रहा है कि चूंकि कोर्ट ने उन्हें उनके नियमों के अनुसार कार्रवाई करने को कहा है, इसलिए भारत की अपेक्षा अनुसार वह उनकी रिहाई करने को बाध्य नहीं है. तो ऐसे में देखा जाये तो क्या ये दोनों में से किसी पक्ष की जीत है, या फिर न्याय के तहत देखा जाये तो कुलभूषण जादव का जो फांसी का फैसला था वह टल गया है और यह एक राहत की बात है?"इस विषय पर बात को आगे बढ़ाते हुए आनंद वर्धन ने कहा कि "इसमें बहुत सारी आशंकाएं हैं. दो साल पहले जब पाकिस्तान की कोर्ट में मुकदमा शुरू हुआ तो एक आशंका थी कि सच में यही कुलभूषण जादव हैं या नहीं. यह आशंका अभी भी बनी हुई है. दूसरी बात है कि जो 1961 का वियना कंवेंशन है उसके कई अनुच्छेदों का यहां साफ तौर पर उल्लंघन है. उसमें यह कहा गया कि जो गिरफ्तारी की गयी, उनके काउंसलेट को तुरंत सूचित किया जायेगा, जबकि इन्होंने 21 दिन लगाये. दूसरी बात है कि जिन देशों से कूटनीतिक संबंध हैं उनके दूतावास को तुरंत सूचित किया जाना चाहिए, जो इन्होंने नहीं किया. तो यह ख़ारिज नहीं हुआ है कि वह जासूस हैं, लेकिन जासूसों के अदालती कार्रवाइयों में भी इस कन्वेंशन के नियम प्रभावी होंगे. मेरा मानना है कि 2017 में भारत और पाकिस्तान के जो कूटनीतिक संबंध तनावपूर्ण हुए थे, वह न हुए होते तो इसका रास्ता कूटनीति से ही निकल जाता."विषय के संबंध में अपना पक्ष रखते हुए अनिल यादव ने कहा कि "मुझे लगता है कि इस संबंध में जो फैसला आया है वह चीन और अमेरिका के पाकिस्तान के प्रति बदले रवैये से प्रभावित है. आप देखेंगे कि इस बार चीन ने भी मसूद अज़हर के मामले में उसे आतंकवादी घोषित करने के पक्ष में वोट किया था. यह दवाब का ही नतीजा है कि इमरान खान को यह कहना पड़ा है कि वह आतंकवाद के ख़िलाफ़ हैं और प्रो-पीपल गवर्नमेंट चलाना चाहते हैं. मुझे इस फैसले की बड़ी बात यह लगती है कि एक तो कुलभूषण की जान बच जायेगी और दूसरा चूंकि उन्हें काउंसलेट से मिलने दिया जायेगा, इसलिए न्यायिक प्रक्रिया ठीक से चल सकेगी. साथ ही जहां तक आतंकवाद का मसला है, तो यह तनाव तो चलता ही रहेगा इसके सुलझने के आसार दिखते नहीं है."इसके अतिरिक्त अन्य सभी मसलों पर भी अतुल चौरसिया के संचालन में पैनलिस्टों के साथ न्यूज़लॉन्ड्री के खास पॉडकास्ट 'एनएल चर्चा' में विस्तार से बातचीत की गयी. साथ ही कार्यक्रम के अंत में अनिल यादव द्वारा डॉक्टर संजय चतुर्वेदी की कविता 'वह साधारण सिपाही जो कानून और व्यवस्था के काम आये' का पाठ किया गया. पूरी चर्चा सुनने के लिए 'एनएल चर्चा' का पूरा पॉडकास्ट सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 76: वित्त मंत्री द्वारा पेश बजट, कर्नाटक में सियासी संकट, कांग्रेस में मचा घमासान और अन्य
Jul 13 2019 57 mins  
बीता हफ़्ता तमाम उतार-चढ़ाव की ख़बरों से भरा हफ़्ता रहा. मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पहली बार वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा बजट पेश किया गया. कर्नाटक में पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) की संयुक्त सरकार पर खतरा मंडरा रहा है. दिल्ली सरकार ने सीसीटीवी लगाने की योजना को दिल्ली के सरकारी स्कूलों की कक्षाओं में लागू करने का फैसला लिया है. राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद अब कांग्रेस पार्टी के दो बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और मिलिंद देवड़ा द्वारा भी अपने-अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया गया. मिलिंद देवड़ा ने अपनी चिट्ठी में राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में उतरने के संकेत दिये, जिससे राजनितिक गलियारों में गहमा-गहमी बढ़ गयी है. बीते दिनों यूएन द्वारा कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित रिपोर्ट जारी की गयी, जो काफी चर्चा का विषय रही. नोबल पुरस्कार के विजेता अमृत्य सेन ने अपने एक बयान में कहा कि जय श्री राम का नारा बंगाल में नया आया है, बंगाल की मूल संस्कृति से इसका लेना-देना नहीं है.एन एल चर्चा के इस पॉडकास्ट में लेखक और पत्रकार अनिल यादव मौजूद रहे. साथ ही माखनलाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य कर रहे शिक्षाविद राकेश योगी भी चर्चा का हिस्सा बने. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करने से पहले संचालक अतुल चौरसिया द्वारा ‘टीम वर्क्स आर्ट’ और ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रम ‘मीडिया रम्बल’ के रजिस्ट्रेशन और शैड्यूल के बारे में दर्शकों को सूचित किया गया. साथ ही अतुल ने ‘एनएल चर्चा’ के फ़ॉर्मेट में हुए बदलाव के बारे में भी बताया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने कहा कि “बजट में काफी सारी चीज़ों पर पहले भी बात हो चुकी है, मगर पत्रकारिता के लिहाज़ से इसमें दो चीज़ें महत्वपूर्ण रहीं. पहला यह कि अखबार और पत्रिकाओं के कागज़ पर सरकार द्वारा पहली बार कस्टम ड्यूटी लगाने का फैसला लिया गया है. सरकार द्वारा इस पर यह कहा गया कि इससे भारतीय कंपनियों को बाज़ार में विदेशी कंपनियों के मुकाबले ज़्यादा मुनाफा कमाने का अवसर मिलेगा. मगर इसका दूसरा और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ज़्यादातर अखबार कागज़ की आपूर्ति के लिए विदेशी कागज़ पर निर्भर होते हैं. ऐसे में इसका दबाव उन पर भी पड़ेगा और वह अपने दामों में इजाफ़ा कर सकते हैं. यह बढ़ी हुई कीमत आम जन द्वारा जल्दी स्वीकार नहीं की जाती है, जिससे उनकी बिक्री पर असर पड़ता है. चूंकि निजी विज्ञापनों की संख्या निश्चित है, इसलिए आय के लिए अख़बारों को सरकारी विज्ञापन पर निर्भर होना पड़ेगा. तो क्या यह माना जाये कि इस तरह से सरकार अप्रत्यक्ष रूप से अख़बारों पर नियंत्रण लगाने की कोशिश कर रही है.”इसका जवाब देते हुए राकेश योगी कहते हैं कि “देखिये किसी भी अख़बार की आय निकालने का साधन आज तक भी, कभी भी पाठकों द्वारा दी जाने वाली की नहीं रही है, वह विज्ञापन पर ही निर्भर रहते आये हैं. उसमें भी सरकारी विज्ञापनों पर निर्भरता ज़्यादा रही है. इस सरकार पर विज्ञापनों के वितरण में घूसखोरी का आरोप भी लगता आया है. तो इस कदम को सुधार की दृष्टि से उठाया गया कदम माना जाना चाहिए कि सरकार यह चाहती है कि अखबार कम निकलें, मगर उन्हें आय के लिए किसी ऐसे सोर्स पर निर्भर न रहना पड़े, बल्कि बाज़ार के मुनाफे से ही वह आय निकाल सकें.”राकेश योगी की इस बात पर अपनी राय रखते हुए अनिल यादव कहते हैं कि “मुझे लगता है, इससे कोई ख़ास फ़र्क़ न्यूज़ पेपर इंडस्ट्री पर पड़ने वाला है नहीं. उनकी निर्भरता विज्ञापनों पर ही ज़्यादा रही है. आप देखते हैं कि जब कोई त्यौहार का मौसम होता है तो अख़बारों के शुरूआती पन्ने विज्ञापनों से ही पटे पड़े होते हैं. मुझे लगता है कि जब सरकार ने मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कहीं ज़्यादा प्रत्यक्ष तरीका अपना रखा है तो वह उसे इन तरीकों से क्यों नियंत्रित करेगी? आज मीडिया की मुख्यधारा न्यूज़ पेपर हैं नहीं, बल्कि वह चैनल हैं जिसको सरकार सीधा रेवेंयू दे रही है और उसके बदले वह विपक्ष की लगातार आलोचना करते हैं, उन्हें ट्रोल करते हैं.”इस विषय के और भी तमाम पहलुओं पर पैनालिस्टों द्वारा चर्चा की गयी. पोडकास्ट में अनिल यादव द्वारा भवानी प्रसाद मिश्र की रचना ‘चार कौवे’ का पाठ किया गया. इसके साथ ही पॉडकास्ट में हफ़्ते के अन्य मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गयी, जिन्हें सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.पत्रकारों की राय क्या देखा जाये, सुना जाये, पढ़ा जाये.अनिल यादव:फिल्म - ‘तितली’राकेश योगी:शार्ट फिल्म – ‘गीली’अतुल चौरसिया:विश्रामपुर का संत : श्रीलाल शुक्ल[hindi_support] [hindi_tag] See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 75: राहुल गांधी का इस्तीफा, जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन और अन्य
Jul 06 2019 66 mins  
बीता हफ़्ता बहुत सारी बहसें लेकर आया. राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया हैं और उन्होंने पांच पेज का एक लेख भी लिखा, जिसकी काफी चर्चा भी हो रही है. इसके अलावा, मुंबई के महाराष्ट्र में बारिश ने प्रकोप दिखाया है और बाढ़ की स्थिति बनी हुई है, जिसमें काफी लोगों की मौतें भी हुई हैं. जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन को 6 महीने के लिए एक बार फिर बढ़ा दिया गया है. दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में एक सांप्रदायिक वारदात दिखने को मिली, जिसमें एक मंदिर में भी तोड़फोड़ हुई. इसके अलावा, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुरादाबाद दौरे के वक़्त वहां पर पत्रकारों को एक कमरे में करीब 35 मिनट तक बंद कर दिया गया ताकि वो सवाल न कर सकें मुख्यमंत्री से. कश्मीर की आदाकारा ज़ायरा वसीम, जिन्होंने दंगल फिल्म में अमीर खान के साथ अपना डेब्यू किया था बाल कलाकार के तौर पर, अब उन्होंने अपने एक्टिंग करियर को छोड़ने का फैसला किया है और उनका तर्क ये है कि उनका एक्टिंग करियर उनके ईश्वर से मिलने की राह में बड़ा रोड़ा बन रहा था.चर्चा में इस बार शामिल हुए लेखक और पत्रकार अनिल यादव. न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. इसके अलावा युवा पत्रकार राहुल कोटियाल भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए बताया कि "पिछले हफ़्ते न्यूज़लॉन्ड्री के लिए बड़ी ख़बर आयी, जिसमें न्यूज़लॉन्ड्री हिंदी को और असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल को 'रेड इंक' अवार्ड मिला है. यह अवार्ड 2018 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में हुए एक फेक एनकाउंटर पर आधारित एक स्टोरी के लिए दिया गया. राहुल ने करीब एक हफ़्ते तक दंडकारण्य के जंगलों में दौरा करके, लोगों के बीच रह कर तथ्य जुटाये, तमाम लोगों से बातचीत की, जिसमें ये पता चला कि आम ग्रामीण उस एनकाउंटर में मारे गये थे."प्रतिक्रिया में राहुल ने पुरस्कृत स्टोरी की पृष्ठभूमि के बारे में बताया कि "ये स्टोरी वहीं शुरु हुई जब 15 लोगों की मौत दंडकारण्य के जंगलों में हुई थी और राज्य प्रबंधन के हवाले से कहा गया कि यह एक बहुत बड़ी सफलता है. ऑपरेशन मानसून वहां पर चलाया जा रहा था और उसमें ये कार्रवाई की गयी, जिसमें 15 नक्सलियों को मार गिराया गया. लेकिन कुछ सबूत हमें मिले जिसमें सामने आया कि इस एनकाउंटर में नक्सली नहीं, बल्कि आम ग्रामीण मारे गये थे. उसमें 12-13 साल के छोटे बच्चे भी शमिल थे. जब हम लोग गांव में पहुंचे पाया कि दंडकारण्य बहुत विस्तृत और दुर्गम है. स्टोरी के लिए कम से कम हम 24 घंटे और 55 किलोमीटर तक पैदल चले थे. बरसात के दौर में तो गाड़ियों और पुलिस टीम के लिए भी काफी मुश्किल होता उतने अंदर तक पहुंच पाना. वह इलाके ऐसे हैं कि वहां पर खेती शहरों जैसी नहीं होती है. जंगल के बीच में ही खेत होते हैं और वो खेत कम से कम गांव से 5 या 10 किलोमीटर भी दूर होते हैं. तो गांव के लोग पास ही एक लाडी बना लिया करते हैं; एक झोपड़ी जैसी चीज़ होती हैं जिसे लाडी कहां जाता हैं. अक्सर जब वह खेती के लिए इतनी दूर जाया करते हैं, तो वहीं रुक जाया करते हैं. वे साथ में खाना ले जाते हैं और एक-दो दिन वहीं रुक जाते हैं और फिर वापस अपने घरों को लौटते हैं. घटना के दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ कि गांव के लोग लाडी में मौजूद थे, जिनको सुरक्षा बलों ने नक्सली समझ लिया, उसके बाद एनकाउंटर हुआ और ये बोल दिया गया कि 15 नक्सली मारे गये. ये स्टोरी जो हमने की वो इसलिए कि पुलिस ने नक्सलियों को नहीं मारा, बल्कि मरने वालों को नक्सली साबित करने का काम किया. उनमें कई लोग ऐसे थे जो चश्मदीद थे, जिन्हें सेना बलों द्वारा की गयी गोलीबारी में गोलियां लगीं, वो गोलियां उनके शरीर में मौजूद थी, लेकिन बाद में वह अस्पताल नहीं जा सकते थे. क्योंकि पुलिस का ये कहना था कि वहां जितने लोग मौजूद थे वह नक्सली थे और हमने सिर्फ नक्सलियों को मारा है तो इस डर से वो वहां भी नहीं जा सकते थे. लेकिन हमने उनकी पहचान के साथ ये स्टोरी की थी कि ये लोग वहां मौजूद थे और कोई नक्सली नहीं बल्कि आम ग्रामीण लोग थे."इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 74: तबरेज़ अंसारी की लिंचिंग, संसद का पहला सत्र, रिलीजन फ्रीडम रिपोर्ट और अन्य
Jun 29 2019 56 mins  
बीता हफ़्ता बहुत सारी बहसें लेकर आया. संसद का पहला सत्र शुरू हो चुका है और राष्ट्रपति के अभिभाषण के बाद प्रधानमंत्री सहित तमाम विपक्षी दलों के नेताओं ने अपनी अपनी-अपनी बात रखी. झारखंड में भीड़ की हिंसा यानी मॉब लिंचिंग का मामला सामने आया, जिसमें भीड़ ने 24 वर्षीय युवक तबरेज़ अंसारी की हत्या कर दी. इसी से मिलती-जुलती एक घटना कोलकाता में हुई, जहां पर एक मुस्लिम युवक ने आरोप लगाया कि उसको 'जय श्री राम' का नारा लगाने के लिए कहा गया और चलती ट्रेन से उसे धक्का दे दिया गया. इसके अलावा नयी लोकसभा गठित होने के बाद, जो पहला बिल लोकसभा में पेश हुआ है वो ट्रिपल तलाक का बिल है. इसको लेकर विपक्ष ने विरोध किया है और सत्ता पक्ष ने इसका समर्थन किया है. उत्तर प्रदेश से एक ख़बर आयी है. लोकसभा चुनाव के ठीक बाद समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच का गठबंधन ख़त्म करने का ऐलान किया गया है. इसके अलावा अमेरिका की तरफ से 'रिलिजन फ्रीडम रिपोर्ट' पिछले हफ़्ते आयी, जिस पर भारत सरकार की तरफ से आपत्ति जतायी गयी है. इसके अलावा प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पार्टी के ऊपर काफी कड़ा निशाना साधा. दूसरी तरफ, बलात्कार के मामले में जेल में सज़ा काट रहे गुरमीत राम रहीम को पैरोल देने का हरियाणा सरकार ने समर्थन किया. वहीं देश में गर्मी और हीटवेव की प्रचंड लहर चल रही है.चर्चा में इस बार शामिल हुए डाउन टू अर्थ के कंसल्टिंग एडिटर जॉयजीत दास. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए सवाल उठाया, ''झारखंड में 24 साल के तबरेज़ अंसारी पर भीड़ के द्वारा जय श्री राम, जय हनुमान कहने के लिए दबाव डाला गया और फिर उसकी पिटाई की गयी. उसके ऊपर आरोप था कि उसने कुछ चोरी की है. साल 2014 से जो चीज़ें चल रही थी या देखने को मिल रही थी, बात अब उससे कई गुना आगे बढ़ चुकी है. अब आरोप कुछ और होता है, शक कुछ और है. लेकिन धर्म भीड़ को इस बात के लिए प्रेरित कर रहा है कि जय श्री राम या दूसरे धर्म के नारे लगवाएं जायें और उसकी पिटाई की जाये. लगातार गिरावट दर्ज़ की जा रही है. क्या इससे भी बुरी स्थितियां हो सकती हैं आगे जा कर?"प्रतिक्रया में आनंद ने कहा कि, "सांप्रदायिक लीचिंग, जो धार्मिक लिंचिंग है, उससे पहले भीड़ के 'न्याय' की जो समस्या है, यहां उसका संदर्भ ज़्यादा है. यह कई रूप में भारत में देखा जाता है. उसमे कई चीज़ें जुड़ती हैं, जैसे पहचान, धर्म या कभी-कभी कोई जाति विशेष भी. पटना शहर की हाल की घटना है. कार से एक्सीडेंट हुआ और जिस व्यक्ति ने एक्सीडेंट किया था, उसको लोगों की भीड़ ने पत्थरों और लाठियों से मार दिया और दूसरा गंभीर रूप से घायल है. ऐसा क्यों हो रहा है और हो ये दशकों से हो रहा है. क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में लोगों की आस्था कम है या इसके नियमों के अनुपालन में सामूहिकता की मानसिकता नहीं है. तो जो इसका शिकार है वो कभी चोरी, कभी ड्राइविंग कभी किसी और चीज़ से संबंधित हो सकता है. भीड़ का तैयार होना न्याय की समस्या है. पॉपुलर कल्चर है. जैसे सिनेमा में में जो अंत का सीन होता है, जिसमें भीड़ से किसी विलेन का ख़ात्मा कराया जाता है. वह ये नही बताते हैं कि जब भीड़ ख़ात्मा करती है तो वह शिकार हुए आदमी को अपमानित भी करती है. मैंने भीड़ की हिंसा में हुई दो मौते अपनी आंखों से देखी है. और दोनों में ये पाया है कि निरादर का भी फॉर्मूला होता है. भारत में हेट क्राइम को लेकर जो आंकड़े जुटाये जाते हैं, वो भी सिर्फ मीडिया रिपोर्ट के आधार पर होते हैं. हेट क्राइम को कैसे परिभाषित किया जाये, इसे भी मीडिया नैरेटिव में सोचना चाहिए.इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें.पत्रकारों की राय, क्या देखा, सुना या पढ़ा जाये:आनंद वर्धन :हॉट फ्लैट एंड क्राउडेड: व्हाई वी नीड अ ग्रीन रेवोल्यूशन (थॉमस फ्रीडमन)जॉयजीत दास:स्टेट ऑफ़ इंडियाज़ एन्वायरमेंट इन फिगर्स 2018: डाउन टू अर्थअतुल चौरसिया:आर्टिकल 15: अनुभव सिंहा See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एनएल चर्चा 73: बिहार में बच्चों की मौतें, संसद में धार्मिक नारे और अन्य
Jun 22 2019 57 mins  
बीता हफ़्ता बहुत सारी बहसें लेकर आया. बीते दिनों बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर जिले में एक्यूट इंसेफ़ेलाइटिस सिंड्रोम का प्रकोप देखने को मिला है, जिसमें लगभग 150 बच्चों की मौत हो चुकी है और 500 बच्चे अभी भी पीड़ित बताये जा रहे हैं. इस मुद्दे के साथ-साथ, मीडिया की रिपोर्टिंग को लेकर भी काफी बातचीत चलती रही. इसके अलावा इस बार जो जो नये सांसद चुन कर संसद आये, उनका शपथग्रहण समारोह हुआ. समारोह के दौरान संसद के भीतर धार्मिक नारे भी लगाये गये. इसके अतिरिक्त, बंगाल से शुरू हुई डॉक्टरों की राष्ट्रव्यापी हड़ताल थी अब खत्म हो गयी है. मुखर्जी नगर, दिल्ली के पुलिस थाने के पुलिसकर्मियों और एक ऑटो ड्राइवर के बीच लड़ाई हुई, जिसका वीडियो भी खूब वायरल हुआ. इसी हफ़्ते एनडीटीवी के मालिक प्रणव रॉय और राधिका रॉय के प्रमोटर को सेबी ने बंद कर दिया था, अब एनडीटीवी ने लीगल नोटिस भेजा है और जिसके बाद कोर्ट ने भी सेबी के फैसले पर स्टे लगा दिया है. इसके अलावा, नयी लोकसभा में ओम बिरला नये स्पीकर चुने गये हैं, जो कोटा राजस्थान के नये एमपी है. वहीं, अधीर रंजन चौधरी कांग्रेस पार्टी के लोकसभा में नेता होंगे, अगले पांच सालों तक. एक और घटना है जिसको लेकर हम बात करेंगे और वो है जे पी नड्डा अब बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष होंगे. हालांकि अगले कुछ समय के लिए अमित शाह ही अध्यक्ष बने रहेंगे, लेकिन नड्डा उनके साथ में काम करेंगे. इसके अलावा देश-दुनिया के तमाम अन्य मुद्दों पर भी चर्चा हुई. चर्चा में इस बार शामिल हुए जनज्वार.कॉम के संपादक अजय प्रकाश. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए आनंद से कहा कि, "बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर की घटना है, इंसेफ़ेलाइटिस सिंड्रोम से बच्चों की मौत हो रही है. जिस तरह से नेशनल मीडिया ने वहां जा कर कवरेज किया है उसकी शैली को लेकर विवाद तो हो ही रहा है, इसमें सरकार की अक्षमता भी सामने आयी है. इंसेफ़ेलाइटिस को लेकर एक बात कहीं जाती है कि इसको लेकर अभी कोई संपूर्ण इलाज़ या दवाई उपलब्ध नहीं है. साफ़ सफाई आदि जैसी चीज़ें भी इस बीमारी के प्रभाव को रोकने में अहम भूमिका अदा करती है. और ये माना जा रहा है कि चुनाव की जो पूरी प्रक्रिया रही इस साल, लोकसभा के जो चुनाव हुए, उस चक्कर में वहां का प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग था इतना उलझा रहा कि जो तमाम जागरूकता अभियान चलाया जाता था, वो इस बार नहीं हो पाये. नतीज़न इस बार बड़ी संख्या में बच्चों की मौत देखने को मिल रही है. आनंद आप इसकी क्या वजहें देखते हैं?"जवाब में आनंद ने कहा कि, "देखिये, बहुत लोग इसे इंसेफ़ेलाइटिस का मामला मानते भी नहीं है. जो मेडिकल विशेषज्ञ है वो इसे एसेंसिनिया नामक परिवार का मानते हैं, इसे जमैकन बुखार से भी जोड़ा कर देखा गया है. एक तरह से ये मेडिकल मिस्ट्री का केस हो गया है और किसी की ये स्पष्ट राय नहीं है कि इसका कारण क्या है. जिनके शरीर में ब्लड शुगर निचला लेवल है, ख़ासकर कुपोषित बच्चों में जो बिना कुछ खाये-पिये सोये भी नहीं हैं, और सुबह-सुबह बागवानी से सुबह के चार बजे लीची को तोड़ते हैं, खाते हैं और फिर सो जाते हैं. जो बच्चा रात भर तक कुछ नहीं खाया है और सुबह-सुबह सिर्फ लीची खाता है. तो उसमें इसका प्रभाव ज्यादा होता है. तो ये खाली पेट रहने वालों और उसमें भी कुपोषित रहने वालों में अधिकतर पाया जा रहा. जिन बच्चों का पोषण अच्छा था उनमें इसका असर नहीं पाया गया है. तो इस तरह की कई चीज़ें हैं, जो जटिल हैं, जिन पर मेरा बोलना ठीक भी नहीं होगा क्योंकि मैं विशेषज्ञ नहीं हूं. जब पहली बार 2012 में इस संकट का भयावह रूप से सामने आया तो उस समय मौतें अभी से ज़्यादा हुई थी. उस समय मौत का आकड़ा 156 था. जब आधिकारिक स्वीकृति ये थी तो मौतें ज़्यादा हो सकती हैं. इस साल अभी ये मुज़फ़्फ़रपुर, समस्तीपुर, हाजीपुर और बेगूसराय तक सीमित है. 2012 में मगध, गया और राजधानी पटना के कुछ इलाकों तक और सीतामढ़ी तक भी आ गया था. तो उस समय ज़्यादा भयावह स्तिथि थी. लेकिन उस समय राष्ट्रीय मीडिया ने इस मुद्दे को काफी देरी से लिया. इस बार ये अच्छा बदलाव है. लेकिन अब हुआ ये है कि कुछ ज़्यादा ही हो रहा है कवरेज के नाम पर. पिछली बार क्यों मीडिया इतना चूक गया था. ये शायद मीडिया समाजशास्त्र या मीडिया के छात्रों के लिए अच्छा शोध का विषय है कि ऐसा क्यों हुआ."इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 72: पत्रकारों की गिरफ़्तारी, कठुआ रेप केस में आया फैसला और अन्य
Jun 15 2019 55 mins  
बीता हफ़्ता विशेष रूप से पत्रकारों के लिए मुश्किल रहा. इस दौरान पत्रकारों के ऊपर असंवैधानिक रूप से हमले किये गये, उत्तर-प्रदेश और बिहार के स्थानीय पत्रकारों पर कानूनी कार्रवाई की गयी. इसी बीच स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत जगदीश कनौजिया को यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जुड़े एक ट्वीट के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया. बाद में इसको लेकर काफी हंगामा हुआ और आगे जाकर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में प्रशांत को जमानत दे दी. पत्रकार से जुड़ा एक और मामला यूपी के शामली से है, जहां पर न्यूज़ 24 चैनल के पत्रकार अमित शर्मा के साथ मारपीट की गयी. साल 2018 में हुए कठुआ बलात्कार मामले में भी निर्णय आ गया है, जिसमें कोर्ट ने 6 अभियुक्तों को दोषी करार दिया है और 1 अभियुक्त को बरी कर दिया है. हाल में अलीगढ़ में एक बच्ची के हत्या की घटना हुई है, पिछली एनडीए सरकार में आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने एक लेख लिख कर जीडीपी के आंकड़ों की वैधता के ऊपर सवाल खड़े किये हैं. इसके अलावा देश-दुनिया के तमाम अन्य मुद्दों पर भी चर्चा हुई.चर्चा में इस बार शामिल हुईं वरिष्ठ पत्रकार व एनडीटीवी की कंसल्टिंग एडिटर नग़मा सहर. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए कहा कि, "कठुआ का मामला जब पिछले साल हमारे सामने आया था तो उस दौरान कई सारी बातें हुई, जिसमें हमने देखा कि जो भारतीय जनता पार्टी के नेता थे उन्होंने अभियुक्तों के समर्थन में रैली निकाली और मांग की थी कि उन्हें छोड़ा जाये. इसके अलावा जम्मू बार एसोसिएशन के भाजपा समर्थक वकीलों ने ऐसी अराजकता पैदा की थी कि पुलिस को अपनी चार्जशीट दाखिल करने में भी दिक्कत हुई थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले की सुनवाई को पठानकोट की ट्रायल कोर्ट में शिफ्ट किया, जिसके बाद ये फैसला आया."कठुआ मामले में आये फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए आनंद ने कहा - ''देखिये, मै इस तरह के मामले को अपराध के तौर पर देखता हूं और जिसकी एक प्रक्रिया है और वह निचली अदालत में न्यायिक निष्कर्ष पर पहुंची है. इसको उसी तरह देखना चाहिए. यह इतना बड़ा देश है, यहां रोज़ हज़ारों घटनाएं होती रहती हैं. लेकिन कठुआ के अलग होने के कई कारण हैं, एक तो वह जिसकी ओर आपने संकेत दिया और एक घटना जो दरिंदगी थी, इसके कारण और जो नेशनल मीडिया में नेरिटिव बना, उससे मामला राष्ट्रीय सुर्खियों में रहा. लेकिन भारत को अभी ऐसी कई घटनाओं पर संवेदनशील होने की ज़रूरत है. और जहां तक पार्टियों की बात है, एक वर्ग है जिसे लगा कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को इसकी जांच करनी चाहिए क्योंकि किसी एक समुदाय को निशाना बनाया गया. इस केस को किसी दूसरी तरह से रखा जा सकता था."इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 71: स्मृति ईरानी का अर्थी को कंधा देना, नवीन पटनायक पांचवी बार बने सीएम और अन्य
Jun 01 2019 62 mins  
इस हफ़्ते की चर्चा हालिया राजनीतिक उठापटक पर केंद्रित रही. पिछले दिनों एक फोटो मीडिया में आयी, जिसमें स्मृति ईरानी कंधे पर अर्थी उठाते हुए देखी गयी थी. उन्होंने अमेठी के बीजेपी कार्यकर्ता की अर्थी उठायी थी. 23 मई के नतीजों के आने के बाद देश के कई हिस्सों में हेट क्राइम की वारदातें हुईं. बिहार के बेगूसराय से लेकर दिल्ली के कनॉट प्लेस तक ऐसी घटनाएं सुनने को मिलीं. दूसरी तरफ़, चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस पार्टी में काफी उथल-पुथल मची हुई है. कहा जा रहा है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा देने के लिए अड़े हुए हैं, जबकि पार्टी के लोग उन्हें मना रहे है. इसके अलावा, इस बार के नतीजों में सबसे महत्वपूर्ण नतीजा ओडिशा से देखने में आया. नवीन पटनायक पांचवी बार मुख्यमंत्री बनने में सफल हुए हैं.चर्चा में इस बार वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अनिल यादव ने शिरकत की. साथ में पब्लिक पॉलिसी के एक्सपर्ट और न्यूज़लॉन्ड्री में ही कार्यरत पत्रकार एस मेघनाद भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत शुरू करते हुए सवाल उठाया, अमेठी में सुरेंदर सिंह, जो भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता थे, उनकी नतीजे के एक दिन बाद ही हत्या हो गयी और स्मृति ईरानी वहां पहुंची और उनकी अर्थी को कंधे पर ले कर चली तो तमाम लोगों ने उनकी आलोचना भी की कि ईरानी ने लोगों के बीच में वाहवाही लूटने के लिए ऐसा किया था. महिलाओं का अंतिम संस्कार में शामिल होना हिंदू समाज में खासकर उत्तर भारत के समाज में निषेध माना जाता है उनको शमशान में जाने की इजाज़त नहीं दी जाती है. साथ ही महिलाओं को अर्थी को कंधा देने की भी मनाही है. तो उस लिहाज़ से ये फोटो काफी विचलित करने वाली भी है? See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 70: मीडिया की आज़ादी और लोकसभा चुनाव के नतीजे
May 25 2019 63 mins  
इस हफ़्ते की चर्चा विशेष थी. बीते गुरुवार लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आये और अकेले बीजेपी ने देश में 303 सीटें हासिल कर लीं. वहीं कांग्रेस केवल 52 सीट ही जीत सकी. इस बार की चर्चा के केंद्र में मीडिया की आज़ादी की ज़रूरत और लोकसभा चुनाव के नतीजे रहे.चर्चा में इस बार शामिल हुए वरिष्ठ पत्रकार व लेखक उर्मिलेश उर्मिल, लेखक-साहित्यकार अनिल यादव. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन ने भी शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.अतुल ने बातचीत की शुरुआत करते हुए सवाल उठाया कि मीडिया और पत्रकारों के ऊपर दवाब कई तरह के दबाव डाले जाते हैं. विज्ञापन वाले मॉडल में सरकारों तथा कॉर्पोरेट के ऊपर निर्भरता आ जाती है. इससे बचने के लिए सब्सक्रिप्शन का मॉडल, जिसका उपयोग न्यूज़लॉन्ड्री भी करता है, कितना बड़ा विकल्प है? इसके अलावा क्या कोई और भी विकल्प हैं, जिससे इन तमाम दबावों से बचा जा सके?जवाब में उर्मिलेशजी ने कहा- "देखिये, ये काफ़ी जटिल प्रश्न है कि भारत मे आज़ाद मीडिया के लिए क्या रेवेन्यू मॉडल हो, उसका तंत्र किस तरह खड़ा किया जाये. इस समय देश में जिस तरह के जर्नलिस्ट हैं, बेहतर जर्नलिज़्म की चाह रखने वाले लोग इस मसले पर बहस करते रहते हैं. लेकिन जो सबसे बुनियादी बात मुझे लगती है, वह यह है कि हम आज़ाद मीडिया तो तभी बना सकते हैं. जब देश में जनतंत्र भी मज़बूत हो. मीडिया की जनतांत्रिकता, मीडिया की स्वतंत्रता, लोकतंत्र के बगैर मुश्किल है. आप देखिये, दुनिया के 180 मुल्कों का एक इंडेक्स जारी होता है. उस इंडेक्स को आप उठा कर देखिये, हर साल का आप पायेंगे कि जो सबसे ऊपर के 10 देश हैं, वो यूरोप के वो देश हैं जिन्हें पूंजीवादी जनतंत्र कहा जाता था. इन देशों में अमेरिका काफ़ी नीचे आता है. लेकिन जो तथाकथित समाजवादी जनतंत्र है, वहां की मीडिया के हालत आप देख लीजिये. आप वेनज़ुएला और रूस का हाल देख लीजिये, जो समाजवादी देश रहे हैं."इसी कड़ी में अतुल ने कहा कि "यह ठीक बात है कि अगर डेमोक्रेसी मज़बूत होगी, तो डेमोक्रेटिक मॉडल में कुछ ऐसी चीज़े लायी जायें जिससे मीडिया मज़बूत हो. ये तो एक पक्ष है. लेकिन रेवेन्यू के लिए कॉरपोरेट और सरकारी विज्ञापन के ऊपर जो निर्भरता है, क्या उसका कोई विकल्प है, क्योंकि वैसे तो पाठक के लिए न्यूज़ भी एक प्रोडक्ट है, जिसका वो कोई भुगतान नहीं कर रहा है. वह कैसे पता लगाये कि न्यूज़ कितनी सही होगी और कितने साफ़ तरीके से आ रही है. इस बात को मैं समझना चाह रहा हूं कि सब्सक्रिप्शन के अलावा और कोई मॉडल क्यों नहीं है रेवेन्यू के लिए?”जवाब में अनिल यादव ने कहा, “हम लोग थोड़ा जटिल दौर में आ गये हैं. रेवेन्यू जिन स्रोतों से आता है, उनका दबाव मीडिया के ऊपर होगा और जो खबरें आप दिखायेंगे वो प्रभावित होंगी. बात अब आगे बढ़ गयी है. आजकल मीडिया हॉउस सत्ता के साथ या जनविरोधी ताकतों के साथ मिल गया है. साथ होने के कारण वो पॉवरप्लेयर की भूमिका में आ गया है. तो दोनों फ्रंट पर सोचना पड़ेगा कि आप अगर सही रेवेन्यू मॉडल खोज भी लें, तो उस मॉडल के तहत आप लोगो को बतायेंगे क्या. पुराने समय वाला निष्पक्ष और चीजों से दूरी बनाकर रखने वाला मीडिया अब नहीं चलेगा. मुझे लगता है कि मॉडल एक ही है. आपका जो सब्सक्राइबर है और पाठक है, अगर वह जागरूक होता है तो सारी चीज़ों में भागीदारी करता है, जिससे सारी लोकतांत्रिक संस्थाएं बचती हैं. उसी तरह से जिस दिन से वो मीडिया को रेवेन्यू देने के लिए भागीदार करेगा और उस पर निगरानी रखने में भी भागीदार होगा, तो मुझे लगता है उस समय मज़बूत मीडिया हमें देखने को मिलेगा. इसके साथ-साथ लोकसभा चुनाव के नतीजों पर विस्तार से बातचीत हुई. पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 69: साध्वी प्रज्ञा का विवादित बयान, बंगाल में चुनावी हिंसा, खान मार्किट गैंग और अन्य
May 18 2019 59 mins  
इस हफ़्ते की चर्चा ऐसे वक़्त में आयोजित हुई जब राजनीति के गलियारों से लेकर पान की दुकानों तक संभावित चुनावी परिणामों की ही चर्चा हो रही है. इस बीच साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने एक विवादित बयान दिया, जिसमें उन्होंने गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बता दिया. ये मामला काफ़ी विवादों में आ गया और यहां तक कि पीएम मोदी को भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी पड़ी. पश्चिम बंगाल में इस पूरे हफ़्ते अमित शाह के रोड शो और उसमें हुई हिंसा के बाद बवाल खड़ा हुआ, जब ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा गिरा दी गयी. वहां की स्थितियों को देखते हुए चुनाव आयोग ने 1 दिन पहले ही चुनाव प्रचार को रोकने का आदेश दे दिया. इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की भारतीय जनता पार्टी की कार्यकर्ता प्रिंयका शर्मा को कंडीशनल बेल दी, जिन्हें ममता बनर्जी की एक फोटोशॉप्ड इमेंज शेयर करने की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया था. इसी बीच कांग्रेस के मणिशंकर अय्यर ने मोदी के ऊपर की गयी ‘नीच’ की टिप्पणी को एक लेख के द्वारा जारी रखा, साथ ही सैम पित्रोदा ने 84 सिंख दंगों पर ‘जो हुआ सो हुआ’ बोल कर कांग्रेस की परेशानी भी बढ़ा दी, जिसके बाद राहुल गांधी को इसके लिए सफाई देनी पड़ी. दूसरी ओर नरेंद्र मोदी ने इंडियन एक्सप्रेस में दिये साक्षात्कार में कहा कि मेरी छवि को किसी खान मार्किट की गैंग ने नहीं बनाया, बल्कि 45 साल की तपस्या से मैं यहां पहुंचा हूं. इसलिए इसे कोई खान मार्किट गैंग ख़त्म नहीं कर सकता. इसके अलावा, ईरान-भारत संबंधों, आने वाले मानसून और संभावित सरकार को भी चर्चा के विषयों में शामिल किया गया. चर्चा में इस बार तेज़-तर्रार युवा पत्रकार राहुल कोटियाल और अमित भारद्वाज शामिल हुए. साथ में वरिष्ठ लेखक-पत्रकार अनिल यादव ने चर्चा में शिरकत की. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. अतुल ने बातचीत शुरू करते हुए सवाल उठाया, साध्वी प्रज्ञा की जो राजनीति है, और जिस तरह की विचारधारा से वह आती हैं, उसमें गांधी और आज़ादी की लड़ाई से जुड़े अन्य नेताओं के प्रति घृणा का भाव दिखता है. जब ऐसा कोई बयान आया हो तो उसमें कोई आश्चर्यचकित होने वाली बात दिखती है?जवाब में अनिल ने कहा- “देखिये, इसमें मुझे कोई आश्चर्यचकित होने वाली बात नहीं दिखती, लेकिन इस बयान के बाद उस बड़ी विडंबना की ओर इशारा मिलता है, जिससे आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी को अपने जन्मकाल से ही दो-चार होना पड़ता है. आप अगर देखेंगे तो पायेंगे कि आरएसएस ऐसे मौकों पर अपने आप को एक बड़ी विचित्र स्थिति में पाता है. उसके पास ऐसे बहुत से नायक हैं, जो उसने उधार के लिए हुए हैं और वह उनके बारे में बता भी नहीं सकता और उनको इग्नोर भी नहीं कर सकता. मिसाल के तौर पर आप देखिये, जैसे वह कहता है कि गांधी से वह प्रेरणा लेता है और उनकी विचारधारा का हामी है. अंबेडकर को आरएसएस की फोटो गैलरी में जगह मिली हुई है. भगत सिंह ने तो शुरू से आरएसएस की विचारधारा का विरोध किया और गांधी को तो अपनी जान देनी, लेकिन ऐसी क्या मजबूरी है जो आरआरएस इनकी फोटो लगाता है, इनको अपना आदर्श बताता है. इसी के साथ एक और बात गौर करने की है, आरएसएस ने 15 अगस्त 1947 को आज़ादी के दिन अपने नागपुर मुख्यालय में तिरंगा झंडा नहीं फहराया, भगवा झंडा फहराया. उस समय के सर संघसचालक ने कहा था कि हम तिरंगे को नहीं मानते, अंखड भारत के लिए तो भगवा ध्वज ही है. फिर संविधान लागू हुआ तो इनको उससे भी दिक्कत थी, क्योंकि वे मानते थे कि जो हिंदुओं के रीति-रिवाज़ हैं, उसका संविधान विरोध करता है. तो एक तरफ तिरंगे और संविधान का विरोध और दूसरी तरफ अपने आप को राष्ट्रवादी कहना ये एक बड़ा विरोधाभास है. वहीं दूसरी तरफ, आज़ादी से निकले हुए नेताओं को अपना प्रेरणादायक बताना और उनके हत्यारे को देशभक्त बताना, स्पष्ट करता है कि आरएसएस ने इन लोगों को, संविधान को, झंडे को कभी दिल से स्वीकार नहीं किया.” इसी कड़ी में अतुल ने कहा कि “आज की पीढ़ी में तमाम ऐसे लोग हैं जो इस तरह की बातों में भरोसा रखते हैं और गांधी की हत्या को जायज़ ठहराने का काम तथा नाथूराम को महान बनाने का काम करते हैं. जब कोई बात शुरू होती है तो वह रुकती नहीं.इस मसले के साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 68: क्षेत्रवाद की राजनीति के आरोप पर तिलमिलाए मनीष सिसोदिया
May 11 2019 32 mins  
इस बार हमने चर्चा का स्वरूप थोड़ा बदल दिया है. आमतौर पर स्टूडियोमें पत्रकारों के बीच कई विषयों पर होने वाली चर्चा इस बार नहीं हुई.चुनाव का मौसम है. दिल्ली का लोकसभा चुनाव छठवें चरण में 12 मईको हो रहा है. लिहाजा हमने इस बार चर्चा को चुनाव के मैदान से करनेका तय किया. और हम पहुंचे दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया केपास. ‘आप’ के चुनावी घोषणापत्र के दावे, दिल्ली सरकार की नीतियों औरचुनावी अभियान के संबंध में मनीष सिसोदिया के साथ हमारी लंबी चर्चाहुई.देखा जाय तो दिल्ली के इस लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी काबहुत कुछ दांव पर लगा है. पार्टी सिर्फ दिल्ली, हरियाणा और पंजाब कीकुछ सीटों पर चुनाव लड़ रही है. ऐसे में चुनाव के नतीजे उसकी भविष्यकी योजनाओं पर दूरगामी असर पैदा करने वाले होंगे.आम आदमी पार्टी का मुख्य चुनावी अभियान इस बार दिल्ली को पूर्णराज्य का दर्जा दिलवाना है. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा एक ऐसी गेंदहै जिसे समय-समय पर अलग-अलग पार्टियां अपनी सुविधा के हिसाब सेउछालती और लपकती रही हैं. दिल्ली देश की राजधानी है लिहाजा इसकेपूर्ण राज्य की राह में कई तरह की जटिलताएं हैं. आप की मौजूदा स्थितिको देखते हुए दिल्ली को पूर्ण राज्य की मांग निकट भविष्य में भी पूरीहोने की संभावना नगण्य है. 30 के आस-पास लोकसभा सीटों पर लड़ रहीआप का मुख्य चुनाव अभियान एक काल्पनिक परिस्थिति पर निर्भर है.पार्टी का मानना है कि आगामी सरकार गैर भाजपा गठबंधन की सरकारहोगी. और उसके पास अगर दिल्ली की सात सीटें होती हैं तो वह पूर्णराज्य के बदले में अगली बनने वाली सरकार को समर्थन देगी. देखनाहोगा कि यह काल्पनिक स्थिति चुनाव बाद कितना साकार रूप लेती है.पार्टी के भविष्य के सवाल को इस लिहाज से भी देखा जा सकता है किनामांकन की तारीख से एक दिन पहले तक वह कांग्रेस पार्टी के साथगठबंधन की प्रक्रिया में थी. इससे एक सहज अटकल को बल मिलता हैकि जिस पार्टी को दिल्ली की जनता ने विधानसभा में 67 सीटें दी, उसआम आदमी पार्टी में आज दिल्ली में अकेले चुनाव लड़ पाने काआत्मविश्वास क्यों नहीं है.पार्टी के घोषणापत्र में कहा गया है कि आगामी सरकार बनने के बाद वहदिल्ली विश्वविद्यालय और तमाम दूसरे शिक्षण संस्थानों में 85 फीसदीसीटें दिल्ली के लोगों के लिए आरक्षित करेगी. एक पार्टी जो राष्ट्रीय स्तरपर एक बड़ा भरोसा, बड़े आंदोलन से शुरू हुई थी वह चुनाव से ठीक पहलेकिसी क्षेत्रीय दल की भाषा में बात कर रही है, क्षेत्रीय अस्मिता कोउभारने की कोशिश कर रही है.मनीष सिसोदिया ने इन तमाम सवालों पर विस्तार से अपना और पार्टीका पक्ष रखा. पूरा पॉडकास्ट सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एनएल चर्चा 67: मसूद अज़हर वैश्विक आतंकी घोषित, मिथकीय ‘येती’, श्रीलंका में बुर्क़े पर प्रतिबंध व अन्य
May 04 2019 54 mins  
इस हफ़्ते की चर्चा में सुप्रीम कोर्ट कोर्ट के मुख्य न्यायधीश जस्टिस रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की बाबत सुप्रीम कोर्ट के ही वकील एम एल शर्मा द्वारा कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण पर लगाये गये सीजेआई को साजिश के तहत फंसाने के आरोप, सेना के पर्वतारोही दल द्वारा ‘येती’ नामक मिथकीय जीव (हिम मानव) व उसके पदचिन्हों को देखने के दावे, आतंकी वारदात से निपटने के क्रम में श्रीलंका में सरकार द्वारा बुर्क़ा पहनने पर लगाये गये प्रतिबंध, देश के सियासी माहौल में प्रधानमंत्री का बंगाल के संदर्भ में बयान, राहुल गांधी की नागरिकता का सवाल व अन्य चुनावी उठा-पटक और अज़हर मसूद को ‘ग्लोबल टेररिस्ट’ घोषित किये जाने को चर्चा के विषय के तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार पूर्व पत्रकार व कम्युनिकेशन एक्सपर्ट दिवाकर आनंद ने शिरकत की. साथ ही लेखक-पत्रकार अनिल यादव व न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्द्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.बीते बुधवार को संयुक्त राष्ट्र ने अज़हर मसूद को ‘वैश्विक आतंकी’ घोषित कर दिया. इसके साथ ही जहां एक तरफ़ पिछले कुछ सालों में विकसित हुई परंपरा के तहत हर सकारात्मक वाकये की तरह इसे भी जहां ‘मोदी है तो मुमकिन है’ से जोड़ दिया गया, वहीं दूसरी तरफ़ मज़े कि बात है कि अमेरिका ने इसे अमेरिकी कूटनीति की जीत क़रार दिया. इसे मसले से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने कहा कि अज़हर मसूद वही आतंकी है जिसे भारत सरकार ने कंधार हाईजैकिंग मामले में तमाम यात्रियों की हिफाज़त और रिहाई के बदले में छोड़ा था. मुबंई के 26/11 के आतंकी हमले के बाद से ही ये कोशिश चल रही थी कि अज़हर मसूद को आतंकियों की सूची में डाला जाय. चीन लगातार इसके विरोध में खड़ा रहा. लेकिन अंततः मज़दूर दिवस के दिन संयुक्त राष्ट्र द्वारा अज़हर मसूद को वैश्विक आतंकी मान लिया गया. यह भारत सरकार के लिये कितना सिंबॉलिक है, कितनी बड़ी कूटनीतिक सफलता है?जवाब देते हुए आनंद ने कहा- “सफलता के लिहाज़ से कहें तो इससे निश्चित तौर पर न कहा जा सकता कि आतंकी वारदातों में कमी आएगी ही. अज़हर मसूद के ज़िंदा होने पर भी लोगों को शक है. अगर जीवित है तो उसकी गतिविधियों में कमी आ जाएगी, पूरी तरह ऐसा भी नहीं कहा जा सकता. लेकिन कूटनीतिक तौर पर यह बड़ी सफलता इसलिये है क्योंकि सुरक्षा परिषद् के जो स्थायी सदस्य हैं, यह वाकया एक तरह से उनपर भारत के प्रभाव का सूचक है. इसमें एक विघ्न चीन ही था, लेकिन उसे इसकी भरी कीमत अदा करने की गुंजाइश बढ़ रही थी और कुछ ख़ास फायदा हो नहीं रहा था. तो शायद चीन के लिये वो स्थिति आ गयी थी कि वो पीछे हटे. इसको इस संदर्भ में भी देखा जा सकता है कि इमरान खान हाल ही में चीन गये थे और उसमें क्या बातचीत हुई, लोग इस संदर्भ में भी इसका विश्लेषण कर रहे हैं. लेकिन इस पूरे वाकये को कांस्पीरेसी थियरी के रूप में देखूंगा.”इसी कड़ी में अतुल ने कहा कि भारत के संदर्भ में भारत-चीन का व्यापार किसी भी मसले में ख़ास अहमियत रखता है. तमाम तरह के सीमा से जुड़े विवाद और संकट होते हुए भी जब व्यापार की बात आती है तो दोनों देश मौके-मौके पर तमाम चीज़ों को छोड़कर आगे बढ़ते हैं. क्या इसको इस संदर्भ में देखा जा सकता है कि भारत के बाज़ार को मद्देनज़र रखते हुए चीन ने यह फ़ैसला लिया है?जवाब देते हुए अनिल कहते हैं- “कह सकते हैं क्योंकि इसके पहले चीन के फैसले लेने चीन की ख़ास टेंडेंसी रही है. एक तो उनके लिये अपना राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बेहद अहम है और वे इस मामले में कभी समझौता नहीं करते फिर चाहे वो अरुणाचल का मामला हो या अन्य सीमा विवाद. दूसरा व्यापार एक मसला है जहां वो कोई समझौता नहीं करते. इसका एक मतलब ये भी है कि दोनों ही मामले में वो लचीलापन नहीं दिखाते, अपने फ़ायदे की ही सोचते हैं. तो भारत को मसूद अज़हर के वैश्विक आतंकी घोषित किये जाने का निश्चित तौर पर चीन को व्यापार में फ़ायदा हो सकता है लेकिन भारत को कोई ख़ास फ़ायदा होता मुझे नहीं नज़र आ रहा.”दिवाकर कहते हैं- “यूपीए के वक़्त से ही यह कोशिश जारी थी. इसलिये इसे प्रथम दृष्टया कूटनीतिक सफलता मानना ठीक है. आपने बिल्कुल सही कहा कि इस मामले में हाफ़िज़ सईद के रूप में हमारे सामने बड़ा उदहारण है. इस घोषणा के बाद अब पाकिस्तान क्या करता है, भारत के साथ मिलकर इस दिशा में कितने असरदार तरीक़े से व कितना काम करता है, ख़ास तौर से इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि इमरान ख़ान बहुत बढ़-चढ़कर बयान देते रहे हैं और लगातार इस दिशा में पहल को तत्पर दिखे हैं.”इसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 65: साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से बीजेपी का टिकट, जेट एयरवेज़ की उड़ानें बंद और अन्य
Apr 20 2019 55 mins  
बीते हफ़्ते राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर घटित हुई घटनाओं ने कई मायनों में नयी बहस को जन्म दिया. चर्चा में इस हफ़्ते उन्हीं में से तीन बेहद ज़रूरी विषयों- जेट एयरवेज़ की उड़ानें बंद होने व हज़ारों की तादाद में लोगों के बेरोज़गार होने, विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज की इक्वाडोर के लंदन स्थित दूतावास से गिरफ़्तारी और भाजपा द्वारा तमाम आतंकवादी गतिविधियों में सह-अभियुक्त रही साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को 2019 के लोकसभा चुनावों में भोपाल से टिकट दिये जाने पर विस्तार से बातचीत की गयी.चर्चा में इस बार ‘प्रभात ख़बर-दिल्ली’ के ब्यूरो चीफ़ प्रकाश के रे ने शिरकत की. साथ ही चर्चा में लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.भारतीय जनता पार्टी द्वारा साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से टिकट दिये जाने के बाद एक बार फिर देश में उग्र हिंदुत्व की राजनीति ने जोर पकड़ लिया है. साध्वी प्रज्ञा सिंह ने 2019 के लोकसभा चुनावों को धर्मयुद्ध करार दिया है. साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बयानों के बाद अब धार्मिक भावनाओं के आधार की जाने वाली राजनीति तेज़ हो गयी है, जिसमें देशभक्ति का भी फ़्लेवर पड़ गया है. इसी मुद्दे से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने सवाल किया कि जिस तरह की उनकी छवि है व जिस तरह के उनपर आरोप हैं, उसके बाद उन्हें या उन जैसे किसी व्यक्ति के उम्मीदवार बनाये जाने के कुछ मक़सद होते हैं. ध्रुवीकरण होता है और जीत की संभावनाएं ऐसे में बढ़ जाती हैं. और जबकि भोपाल की सीट भाजपा के लिये सालों से सुरक्षित सीट रही है, तो पार्टी द्वारा ऐसे किसी उम्मीदवार के ऊपर दांव लगाने के पीछे क्या मक़सद हो सकता है?जवाब देते हुये प्रकाश कहते हैं- “उनको खड़ा करने के पीछे जो मक़सद है, उसपर बात करने के पहले हमें यह देखना चाहिए कि उनकी उम्मीदवारी के तकनीकी या कानूनी पहलू क्या हैं. एक समय स्वास्थ्य के आधार पर लालू प्रसाद यादव जमानत की अर्ज़ी दाख़िल करते हैं, तो उनकी अर्ज़ी खारिज़ कर दी जाती है और यहां स्वास्थ्य के नाम पर एक व्यक्ति जमानत पर बाहर है और वह जमानत भी अपने आप में सवालों के घेरे में है. एक और मामला हार्दिक पटेल का भी है, जिन्हें चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गयी. तो प्रज्ञा ठाकुर के मामले में यह एक बड़ा सवाल है और इसमें चुनाव आयोग के काम-काज पर भी सवालिया निशान है. मुझे लगता है कि आने वाले वक़्त में जब इन सब के कानूनी पहलुओं पर बहस होगी, उनका विश्लेषण किया जायेगा तब अदालतों को भी इसमें क्लीनचिट नहीं दी जा सकती है.”प्रकाश ने आगे कहा- “मुझे लगता है कि इस कैंडिडेचर के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साफ़-साफ़ घोषणा है कि अब हम उस मुक़ाम पर खड़े हैं, जहां हमें पर्दादारी की बहुत ज़रूरत नहीं है.”जवाब देते हुए अनिल कहते हैं- “साध्वी प्रज्ञा ठाकुर कैंडिडेट से ज़्यादा ख़ुद एक मुद्दा हैं. जैसे ही उन्हें उम्मीदवार बनाया गया, एक नये तरह का डिस्कोर्स शुरू हो गया. उन्होंने पहले तो कहा कि यह धर्मयुद्ध है और बाद में एटीएस द्वारा पूछताछ में उनके साथ जो कुछ भी किया गया होगा, उसे अत्याचार की अतिरंजित कहानी बताते हुये विक्टिम कार्ड खेला. और बीजेपी लगातार ट्रायल एंड एरर करते हुये गोलपोस्ट चेंज करती हुई नज़र आ रही है व उग्र हिंदुत्व की तरफ़ जा रही है. यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि भाजपा ने किसी साधु-संत को टिकट दिया हो. लेकिन पहली बार भाजपा ने एक ऐसी साध्वी को उम्मीदवार बनाया है, जिसके ऊपर कई सारी आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने व मददगार होने के आरोप हैं. यह इस बात की तरफ़ साफ़-साफ़ संकेत है कि जिन लोकतांत्रिक मूल्यों पर, जिस बुनियाद पर, जिन वायदों-इरादों से सरकार बनती है, भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह उनसे विमुख हो चुकी है.”अब जबकि चुनावी माहौल को धर्म व देशभक्ति के रंग में एक साथ रंगने की कोशिशें बदस्तूर जारी हैं, लोकतांत्रिक व संवैधानिक मूल्य कटघरे में हैं, संवेदनाएं व नैतिकताएं हाशिये पर हैं, धूमिल की कविता ‘पटकथा’ बेहद प्रासंगिक जान पड़ती है. उसी का एक हिस्सा अभी के माहौल पर बिल्कुल फिट बैठता है-यह जनता...इसकी श्रद्धा अटूट हैउसको समझा दिया गया है कि यहांऐसा जनतंत्र है जिसमेंघोड़े और घास कोएक-जैसी छूट हैकैसी विडंबना हैकैसा झूठ हैदरअसल, अपने यहां जनतंत्रएक ऐसा तमाशा हैजिसकी जानमदारी की भाषा हैहर तरफ़ धुआं हैहर तरफ़ कुहासा हैजो दांतों और दलदलों का दलाल हैवही देश भक्त हैइसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एपिसोड 64: राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, इमरान खान का नरेंद्र मोदी प्रेम और अन्य
Apr 14 2019 51 mins  
बीता हफ़्ता तमाम तरह की घटनाओं का गवाह रहा. इस बार की चर्चा जब आयोजित की गयी, उस वक़्त देश के कुछ हिस्सों में साल 2014 के बाद तनाव, द्वंद्व, संघर्ष, भ्रम व मायूसी के 5 सालों से हताश-निराश अवाम एक बार फ़िर उम्मीदों से बेतरह लैश होकर पहले चरण के मतदान में अपने मताधिकार का प्रयोग कर रही थी. चर्चा में इस हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल मामले में प्रशांत भूषण, यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए दिये गये फैसले, चुनाव के धड़कते माहौल में सीमा पार से आती ख़बर जिसमें इमरान ख़ान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व उनकी पार्टी द्वारा बहुमत हासिल करने पर भारत-पाकिस्तान संबंधों में गर्माहट आने की उम्मीद जतायी, बस्तर में नकुलनार इलाके में हुआ नक्सली हमला जिसमें बीजेपी के विधायक व 5 सीआरपीएफ जवानों समेत कुल छः लोगों की मृत्यु हो गयी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के ब्लॉग अपडेट व भाजपा के चुनावी घोषणापत्र पर चर्चा की गयी.इस हफ़्ते की चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने शिरकत की. साथ ही लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए दिये गये फैसले से चर्चा की शुरुआत करते हुए, अतुल ने सवाल किया कि एक तरफ़ सरकार द्वारा इस मामले से लगातार पीछा छुड़ाने के प्रयास लगातार जारी रहे और अब चुनावी उठापटक के बीच सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस तरह का फैसला दिये जाने के बाद अब आप राफेल मामले को किस तरफ़ जाता हुआ देखते हैं? क्या बात राहुल गांधी द्वारा लगातार लगाये जा रहे आरोपों की दिशा में आगे बढ़ गयी है?जवाब में पेंटागन पेपर्स का ज़िक्र करते हुए हृदयेश ने कहा, “यहां पर एक तो प्रोसीजर का मामला इन्वाल्व है, इसके साथ ही मामला पॉलिटिकल परसेप्शन का भी हो गया है. इस वक़्त कांग्रेस ने मैनिफेस्टो में जिस तरह से ख़ुद को सोशल प्लेटफ़ॉर्म पर ऊपर दिखाने की कोशिश की थी, इसके बाद प्रोपराइटी के मामले में एक बयानबाजी करने में उसको मदद मिलेगी.”इसी कड़ी में मीडिया के नज़रिये से इस मसले को देखते हुए अतुल ने सवाल किया कि इस मौके पर यह फैसला सरकार के लिए तो झटके जैसा है, लेकिन जबकि पिछले पांच सालों में लगातार यह बात चर्चा में रही कि मीडिया पर सरकारी दबाव है, मीडिया की आज़ादी के लिहाज़ से इसे कैसे देखा जाये? क्या मीडिया के लिए यह ऐसा मौका है, जो आगे बार-बार ऐतिहासिक संदर्भों में याद किया जायेगा?जवाब देते अनिल ने कहा, “देखिये! जहां तक मीडिया की बात है तो सुप्रीम कोर्ट ने ये सारी बात मीडिया के संदर्भ में नहीं की हैं. उसके द्वारा पेंटागन पेपर्स का ज़िक्र करना दरअसल एक लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी की बात करना है. वर्ना भारत में, ख़ास तौर से पिछले कुछ सालों में मीडिया में जो कुछ उठापटक, मनमुताबिक़ या डर वश फेरबदल चल रहा है, यह सबकुछ सुप्रीम कोर्ट की आंखों के सामने हो रहा. तो अगर सुप्रीम कोर्ट मीडिया की स्वतंत्रता का असल में पक्षधर होता, तो वह ज़रूरी दखल देता. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की चिंता ये नहीं है. दूसरी बात ये है कि जो मीडिया आर्गेनाईजेशन्स हैं, वो भी इस हालत में नहीं हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट मीडिया के पक्ष में कोई सकारात्मक बात करता है तो वो उसका फ़ायदा ले सकें, उसे आगे ले जा सकें. जो ज़्यादातर मीडिया आर्गेनाईजेशन्स हैं, वो बिना नाखून व दांत वाली संस्थाओं में तब्दील हो गये हैं.”इसके साथ-साथ बाक़ी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बातचीत हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 63: कांग्रेस का चुनावी घोषणापत्र, मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट, पीएम नरेंद्र मोदी फ़िल्म और अन्य
Apr 14 2019 55 mins  
बीता हफ़्ता बहुत सारी घटनाओं का साक्षी रहा है. इस हफ़्ते की चर्चा तब आयोजित हुई, जबकि चुनावी सरगर्मियां चरम पर थीं और पहले चरण के चुनाव में हफ़्ते भर से भी कम वक़्त रह गया था. इस हफ़्ते की चर्चा में ‘टाइम मैगज़ीन’ द्वारा पेशे का जोख़िम उठा रहे पत्रकारों की सूची में इस बार हिंदुस्तान की स्वतंत्र पत्रकार राना अयूब का नाम दर्ज़ करने व पेशे में पत्रकारों के लिए लगातार बने हुए खतरों, देशभर में महिलाओं के लिए रोजगार की संभावनाओं पर विस्तार से बात करती ऑक्सफेम इंडिया की रिपोर्ट, राहुल गांधी द्वारा पहली दफ़ा दो जगहों से लोकसभा चुनाव लड़ने, कांग्रेस पार्टी के चुनावी घोषणापत्र व आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की घटनाओं पर चर्चा के क्रम में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बायोपिक, जिसमें अभिनेता विवेक ओबेरॉय उनका किरदार निभा रहे, पर चर्चा की गयी.चर्चा में इस बार वरिष्ठ पत्रकार हृदयेश जोशी ने शिरकत की. साथ ही लेखक-पत्रकार अनिल यादव व न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.कांग्रेस पार्टी के चुनावी घोषणापत्र से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने कहा कि कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में शिक्षा व कृषि के क्षेत्र के लिए किए गये वायदों, अलग से कृषि बजट जारी करने व ‘न्याय’ योजना जिसमें देश में ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे पांच करोड़ परिवारों को 6000 रुपये की मासिक आर्थिक मदद की बात कही गयी है. अतुल ने इसी में अपनी बात जोड़ते हुए कहा कि इन सबको ध्यान में रखते हुए अगर चुनावी घोषणापत्र पर गौर करें तो इसमें समाजवादी रुझान की झलक मिलती है, साथ ही इसमें उस लीक से थोड़ा हटकर चलने का प्रयास भी देखने को मिलता है, जिसका निर्माण ऐसे समय में हुआ जब बाज़ारवाद ने अर्थव्यवस्था को अपनी पकड़ में ले लिया है, इस संबंध में आपकी क्या राय है?जवाब देते हुए हृदयेश जोशी ने कहा- “आपने सोशलिस्ट शब्द का इस्तेमाल किया. यहां मूल बात समझने की ये है कि शुरुआत से ही पार्टियों का और ख़ास तौर पर कांग्रेस पार्टी का ये अनुभव रहा है कि जब-जब वो अपनी इस सोशलिस्ट लाइन से हटी है, उसका जनाधार बुरी तरह खिसका है. अगर आप कुछ वक़्त पहले अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ के इंडियन एक्सप्रेस में छपे लेख ‘रैश यू टर्न, हाफ-बेक्ड प्लान्स’ पर गौर करें तो उनका कहना है कि ये जो कैज़ुअल एप्रोच है, चाहे वो प्रधानमंत्री मोदी का ही रहा हो जबकि वो दक्षिणपंथी पार्टी के नेता हैं और खुलेआम पूंजीवादी रुझान में बातें करते हैं, उनका भी किसानों को 6000 रुपये देना सोशलिस्ट स्कीम ही कही जायेगी. लेकिन यह एक तरह का एड-हॉक एप्रोच है कि जब आपको लगे कि लोगों को ख़ुश करने की ज़रूरत है और कुछ ऐसा कर दिया जाये. साल 2004 में कांग्रेस की जब सरकारी बनी, तो मनरेगा जैसी योजनाएं चलाने के बाद अगले चुनाव में उनका जनाधार बढ़ा था, मुझे लगता है कांग्रेस उसी लाइन पर लौटने का प्रयास कर रही है.”जाति-धर्म, संप्रदाय या देश व देशभक्ति के नाम पर किए जा रहे ध्रुवीकरण व हर सवाल के ऊपर आख़िरी ट्रंप-कार्ड की तरह राष्ट्र को रख देने के दौर में कांग्रेस का चुनावी घोषणापत्र कहता है कि सत्ता में आने पर पार्टी आफ्सपा को डाइलूट करेगी, उसके प्रावधानों में कमी लायेगी, साथ ही राजद्रोह के कानून को ख़त्म करेगी. इन्हीं बातों का ज़िक्र करते हुए अतुल ने सवाल किया कि ऐसे वक़्त में कांग्रेस के इस कदम को किस तरह देखना चाहिए? क्या यह साहसी कदम है? या कांग्रेस ने एक तरह से रिस्क लिया है?जवाब देते हुए अनिल ने कहा- “मुझे जो पहली चीज़ लगी, वो ये कि कांग्रेस ने यह कदम हताशा में उठाया है. मुझे ऐसा लगता है कि पिछले पांच सालों के दौरान सेडीशन के मामले हुए हैं, आफ्सपा के भी हुए हैं तो इन सारे मुद्दों पर कांग्रेस की अगर कोई स्पष्ट नीति होती तो वो इन पर बात करती हुई दिखाई देती. मुझे लगता है राहुल गांधी को लग रहा है कि यह डू ऑर डाई का मामला है.”इसी सवाल पर अपना नज़रिया रखते हुए आनंद कहते हैं- “मुझे लगता है चुनावी घोषणापत्र अकादमिक रुचि व उपभोग की ही चीज़ें होती हैं, चुनाव प्रचार और रैलियों में क्या बोला जा रहा है, वह अधिक महत्वपूर्ण है.”इसके साथ-साथ बाकी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बहस हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 62: मोदी का राष्ट्र के नाम संदेश, राहुल की न्याय योजना और अन्य
Apr 14 2019 52 mins  
चुनावी गहमा-गहमी के बीच बीता हफ़्ता तमाम अच्छी-बुरी खबरों के साथ हिंदुस्तान के लिए एक उपलब्धि लेकर आया. इस हफ़्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भारत की हालिया उपलब्धि को बताते हुए राष्ट्र के नाम संदेश जारी संदेश, राहुल गांधी द्वारा चुनावी अभियान के तहत की एक बड़ी योजना ‘न्याय’ का ऐलान, पिछले हफ़्ते होली के रंगों को धूमिल करती हुई व सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने वाली गुड़गांव में एक मुस्लिम परिवार के साथ हुई हिंसक वारदात और सामाजिक कार्यकर्ता व अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ की झारखंड में हुई गिरफ़्तारी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रिपब्लिक भारत चैनल को दिया गया इंटरव्यू आदि चर्चा में विषय के तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार लेखक-पत्रकार अनिल यादव व हिंदुस्तान अख़बार के विशेष संवाददाता स्कंद विवेकधर शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ज़ारी राष्ट्र के नाम संदेश में उपग्रह को मार-गिराने की क्षमता के ज़िक्र के साथ चर्चा की शुरुआत हुई. अतुल ने पॉलिटिकल पार्टियों का हवाला देते हुए सवाल किया कि क्या इसकी ज़रूरत थी कि प्रधानमंत्री इतना ज़्यादा सस्पेंस बनाते हुए इसकी घोषणा करें? इसमें दूसरी बात यह भी शामिल की गई कि इसको भारत सरकार की तरफ़ से इस तरह पेश किया गया कि इसमें 1974 या 1998 में हुए परमाणु परीक्षण जैसी कोई बात है. आप इन दोनों ही बातों को किस तरह देखते हैं?जवाब देते हुए अनिल ने कहा, “वास्तव में प्रधानमंत्री को राष्ट्र के नाम विशेष संबोधन के ज़रिए इसे बताने की आवश्यकता नहीं थी. अगर राष्ट्र के नाम संबोधन की आवश्यकता थी तो वह पुलवामा हमले के समय ज़्यादा थी. पूरा देश उस समय बहुत सदमे में था, लोगों में नाराज़गी थी. वो एक बड़ी घटना थी, पूरे देश को हिला देने वाली. लेकिन उस वक़्त प्रधानमंत्री को यह ज़रूरत नहीं महसूस हुई कि राष्ट्र के नाम विशेष संबोधन दें. लेकिन ये जो घटना हुई कि तीन मिनट के भीतर अपने ही कबाड़ हो चुके एक उपग्रह को एक मिसाइल द्वारा नष्ट कर दिया गया तो उन्होंने पूरे देश को बताया. तो इसके पीछे जो मकसद है वो प्रोपेगैंडा का है.”इस घटना पर विपक्ष द्वारा सवाल उठाए जाने पर- ‘विपक्ष हर चीज़ पर सवाल खड़े कर रहा है’- जैसी बात भारतीय जनता पार्टी व प्रधानमंत्री द्वारा बार-बार कही जा रही है. इस बात का ज़िक्र करते हुए अतुल ने सवाल किया कि अब जबकि इस समय आदर्श आचार संहिता लागू है तब इसे राजनीति के चश्मे से देखा जाए या नहीं?जवाब देते हुए स्कंद ने कहा, “ये कहना कि इसमें राजनीति नहीं है, बिल्कुल ग़लत होगा. प्रधानमंत्री ने अगर राष्ट्र के नाम संबोधन किया तो उन्होंने यह भी राजनीतिक नज़रिए से ही किया है क्योंकि अभी चुनाव सिर पर हैं और सत्तारूढ़ दल भाजपा चाहता है कि पूरा का पूरा चुनाव इस बात पर हो कि राष्ट्र के लिए मजबूती से निर्णय लेने वाला दमदार प्रधानमंत्री कौन है. वो पूरा नैरेटिव इस पर ही शिफ्ट कर रहे हैं. यह हमारी बड़ी उपलब्धि हैं, हम इनकार नहीं कर सकते. ख़ास तौर से तब जबकि चीन जिससे आपके बहुत अच्छे रिश्ते नहीं हैं, उसके पास यह ताकत है. और आने वाले वक़्त में ऐसे मौके बने हुए हैं कि युद्ध के दौरान कोई देश आपके उपग्रहों को नष्ट कर दे तो आपके पास एक डेटरेंस होना चाहिए.”इसके साथ-साथ बाकी विषयों पर भी चर्चा के दौरान विस्तार से बहस हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 61: येदियुरप्पा की डायरी, आडवाणी का टिकट कटना और अन्य
Apr 14 2019 55 mins  
बीत रहा हफ़्ता रंगों के त्यौहार ‘होली’ के उल्लास में डूबा रहा. इस बीच तमाम घटनाएं अप्रभावित अपनी गति से घटती रहीं. तमाम चिंताजनक वारदातों से अप्रभावित प्रधानमंत्री के कार्यक्रम वक़्त और तारीख़ में बिना किसी फेरबदल के आयोजित होते रहे. ऐसे में नज़ीर अकबराबादी का होली पर लिखा गीत ‘होली की बहारें’ बेहद मानीखेज़ है. उनके लिए फिराक़ गोरखपुरी लिखते हैं कि नज़ीर दुनिया के रंग में रंगे हुए महाकवि थे. वे दुनिया में रहते थे और दुनिया उनमें रहती थी, जो उनकी कविताओं में हंसती-बोलती, जीती-जागती त्यौहार मनाती नज़र आती है. गीत के कुछ अंश इस प्रकार हैं-“जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली कीऔर दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली कीपरियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली कीख़ुम, शीशे, जाम झलकते हों तब देख बहारें होली की.”अनिल यादव गीत के बारे में बताते हुए कहते हैं कि ऐसे वक़्त में जब सांप्रदायिक आधारों पर समाज को बांटने की कोशिशें बदस्तूर जारी हैं, यह गीत इस लिए भी सुना/ पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि इससे पता चलता है कि हमारी साझी संस्कृति का रंग कितना गहरा है.रंगों के त्यौहार पर संक्षिप्त बातचीत व गीत के ज़िक्र के बात चर्चा के विषयों की ओर लौटना हुआ. इस हफ़्ते की चर्चा में भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा उम्मीदवारों की पहली सूची जारी हुई जिसमें वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी का नाम नहीं होने के बाद अब उनके राजनीतिक अवसान, पंजाब नेशनल बैंक से तकरीबन 13000 करोड़ रूपये के गबन के बाद देश से फरार चल रहे नीरव मोदी की लंदन में हुई गिरफ़्तारी, पत्रकार बरखा दत्त को गालियां देने व जान से मारने की धमकी देने वाले कुछ लोगों को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाने, न्यूज़ीलैण्ड में मस्जिदों में घुसकर दो बन्दूकधारियों द्वारा तकरीबन 50 लोगों की हत्या की आतंकवादी घटना, प्रधानमंत्री के चुनावी अभियान ‘मैं भी चौकीदार’ और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की सीक्रेट डायरी प्रकाश में आने, उससे सामने आ रहे तथ्यों को चर्चा में विशेष तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार लेखक-पत्रकार अनिल यादव व न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन शामिल हुए. चर्चा का संचालन हमेशा की तरह न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.कर्नाटक के डायरी-प्रकरण से चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने सवाल किया कि यह डायरी कथित तौर पर कांग्रेस के नेता वीके शशि कुमार के घर से ज़ब्त की गई थी. 2017 से यह डायरी वित्त मंत्रालय के संज्ञान में होने के बावजूद सरकार द्वारा डायरी को दबाकर बैठे जाने को राजनीतिक प्रक्रिया के लिहाज़ से कैसे देखा जाए? क्या इसे तेज़ होती चुनावी सरगर्मियों के बीच कांग्रेस पार्टी द्वारा सनसनी पैदा करने की एक कोशिश कह सकते हैं या फिर यह डायरी बताती है कि राजनीतिक संस्कृति में भारतीय जनता पार्टी भी उतनी ही करप्ट है जितनी कि कांग्रेस?जवाब देते हुए अनिल ने कहा, “देखिए! करप्ट तो सारी पार्टियां हैं. असल बात ये है कि कोई राजनीतिक पार्टी उस करप्शन का पॉलिटिकल मैनेजमेंट कैसे करती है. बीजेपी ने इसका मैनेजमेंट करने के लिए अरसा पहले ही ‘पार्टी विद अ डिफरेंस’ का नारा दिया.” इसी क्रम में 2014 के चुनाव के वक़्त के प्रधानमंत्री मोदी के नारे ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ का ज़िक्र करते हुए अनिल ने कहा, “पूरे कार्यकाल में बीजेपी के बड़े नेता लगातार कहते रहे हैं कि हमारी सरकार में सब हुआ लेकिन करप्शन नहीं हुआ. लेकिन अब एक के बाद जैसी ख़बरें आ रही हैं वो बताती हैं कि उनका जो करप्शन का प्रबंधन करने का तरीक़ा था वो नाकाम हो गया और ये जो करप्शन हो रहे हैं वो पहले से भी बड़े करप्शन हैं. मुझे लगता है कि नैतिक मुद्रा अपना करके, झूठ बोल करके बीजेपी ने छवि-प्रबंधन की जो कोशिश की थी अब उसके चीथड़े उड़ रहे हैं.”इसी कड़ी में इस बात का ज़िक्र करते हुए कि जब येदियुरप्पा का पूरा कार्यकाल भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा व उन्हें इस्तीफ़ा भी देना पड़ा अतुल ने सवाल किया कि उस पूरे मामले के लिहाज से इस पूरी राजनीतिक संस्कृति पर गौर करते हुए क्या आपको लगता है कि यह महज़ चुनाव के पहले महज़ एक हथकंडा अपना जा रहा है?अपने जवाब में आनंद वर्धन ने कहा, “चुनाव के मौसम में इस तरह की तमाम कहानियां दोनों पक्षों से आएंगी. दूसरी बात कि ‘पार्टी विद अ डिफ़रेंस’ नब्बे के दशक में भाजपा की अपील रही है. मेरे ख़याल से उसके बाद उसकी यह अपील नहीं रही है. यह मुख्यधारा की राष्ट्रीय पार्टी है जो परसेप्शन की लड़ाई ज़्यादा लड़ेगी. और राजनीति में यह तात्कालिक जरूरतों पर हमेशा भारी पड़ता है.” See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 60: लोकसभा चुनाव की तारीखें, सर्फ एक्सेल विवाद और अन्य
Apr 14 2019 54 mins  
बीता हफ़्ता कई वजहों से चर्चा में रहा. चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा की जिसके साथ ही नेताओं की बयानबाजी का दौर शुरू हो गया. इस हफ़्ते की कुछ प्रमुख घटनाओं मसलन कर्नाटक के बीजेपी नेता अनंत कुमार हेगड़े का राहुल गांधी और उनके परिवार पर आपत्तिजनक टिप्पणी करना, हिंदुस्तान यूनीलीवर के उत्पाद ‘सर्फ़ एक्सेल’ के होली से जुड़े एक विज्ञापन पर उठा विवाद, अदालत की अवमानना के आरोप के चलते शिलॉन्ग टाइम्स की एडिटर पैट्रीशिया मुखीम पर मेघालय हाईकोर्ट द्वारा लगाया गया जुर्माना और जुर्माने की अदायगी में असफल रहने पर 6 महीने की जेल के साथ अख़बार बंद करने का आदेश, आदि विषय इस बार की चर्चा में शामिल रहे.चर्चा में इस बार पत्रकार राहुल कोटियाल ने बतौर मेहमान शिरकत की. साथ ही न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकार आनंद वर्धन व लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी चर्चा में शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने कहा कि हमारे समाज या समय में हर चीज़ के साथ विवाद जुड़ जाने की एक परंपरा विकसित हो गई है और अब किसी भी चीज़ का विवादों के साए में चले जाना आम सी बात हो गई है. चुनाव की तारीख़ों के ऐलान के बाद रमज़ान के महीने में चुनाव होने और चुनाव की तारीख़ों व फेज़ को लेकर भी विवाद हो गया. राजनीतिक गलियारों में लगाई जा रही इन अटकलों का ज़िक्र करते हुए कि चुनाव की तारीख़ें बीजेपी के मुफ़ीद हैं, अतुल ने सवाल किया कि इस विवाद को कैसे देखा जाए? क्या इसमें विपक्ष को किसी भी तरह का डिसएडवांटेज है?जवाब देते हुए अनिल ने कहा, “ये चुनाव काफ़ी अविश्वास के माहौल में हो रहे हैं. एक संभावना यह भी थी कि क्या पता चुनाव हों ही न. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ये अटकलें लगाई गईं कि हो सकता है प्रधानमंत्री मोदी आपातकाल लागू करने के लिए इस अवसर का इस्तेमाल करें और चुनाव आगे चलकर तब कराएं जब परिस्थितियां उनके पक्ष में हो जाएं दूसरा एक बहुत बड़ी आशंका पिछले पांच सालों में हवा में रही है कि ईवीएम के ज़रिए चुनाव में गड़बड़ी की जाती है. तो एक तरह से सरकार और चुनाव आयोग के प्रति पिछले पांच सालों में एक अविश्वास का माहौल हवा में रहा है और उसी पृष्ठभूमि में ये चुनाव हो रहे हैं. तो जहां असुरक्षा होती है, अविश्वास होता है, हर चीज़ के दूसरे अर्थ निकाले जाते हैं. और मुझे यह लगता है कि चुनाव का कई फेज़ में होना किसी के भी पक्ष जा सकता है. सिर्फ भाजपा को ही इसका फायदा मिलेगा, यह सोचना ठीक नहीं है.”विवाद लाज़मी था या ग़ैरज़रूरी? इस सवाल का जवाब देते हुए आनंद कहते हैं, “हम लोग अतिविश्लेषण युग में रह रहे हैं, हर चीज़ का विश्लेषण बहुत अधिक होता है, और अतिविश्लेषण के बाद कुछ न कुछ तो निष्कर्ष निकलता ही है. या निष्कर्ष तय करके फिर विश्लेषण कर लिया जा रहा है. यह दोनों ही चीज़ें हो रही हैं.” आनंद ने इसी में आगे जोड़ते हुए कहा कि अगर इस तरह कि अटकलें इवीएम के स्तर पर हैं तो फिर चुनाव की तारीख़ें और चरण क्या हैं उस आरोप का कुछ ख़ास मतलब नहीं रह जाता.नवीन पटनायक द्वारा 33% और ममता बनर्जी द्वारा 35% टिकट महिलाओं को दिया जाना क्या बाकी दलों पर एक दबाव की तरह काम करेगा? महिला आरक्षण का कानून पास हुए बिना ही राजनीतिक दल इस तरह के सकारात्मक बदलाव करने के लिए मजबूर हैं? इस सवाल के जवाब में राहुल कहते हैं, “बिल्कुल! पहली ही नज़र में यह बहुत सकारात्मक कदम लगता है. अब बीजेपी-कांग्रेस जैसे दलों में फैसले आलाकमान की तरफ से लिए जाते हैं. टिकटों का निर्धारण वहीं से होता है. ऐसे में इन पार्टियों के लिए टिकट बंटवारे में 33% सीटें महिलाओं के देने की बात करना मुश्किलों भरा हो जाएगा क्योंकि तब इन्हें कैंडिडेट ढूंढ़ने में ख़ासी मशक्कत करनी पड़ेगी.”इसी क्रम में बाकी विषयों पर भी बेहद गंभीर व दिलचस्प चर्चा हुई. बाकी विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने-समझने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 59: सांसद-विधायक जूतम पैजार, अयोध्या, राफेल और अन्य
Apr 14 2019 45 mins  
बीते हफ़्ते एक तरफ़ जहां कुछ बेहद अहम मुद्दे चर्चा में रहे वहीं कुछ घटनाएं मीडिया गलियारों में सनसनी की तरह छाईं रहीं. इस हफ़्ते की चर्चा में हमने उन्हीं में से कुछ को विषयों के लिया. उत्तर प्रदेश के संत कबीरनगर में सांसद और विधायक के बीच हुई जूतम-पैजार की घटना और भारतीय राजनीति की अहंकार-नीति, अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद और विवाद सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा हुई तीन मध्यस्थों की नियुक्ति, राफेल डील से जुड़े कुछ दस्तावेज़ों की चोरी, सरकार के रवैये और द हिन्दू को निशाने पर लिए जाने और प्रधानमंत्री द्वारा मानवीय गरिमा और समझ-बूझ को परे रखते हुए बेहद संवेदनहीनता से डिस्लेक्सिया पीड़ितों का मज़ाक उड़ाए जाने की घटना को चर्चा के विषय के तौर पर लिया गया.चर्चा में इस बार ‘पेट्रियट’ न्यूज़पेपर के सीनियर एसोसिएट एडिटर मिहिर श्रीवास्तव ने बतौर मेहमान शिरकत की. साथ ही चर्चा में लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत में ‘न्यूडिटी’ पर अपने शोध और क़िताबों के लिए मशहूर मिहिर इस विषय पर अपनी संक्षिप्त राय रखते हुए कहते हैं, “जहां तक न्यूडिटी का सवाल है, इसके नाम पर कुछ लोग संस्कृति के ठेकेदार बने फिरते हैं. लोगों को मारते हैं, पेंटिंग फाड़ देते हैं, उन्हें यह समझना चाहिए कि जिस चीज़ की वह सुरक्षा करने में लगे हैं, वह भारत की संस्कृति नहीं है. वह ‘विक्टोरियन मोरैलिटी’ है. यह ‘विक्टोरियन मोरैलिटी’ ढाई-तीन सौ साल पहले अंग्रेज़ी शासन के दौरान हम पर थोपी गई है.”इसके बाद उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में हुए ‘जूता-प्रकरण’ से चर्चा के निर्धारित विषयों की ओर लौटते हुए चर्चा की शुरुआत हुई. भारतीय समाज और राजनीति में पद-प्रतिष्ठा और नाम की भूख और इससे पैदा अहंकार पर बात करते हुए अतुल सवाल करते हैं, “नाम की भूख और यश लोलुपता की यह परंपरा इस स्तर तक पहुंच जाए कि वह ‘जूता’ चलने की एक परंपरा को जन्म दे और वह परंपरा अमर हो जाए, आप इसे कैसे देखते हैं?”जवाब में बरसों पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा में जूतम-पैजार की घटना का ज़िक्र करते हुए अनिल कहते हैं, “जो लोग पॉलिटिक्स में हैं, वो अपनी जो छवि पेश करते हैं, वो असल में वैसे हैं नहीं. वो पोज़ करते हैं कि वो लोगों की सेवा करने के लिए, अपने इलाके का विकास करने के लिए या जो अन्याय, ग़रीबी है उसे ख़त्म करने के लिए वो पॉलिटिक्स में हैं. लेकिन वो मूलतः पॉलिटिक्स में अपनी प्रतिष्ठा के लिए हैं, अपने अहंकार, अपने जलवे, अपने दबदबे के लिए हैं. इस बात को वो आम तौर पर छिपाए रहते हैं लेकिन ये बात छिपती नहीं है. और जहां भी ज़रा सा ऊंच-नीच होता है यह छवि उभर कर सामने आ जाती है.”इसी बात को आगे बढ़ाते हुए मिहिर कहते हैं, “इसमें महत्वपूर्ण बात यह भी है कि कोई परोपकार करने तो पॉलिटिक्स में आता नहीं है और किसी को इस ग़लतफ़हमी में रहना भी न चाहिए. लेकिन जो बात ये जूताबाजी सामने लाती है, वो है असहिष्णुता. यहां ये बात है कि अगर पद-प्रतिष्ठा में मैं ऊंचा हूं तो आप मेरी बात सुनेंगे और अगर नहीं सुनेंगे तो जूता खाएंगे.”चर्चा में अतुल ने श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ का एक अंश पढ़ा जिसे इस घटना से जोड़कर देखना बेहद मौजूं है, “इस बात ने वैद्यजी को और भी गंभीर बना दिया, पर लोग उत्साहित हो उठे. बात जूता मारने की पद्धति और परंपरा पर आ गई. सनीचर ने चहककर कहा कि जब खन्ना पर दनादन-दनादन पड़ने लगें, तो हमें भी बताना. बहुत दिन से हमने किसी को जुतिआया नहीं. हम भी दो-चार हाथ लगाने चलेंगे. एक आदमी बोला कि जूता अगर फटा हो और तीन दिन तक पानी में भिगोया गया हो तो मारने में अच्छी आवाज़ करता है और लोगों को दूर-दूर तक सूचना मिल जाती है कि जूता चल रहा है. दूसरा बोला कि पढ़े-लिखे आदमी को जुतिआना हो तो गोरक्षक जूते का प्रयोग करना चाहिए. ताकि मार तो पड़ जाए, पर ज़्यादा बेइज्ज़ती न हो. चबूतरे बैठे-बैठे एक तीसरे आदमी ने कहा कि जुतिआने का सही तरीक़ा यह है कि गिनकर सौ जूते मारने चले, निन्यानबे तक आते-आते पिछली गिनती भूल जाय और एक से गिनकर फिर नये सिरे से जूता लगाना शुरू दे. चौथे आदमी ने इसका अनुमोदन करते हुए कहा कि सचमुच जुतिआने का यही तरीक़ा है और इसीलिए मैंने भी सौ तक गिनती याद करनी शुरू कर दी है.”इसके अलावा अन्य विषयों पर भी बेहद दिलचस्प चर्चा हुई. बाकी विषयों पर पैनल की राय जानने-सुनने के लिए पूरी चर्चा सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 58: भारत-पाकिस्तान तनाव, चैनलों को नोटिस और अन्य
Apr 14 2019 54 mins  
बीता पूरा हफ़्ता काफ़ी उठापटक भरा रहा. चर्चा में उन्हीं में से कुछ विषयों पर विस्तार से बात की गई. इस हफ़्ते की सबसे महत्वपूर्ण घटना रही, भारत और पाकिस्तान के हवाई हमलों के बाद पैदा हुआ तनाव. पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकवादी ठिकानों पर कार्रवाई की थी. बदले में पाकिस्तान ने भारत की हवाई सीमा का उल्लंघन किया. भारत- पाकिस्तान के बीच पैदा तनाव की वजह से एक और महत्वपूर्ण घटना जो उस तरह से सुर्ख़ियों में न आ सकी, वह अरुणाचल प्रदेश में वहां के स्थानीय निवासियों द्वारा किया गया बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन है. टकराव की वजह वहां पर ऐसे छः समुदायों को ‘स्थानीय निवासी प्रमाणपत्र’ देने की सिफ़ारिश थी जो मूल रूप से अरुणाचल के निवासी नहीं हैं, लेकिन दशकों से नामसाई और चांगलांग जिलों में रह रहे थे.तीसरी घटना जो इस हफ़्ते चर्चा का विषय रही, वह है 13 से ज़्यादा चैनलों को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा नोटिस जारी किया जाना. इन चैनलों के ऊपर आरोप है कि उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य प्रवक्ता मेजर जनरल गफूर की उस प्रेस कांफ्रेंस को लाइव दिखाया. जिसमें वो भारत को हमले का जवाब देने की धमकी दे रहे थे. सरकार का इस पर कहना रहा कि यह ग़लत परम्परा है, इससे देश की एकता और अखंडता पर संकट पैदा हो सकता है.इस हफ्ते चर्चा में ‘द ट्रिब्यून’ की डेप्युटी एडिटर स्मिता शर्मा बतौर मेहमान शिरकत की. साथ ही चर्चा में हमारे साथ लेखक-पत्रकार अनिल यादव भी शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.भारत-पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण माहौल पर चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने एक सवाल रखा कि ऊरी हमले के बाद पिछला जो सर्जिकल स्ट्राइक हुआ और अब ये जो इंडियन एयरफोर्स ने किया है, इससे क्या वह धारणा टूट गई है कि न्यूक्लियर पॉवर रहते हुए भी इस तरह की परिस्थितियां आने पर या किसी तरह की क्रॉस बॉर्डर टेररिज्म की स्थिति में हम पाकिस्तान को जवाब दे सकते हैं? या हम न्यूक्लियर पॉवर होते हुए भी एक लिमिटेड लेवल पर एक दूसरे से कॉन्फ्रंट कर सकते हैं?इसका जवाब देते हुए स्मिता ने कहा कि अगर आप न्यूक्लियर डेटरेंस की बात करते हैं तो न्यूक्लियर डेटरेंस क्या है? इस कांसेप्ट को लेकर बहुत चर्चाएं होती रहती हैं. जब आपके पास परमाणु हथियार होता है तो क्या वो सही में डेटरेंस का काम करता है? या सामने वाले को और प्रोवोक करता है. सामने वाले को और आक्रामक रवैया अपनाने पर मजबूर करता है. इसकी वजह से हम एक ‘आर्म्स रेस’ देखते हैं.स्मिता कहती हैं, “इन सबके बीच दो चीज़ें हमें नहीं भूलनी चाहिए. पुलवामा में हमला हुआ, जैश-ए-मोहम्मद ने जिसकी ज़िम्मेदारी ली. 40 जवानों की जानें गईं. भारत जैसे देश में, जो आज विश्व भर में खुद को एक बड़ी पोजीशन पर महसूस कर रहा है. इस वक़्त चुनाव हों या न हों, लेकिन हमले से एक दबाव निश्चित तौर पर बन जाता है सरकार पर कि वो कोई न कोई कार्रवाई ज़रूर करे. भारत ने जवाबी हमला करते हुए कहा कि हमने बालाकोट में गैर सैन्य हमला किया है. और सूत्रों के हवाले से पता चला कि यह बालाकोट दरअसल पाक के कब्जे वाले कश्मीर में नहीं बल्कि खैबर पख्तूनख्वाह में है, जो पाकिस्तान की सीमा के बिल्कुल अंदर है.”स्मिता आगे कहती हैं, “भारत, अमेरिका जैसा एक देश हो जो ऐब्टाबाद में घुसकर नेवी सील्स के ज़रिए ओसामा बिन लादेन को मार गिराता है. पर यहां वैसा नहीं है. भारत-पाकिस्तान की सीमाएं लगी हुई हैं. हमारी जो हक़ीकत है वो अमेरिका और पाकिस्तान की हकीकत से अलग है. इसलिए हमें साईट नहीं लूज करनी चाहिए.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल ने कहा, “बार बार ये जो स्थिति आती थी कि हम दोनों न्यूक्लियर पॉवर होने की वजह से लगभग तल पर आ गए हैं. ये न्यूक्लियर ब्लैकमेल पाकिस्तान की तरफ से होता था. हम एक सीमा से आगे नहीं जा सकते थे. लेकिन अब ये कहा जा रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने इस धारणा को तोड़ दिया है और यह नया इंडिया है, अब इन सबके रहते हुए भी भारत-पाकिस्तान में जाकर हमला कर सकता है. इसको एक नया टर्म दिया गया कि यह भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में वाटरशेड मोमेंट है.”यहां पर चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए अनिल कहते हैं कि ‘न्यू इंडिया’ और एक नया चलन शुरू करने वाली जो बात है कि भारत अब पहले की तरह आतंकवाद को सहन करने वाला देश नहीं रहा. हम उस तरह तरह से कार्रवाई करेंगे जैसा की अमेरिका आतंकवाद की स्थिति में करता रहा है. लेकिन मैं थोड़ा पीछे जाना चाहूंगा कि ऑल ऑफ सडेन, अचानक, रातोंरात आप अपना कैरेक्टर नहीं बदल सकते. इसको थोड़ा पॉलिटिकली भी देखना चाहिए कि अगर सचमुच आतंकवाद मोदी सरकार का कंसर्न है तो सडेन एक्शन की बजाय और भी बहुत कुछ है जो किया जा सकता था. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 57: भारत रत्न, भूपेन हजारिका, एन राम और अन्य
Apr 14 2019 62 mins  
इस चर्चा की रिकॉर्डिंग के दौरान ही कश्मीर में अब तक के सबसे बड़े आतंकी हमले को अंजाम दिया जा रहा था. सीआरपीएफ के 40 जवानों की एक आत्मघाती हमले में मौत हो गई. हम इस विषय पर चर्चा नहीं कर सके लेकिन यह विषय ही इस पूरे हफ्ते चर्चा में रहेगा. एनएल चर्चा का केंद्रित विषय रहा मशहूर गायक भूपेन हजारिका को दिए गए भारत रत्न को उनके बेटे तेज हजारिका द्वारा वापस करना. तेज ने एक बयान में बताया कि इसकी वजह नागरिकता संशोधन बिल 2016 है. उन्होंने कहा कि यह बिल भूपेन हजारिका के विचार और मूल्यों के सर्वथा विपरीत है. जब तक सरकार इसे वापस नहीं ले लेती, वह अपने पिता के लिए यह सम्‍मान ग्रहण नहीं करेंगे. इसके अलावा द हिन्दू के संपादक एन राम की रफेल घोटाले संबंधी रिपोर्ट, युवा साहित्यकार अविनश मिश्र की कामसूत्र से प्रेरित नए कविता संग्रह के तमाम पहलुओं, पत्रकार अर्नब गोस्वामी पर गोपनीय दस्तावेज हासिल करने के अपराध में एफआईआर आदि पर इस बार की एनएल चर्चा केंद्रित रही.चर्चा में इस बार युवा कवि व साहित्यकार अविनाश मिश्र ने बतौर मेहमान शिरकत किया. साथ में पत्रकार और लेखक अनिल यादव और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.भूपेन हजारिका का भारत रत्न पर बातचीत करते हुए अतुल ने अविनाश से पूछा, "मैं आपसे जानना चाहूंगा क्या भारत रत्न जैसे बड़े सम्मान को इन सब बातों और राजनीति से अलग रखना चाहिए? तेज हजारिका ने भी थोड़ा सा बचपना दिखया है?”अविनाश जवाब देते हुए कहते है, "एक ऐसे समाज में जहां चीज़ें लगातार गड़बड़ हो रही हो तो एक नागरिक सोचता है की वो प्रतिरोध कैसे करे, उदाहरण के तौर पर जब अख़लाक़ वाला कांड हुआ था दादरी में तब हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश का एक बयान आया था कि वो कैसे इसका प्रतिरोध करें. तो उनको ख्याल आया राज्य ने उनको सम्मानित किया है. तो उन्होंने राज्य द्वारा दिए गए सम्मान को लौटा दिया. मुझे लगता है एक सामान्य नागरिक होने के नाते कोई तरीका नहीं बचता आपके पास. एक सामान्य नागरिक जो खुद कुछ नहीं कर सकता जिसके बस में कुछ नहीं है तो मुझे लगता है उसके पास कोई तरीका है तो वो यही है कि सम्मान वापस लौटा देना. उदय प्रकाश जी ने यही किया. मैं मानता हूं भूपेन हजारिका जी के बेटे शायद इस बात को ज़्यादा समझते हैं.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए आनंद वर्धन कहते हैं, "मेरा इस पर कोई स्पष्ट मत नहीं है लेकिन ऐसा भी कुछ समाचार पत्रों ने लिखा है कि तेज हजारिका आपने पिता के साथ ज़्यादा रहे भी नहीं थे. तो अब जो व्यक्ति है ही नहीं उसका किस विषय पर क्या धारणा होगी ये तो अब अटकल का विषय है. कोई भी राजनैतिक विचारधारा हो, वो भारत रत्न के हक़दार थे. एक बड़ी सांस्कृतिक शख्सियत होने के कारण मेरे ख्याल में भारत रत्न स्वीकार करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. वहां के जो लोग नागरिकता संशोधन बिल का विरोध या समर्थन कर रहे हैं उनमें हज़ारिका के पुत्र उसके विरोध में हैं ये तो निश्चित हो ही गया है. अब इसका निष्कर्ष क्या होगा ये निर्णय तो उनके परिवार को करना है. हालांकि परिवार में भी इस पर एकमत नहीं है.”इस पर अनिल यादव आपने नजरिए को परिभाषित करते हुए कहते हैं, "इस प्रश्न को इस नज़रिए से भी देखा जा सकता है की क्या भारत रत्न जैसा पुरस्कार किसी राजनीति के तहत नहीं दिया जाता है. अगर वो राजनीति के तहत नहीं दिया जाता तो ये मांग क्यों लगातार होती रहती है कि फला की उपेक्षा हो रही है, उनको मिलना चाहिए था. इसके पीछे हमेशा राजनीति रही है अगर राजनैतिक कारणों से पुरस्कार दिया जा सकता है तो उससे वापस भी किया जा सकता है. अब ये जो नागरिकता संशोधन का मसला है ये नार्थ ईस्ट में, तो मैं कह सकता हूं कि ये वहा के लोगों के जीवन के लिए बहुत केन्द्रीय मसला है. नार्थ ईस्ट ही वो जगह है जहा पिछले एक साल के भीतर देशद्रोह के सबसे ज़्यादा मामले लोगो पर दर्ज किए गए हैं. और ये वो लोग है जो नागरिकता संशोधन बिल का विरोध कर रहे थे."राफेल डील पर एन राम की रिपोर्ट और अर्नब गोस्वामी पर एफआईआर के आदेश पर भी पैनल के बीच चर्चा हुई. आनंद वर्धन और अविनाश मिश्र ने इस चर्चा में अपने अनुभव साझा किए. अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एपिसोड 56: ममता-सीबीआई विवाद, मार्कंडेय काटजू और अन्य
Apr 14 2019 57 mins  
इस हफ्ते चर्चा का मुख्य विषय रहा पश्चिम बंगाल में सीबीआई का अनपेक्षित छापा, नतीजे में सीबीआई टीम की गिरफ्तारी और साथ में ममता बनर्जी का सत्याग्रह. ममता बनर्जी ने अपने पुलिस प्रमुख राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुंची सीबीआई टीम को पूरे हिंदुस्तान में सुर्खी बना दिया. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई से संबंधित एक लेख लिखा जिसे किसी भी भारतीय मीडिया ने प्रकाशित नहीं किया. इस लेख में मुख्य न्यायाधीश से 4 सवाल पूछे गए थे. इसको लेकर मार्कंडेय काटजू ने भारतीय मीडिया के चरित्र, कार्यशैली पर काफी तीखा प्रहार किया. साथ ही राहुल गांधी का नितिन गडकरी के बयान को समर्थन और ट्विटर पर हुई बहस और अन्ना हज़ारे का रालेगण सिद्धि में अनशन आदि विषय इस बार की एनएल चर्चा के केंद्र में रहे.चर्चा में इस बार वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा पहली बार मेहमान के रूप में हमारे साथ जुड़े. झा एक स्वतंत्र पत्रकार हैं. साथ ही पत्रकार और लेखक अनिल यादव और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.सीबीआई और ममता बनर्जी के जुड़े टकराव पर बातचीत करते हुए अतुल ने आनंद से कहा, “सीबीआई ने कोलकाता के पुलिस प्रमुख राजीव कुमार के यहां छापा मारा. जवाब में बंगाल की पुलिस ने सीबीआई अधिकारियों को ही गिरफ्तार कर लिया. भाजपा कह रही है ये एक संवैधानिक संकट है, तृणमूल वाले कह रहे है ये लोकतंत्र की हत्या है. विरोध में ममता बनर्जी सत्याग्रह पर बैठ गईं. यहां तक तो सब ठीक था लेकिन साथ में अजीब बात यह रही कि राजीव कुमार भी सत्याग्रह पर बैठ गए. एक पुलिस अधिकारी का इस तरह से सत्याग्रह पर बैठ जाना क्या बताता है?”आनंद ने इस स्थिति को पुलिस के राजनीतिकरण से जोड़ते हुए कहा, “जितनी भी अखिल भारतीय सेवाएं हैं, आईएएस, आईपीएस आदि, यह सभी अचार संहिता नियम 1968 से जुड़ी हैं. पहले राजनैतिक वर्ग और अधिकारी तंत्र दोनों का एक हद तक तालमेल था क्योंकि एकमात्र शक्तिशाली पार्टी कांग्रेस थी. अब राज्यों के स्तर पर राजनीति का स्थानीयकरण हुआ है, इसके फलस्वरूप अधिकारियों का भी बंटवारा हुआ है. अधिकारी जातीय खेमों में भी बंटे हुए हैं. सबसे ज़्यादा राजनीतिकरण पुलिस का इसलिए दिखता है क्योंकी रोज़मर्रा के जीवन में लोगों का राज्य के अंग के तौर पर सबसे ज्यादा सामना पुलिस से ही होता है. राजीव कुमार का अनशन पर बैठना तो सही नहीं है पर यह अभूतपूर्व भी नहीं है.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल कहते हैं, “एक बात और है. एक हफ्ते पहले ममता बनर्जी ने कोलकाता में जिस तरह से समूचे विपक्ष की गोलबंदी की थी, उसने भी कहीं न कहीं हलचल पैदा कर दी थी केन्द्र सरकार के भीतर. यह भी एक वजह है ममता और मोदी के टकराव की.”अनुरंजन जा यहां पर हस्तक्षेप करते हुए कहते हैं, “केन्द्र की सरकार जिस तरीके से अभी चल रही है, चुनाव बिलकुल सिर पर है और सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता कहते हैं की वो स्लॉग ओवर के छक्के लगा रहे हैं. तो उनके हिसाब से तो यह सब छक्का है, अब वो नो बॉल पर मार रहे है या वो बॉउंड्री पर कैच हो रहे हैं, ये किसी को नहीं पता है. ये सब बाद में पता चलेगा. लेकिन हो ये रहा है की जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी की सरकार पिछले दो-तीन महीने में एक्टिव हुई है, खासकर विपक्षी पार्टियों को लेकर, वह काम उसे 4 साल पहले करना चाहिए था. आप 5 साल सत्ता में रहे. जिन आधार पर आप सत्ता में आए उनको लेकर आपने 5 सालों में कुछ किया नहीं. और फिर आप अचानक आ कर कहने लगे कि भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे है और भ्रष्टाचार पर कार्रवाई कर रहे है तो आपको पता होना चाहिए कि उसके भी कुछ नियम और कानून तय हैं. यह सही बात है कि ममता जिस तरह से विपक्ष की गोलबंदी कर रही हैं उसपे सबकी नज़र है. सबको पता है अगर विपक्ष एकजुट हो गया तो बहुत बड़ा नुकसान हो जायगा.”नितिन गडकरी का बयान और अन्ना हज़ारे पर भी पैनल के बीच चर्चा हुई. आनंद वर्धन और अनुरंजन झा ने इस चर्चा में अपने दिलचस्प अनुभव साझा किए. अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 55: राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग, चंदा कोचर और अन्य
Apr 14 2019 59 mins  
इस हफ्ते की चर्चा बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपी सोमेश झा की रिपोर्ट के इर्द गिर्द सिमटी रही. इसके मुताबिक मौजूदा समय में बेरोजगारी की दर सबसे अधिक है. बीते 45 वर्षो में यह सबसे ऊंचे स्तर पर जाकर करीब 6.1% तक पहुच गई है. नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस का लेबर फोर्स सर्वे 2017-18 का यह आंकड़ा है. इससे पहले ही नेशनल स्टैटिस्टिकल कमीशन यानी राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के दो गैर सरकारी सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया. इनके नाम पीसी मोहनन और जीवी मिनाक्षी हैं. इसके साथ ही अब एनएससी में सिर्फ एक सदस्य नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत शेष रह गए हैं. इसके अलावा भारत के पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज़ का लंबी बीमारी के बाद निधन, कोबरापोस्ट की एक खोजी पड़ताल जिसमें उन्होंने लोनदाता कंपनी एडीएफएल द्वारा करीब 31000 करोड़ की हेराफेरी का दावा और राहुल गांधी की घोषणा जिसमें उन्होंने न्यूनतम आय की गारंटी योजना लागू करने का वादा किया है. साथ में भाजपा के मंत्री नितिन गडकरी का बयान और आईसीआईसीआई बैंक की मुखिया रही चन्दा कोचर के ऊपर सीबीआई द्वारा दर्ज किया गया एफआईआर भी इस चर्चा के केंद्र में रहे.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान एशियाविल वेबसाइट के पत्रकार दिलीप खान हमारे साथ जुड़े. इससे पहले वो राज्यसभा टीवी से जे थे. साथ ही न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवादाता बसंत कुमार और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन हमेशा की तरह न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के आकड़ों से जुड़े विवाद से हुई अतुल ने कहा, “दो दिन पहले राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग से जुड़े दो अंतिम गैर सरकारी सदस्य पीसी मोहनन और जेवी मिनाक्षी ने इस्तीफा दे दिया. इनका आरोप था कि सरकार बेरोजगारी से जुड़े आंकड़े दबा कर बैठी है, जारी नहीं कर रही है. इसके साथ ही अब राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग निष्क्रिय संस्था बन गया है. राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग देश में तमाम तरह के बेरोज़गारी और अन्य आर्थिक संबंधी आंकड़ों को तैयार करने वाली ज़िम्मेदार संस्था है. माना जाता है कि दुनिया भर में आंकड़ों को इकट्ठा करने वाली गिनी चुनी संस्थाओं में से भारत की राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग को गिना जाता था. जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की एक प्रोफेसर जयति घोष जो कि एक अर्थशास्त्री भी हैं, उनका कहना था की सरकार जानबूझ कर इस संस्था को कमज़ोर करने में लगी हुई थी. 2017 से 2018 के बेरोज़गारी के जो आकड़े हैं, सीधे-सीधे उसका संबंध नोटबंदी जैसे अहम फैसले से जुड़ता है. बिज़नेस स्टैंडर्ड ने उसका एक लीक हिस्सा प्रकाशित किया है. मैं बसंत से यह जानना चाहूंगा कि ये जो राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के सदस्य ने जो इस्तीफा दिया उनसे बातचीत में आपको क्या लगा की सरकार जानबूझकर इसको दबाती जा रही थी या फिर इसके पीछे कोई और वजह भी है?”अपनी बात रखते हुए बसंत ने कहा, "जिन लोगों ने अपने पद से इस्तीफा दिया है उनसे सम्पर्क नहीं हो पाया लेकिन मैंने प्रणब सेन से विस्तार से बात की,, जो कि मौजूदा सरकार के दौरान एनएससी के चेयरमैन थे. उन्होंने बताया के जब वे चेयरमैन था तब सरकार का नया नया गठन हुआ था हमारे आकड़ो से सरकार की सफलता-असफलता तय नहीं होती थी. लेकिन अभी जो सरकार है वह जानबूझ कर आंकड़ों को जारी नहीं कर रही है. जिन लोगो से अपने पद से इस्तीफा दिया है उन लोगों ने मुझसे बात की थी और यह आंकड़े इसीलिए जारी नहीं हो रहे है क्योकि बेरोज़गारी दर बहुत बुरी स्थिति में है. सरकार नहीं चाहती की चुनाव से दो महीने पहले ऐसा कोई आंकड़ा सामने आए जिससे उसको नुकसान. इन आकड़ों से एक तरह से सरकार की पोल खुल जाएगी और सरकार किसी भी स्थिति में ऐसा नहीं चाहेगी. हालांकि बजनेस स्टैंडर्ड में यह ख़बर छप चुकी है. आंकड़े कितने सही हैं ये तो बाद में तय होगा.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल कहते है, “दिलीप राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग जो इस प्रकार की लोकतांत्रिक संस्थाए हैं अगर ये ठीक से काम नहीं करती हैं तो आपको पता ही नहीं चलेगी कि देश में बेरोज़गारी की दर क्या है. ऐसे में आप बेरोज़गारी को कम करने लिए नीतियां कैसे बनाएंगे. इसके आलावा भी तमाम संस्थानों के साथ सरकार का टकराव रहा है. क्या यह इस सरकार की अक्षमता का सबूत है?”इसका जवाब देते हुए दिलीप ने कहा, “ऐसा नहीं है की सरकार को इन आकड़ों का पता नहीं है सरकार के सामने ये आकड़े पेश हो चुके हैं एनएससी ने एनएसएसओ के सामने डेटा रखा और एनएसएसओ इसे अप्रूव करता है. सरकार के पास ये सारे डेटा हैं. होम मिनिस्ट्री ने जब एनसीआरबी ने जब किसान आत्महत्या के आंकड़े जारी करना बंद किया तो यह भी इसीलिए कि ये आंकड़े सरकार की छवि के ख़िलाफ़ जाते हैं.” See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 54: प्रियंका गांधी, महागठबंधन, ईवीएम हैकिंग और अन्य
Apr 14 2019 53 mins  
इस हफ्ते की चर्चा कांग्रेस द्वारा प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाने पर केंद्रित रही. 2019 लोकसभा चुनावों से ठीक पहले प्रियंका गांधी को मैदान में उतारने के क्या अर्थ है और इसके क्या परिणाम संभावित हैं, इन सब विषयों पर चर्चा हुई साथ ही कोलकाता में ममता बनर्जी ने एक बड़ी विपक्ष की रैली आयोजित की जिसमें करीब 20 बड़े राजनैतिक दलों के नेता और उनके प्रतिनिधि शामिल हुए. इस पर बीजेपी की तरफ से एक प्रतिक्रिया आई कि यह भ्रष्ट और नामदार लोगो का गठबंधन है. क्या भाजपा के अंदर कोई बेचैनी पैदा हुई है, इस पर भी पैनल ने बहस की. बीते हफ्ते एक और बड़े घटनाक्रम के तहत सईद शुज़ा नाम के साइबर एक्सपर्ट ने लंदन में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दावा किया कि ईवीएम को हैक किया जा सकता है और 2014 के बाद से देश में हुए सारे चुनाव में ईवीएम के जरिए घपला किया गया है. ईवीएम में गड़बड़ी के ज़रिए चुनावी नतीजों को प्रभावित किया गया है. हालांकि शुजा के दावे में तथ्य कम और खामियां बहुत हैं. जो कि हमारी चर्चा का विषय रहा. साथ ही ऑक्सफेम के वह रिपोर्ट भी हमारी चर्चा में शामिल हुई जिसमें देश के 9 बड़े उद्योगपतियों के पास देश की आधी आबादी के बराबर संपत्ति है.चर्चा में इस बार आउटलुक पत्रिका के असिस्टेंट एडिटर ओशिनॉर मजूमदार पहली बार चर्चा का हिस्सा बने, इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन हमेशा की तरह न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.शुरुआत प्रियंका गांधी को कांग्रेस पार्टी द्वारा पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के निर्णय से हुई. अतुल ने आनंद वर्धन से पूछा, “आनंद एक सवाभाविक सा सवाल पैदा होता है की राहुल गांधी ने हाल ही में एक अच्छा परफॉर्मेंस दिया था. तीन राज्यों में कांग्रेस पार्टी जीतने में सफल रही. सबसे बड़ा सन्देश था की भाजपा का स्कोर 0-5 रहा. तो ऐसी स्थिति में आखिरी पल में प्रियंका गांधी को पार्टी में लाने के निर्णय को कैसे देखते है क्यों इसकी नौबत आन पड़ी कांग्रेस को?”इसका जवाब देते हुए आनंद ने कहा, “इसको कई नज़रिए से देखा जा सकता है. मैं इसमें नहीं जाना चाहूंगा. सम्भव है की यह एक पारिवारिक निर्णय हो, डाइनिंग टेबल निर्णय हो और कांग्रेस के लोग वहां बैठ कर पत्रकारों पर हंस रहे हों की ये लोग कैसे-कैसे कारण बता रहे हैं.”आनंद आगे कहते हैं, "अभी जो सपा-बसपा का अंक गणित है, जो केमिस्ट्री है उसमें कांग्रेस ने बदलाव कर दिया है. क्योंकी गठबंधन से दरकिनार करने से भी बुरी स्थिति है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां अल्पसंख्यक या मुस्लिम संख्या में ज्यादा हैं वहां सपा-बसपा को स्पष्ट मज़बूती मिलती दिख रही है. लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश में गणित अभी भी उलझा हुआ है. यहां जातीय गणित है. सभी दलों का अपने वोटबैंक पर दावा है. मतलब स्थिति इतनी स्पष्ट नहीं है. कांग्रेस इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाकर भाजपा को कमज़ोर ज़रूर कर सकती है.”अतुल ने यहां पर ओशिनॉर को चर्चा में शामिल करते हुए पूछा, “आनंद ने बहुत सफाई से उस वाले सवाल को टाल दिया कि "ऐसा क्यों". तो मैं ये जानना चाहूंगा की आप उस क्यों के बारे में बात करना चाहेंगे या फिर आप भी प्रियंका को सक्रिय राजनीति में शामिल होने के संभावित नतीजों के बारे में ही बात करना पसंद करेंगे?”ममता बनर्जी की कोलकाता में बड़ी विपक्षी रैली और ईवीएम हैकिंग पर भी पैनल के बीच दिलचस्प सवाल-जवाब हुए. आनंद और ओशिनॉर मजूमदार ने इसमें हस्तक्षेप किया. अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 53: पोर्न और हिंसा का संबंध, उत्तर प्रदेश में गठबंधन और अन्य
Apr 14 2019 60 mins  
इस हफ्ते की चर्चा बीबीसी की उस रिपोर्ट को केंद्रित रही जिसमें भारत में पोर्न वीडियो, पोर्न वेबसाइट से सामाज में पड़ने वाले हिंसक प्रभावों की पड़ताल की गई. इसके अलावा कारवां पत्रिका की एक बड़ी खोजी रिपोर्ट में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के बेटे विवेक डोवाल द्वारा कालेधन के लिए बदनाम केमन आइलैंड में कंपनी स्थापित करने का मामला, यकायक केंद्र सरकार के कई शीर्ष मंत्रियों, भाजपा नेताओं की बीमारी, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के बीच हुआ गठबंधन आदि इस बार की चर्चा का मुख्य केंद्र रहे.चर्चा में इस बार दो नए मेहमान जुड़े, दिव्या आर्या जो की बीबीसी में वुमेन अफेयर, पत्रकार हैं साथ ही स्वतंत्र पत्रकार और लेखक अनिल यादव भी इस बार चर्चा का हिस्सा रहे. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभकर आनंद वर्धन भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत बीबीसी की उस रिपोर्ट से हुई जिसमें पोर्न की समस्या और इसका महिलओं के प्रति होने वाली हिंसा से संबंध है. अतुल ने दिव्या से सवाल किया, “आपकी जो रिपोर्ट है, संक्षेप में आप हमारे श्रोताओं को बताए कि इसका विचार कहा से आया और इस रिपोर्ट का निष्कर्ष क्या रहा?”इसका जवाब देते हुए दिव्या ने कहा, “हमारी रिपोर्ट जो आपने बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर एक लेख के तौर पर पढ़ी वो एक घंटे की रेडियो डॉक्यूमेंट्री के तौर पर अंग्रेजी, हिंदी में बीबीसी रेडियो पर आई थी. इसकी शुरुआत एक ऐसे वीडियो से हुई जो मेरे पास मेरे एक व्हाट्सएप्प ग्रुप में आया था, जिससे बहुत सारे एक्टिविस्ट और पत्रकार जुड़े हुए हैं. उस वीडियो में एक लड़की के कपड़े फाड़ने की कोशिश 10-15 लड़कों का समूह कर रहा था.”दिव्या के मुताबिक बिहार के एक गांव से यह वीडियो आया था और ये ऐसा इकलौता वीडियो नहीं था. ऐसे वीडियो लगातार आते रहे हैं जिसमे लड़कियों के साथ ज़बरदस्ती की जा रही है, और उनकी अनुमति के बिना ये वीडियो बनाके फैलाया जा रहा है. और बातचीत करने पर सामने आया कि इन वीडियों को प्रोफेशनली कैमरे से शूट किए गए हिंसक पोर्नोग्राफी की तरह ही बड़ी मात्रा में शेयर किया जा रहा है.चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल कहते है, "इस मसले जुड़ा एक विषय है सेक्स एजुकेशन का. हिंदुस्तानी सामाज में सेक्स टैबू है. सेक्स एजुकेशन को लेकर न तो कोई माहौल है ना उसको खुले मन से कोई स्वीकार करता है. अनिल यादव की एक कहानी है जिसमें भारतीय सामाज में सेक्स की बेसिक ट्रेनिंग का जरिया सड़क पर चलते हुए कुत्तों के बीच होने वाला सेक्स है या फिर घरों की छतों पर गौरैय्या या कबूतरों के बीच होने वाले सेक्स को देखकर युवा सेक्स की समझ पाते हैं. इस तरह के माहौल में तो आप लड़कियों की सेक्स एजुकेशन की बात ही छोड़ दीजिए. हिंदुस्तान के संदर्भ में सेक्स एजुकेशन और सेक्सजनित हिंसा है उन दोनों में किस तरह से तालमेल हो सकता है?इसका जवाब देते हुए अनिल यादव ने कहा, “हम लोग एक सोसाइटी के तोर पर बड़ी अजीब स्थिति में है. हमारे यहां सेक्स एजुकेशन या सेक्स पर बातचीत को एक तरह से अस्वीकार किया जाता है जबकि दूसरी तरफ वो एक नेचुरल आर्गेनिक चीज़ है. सेक्स एजुकेशन के अभाव में उसके बारे में जानना, उसके बारे में सीखना पोर्न वीडियो के ज़रिए शुरू होता है.”वो आगे कहते हैं, "मतलब हमारी सोसाइटी में इन चीज़ों पर बात करने के, इन चीज़ो के बारे में एजुकेट करने के चैनल, कब के बंद कर दिए गए हैं. यह एक पाखंडी और दोहरे मापदंडो वाला सामाज है. ऐसे में जो नई पीढ़ी है उनको अगर जानना है तो वो पोर्न के ज़रिए ही सीख़ रहे हैं. लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि पोर्न अनिवार्य तौर पर हिंसक और सैडिस्ट होता है. इसलिए नई पीढ़ी पोर्न के जरिए जो कुछ भी सीख रही है वो हिंसा सीख रही है और परपीड़ा सीख रही है, और ये बहुत ख़तरनाक बात है."आनंद वर्धन ने इस विषय पर अपनी राय रखते हुए कहा, “सूचना क्रांति ने विजुअल सेक्स का तथाकथित तौर पर लोकतांत्रीकरण किया है. इसकी पहुंच आम जन तक हुई है. इससे जो सेक्शुअली रिप्रेस्ड समाज है विशेषकर उत्तर भारतीय समाज उसको अपनी कुंठा को अभिव्यक्त करने का एक आसान जरिया मिला है. तब लोगों को पोर्न से ज्यादा चिंता ननहीं थी जब यह कुछ खास लोगों तक सीमित था. लेकिन इसके लोकतांत्रीकरण से यह बहस देखने को मिल रही है. पोर्न से एक समाज कैसे डील करता है यह भी बहुत कुछ उस समाज के बारे में बताता है.”अजीत डोवाल और सपा-बसपा गठबंधन पर भी पैनल के बीच दिलचस्प सवाल-जवाब हुए. दिव्या और अनिल ने इस चर्चा में हस्तक्षेप किया. आनंद वर्धन ने भी कुछ जरूरी, ज़मीनी जानकारियां साझा की. उनका पूरा जवाब और अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 52: सामान्य श्रेणी को आरक्षण, सीबीआई विवाद, राहुल गांधी का बयान और अन्य
Apr 14 2019 63 mins  
की जरूरत थी जो कि महज 48 घंटे में संसद के दोनों सदनों में पास हो गया. किसी भी बिल को पास करने की एक लंबी चौड़ी प्रक्रिया होती है, घंटों बहस चलती है उस पर विचार विमर्श किया जाता है, ज्यादा से ज्यादा लोगों के विचार उसमें शामिल होते हैं. लेकिन यहां एक हड़बड़ी नजर आती है. संविधान संशोधन में इतनी जल्दबाजी ठीक है?”इसका जवाब देते हुए आनंद ने कहा, “आरक्षण पर अंबेडकर ने कहा था कि आरक्षण तात्कालिक है और इसका प्रतिशत कम ही होना चाहिए. कुछ राज्यों में इसे बढ़ाया गया जैसे तमिलनाडु में जनसंख्या के आधार पर आरक्षण 50% से बढ़ाकर 67% कर दिया गया, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा 10% आरक्षण बढ़ाना पैंडोरा बॉक्स खुलने जैसा है. अब केंद्र सरकार ने एक शुरुआत कर दी है. इससे बाकी समुदायों में भी आरक्षण पाने की होड़ लग सकती है. इसके अलावा ऐसा नहीं है कि आरक्षण मिलने से नौकरी मिल जाएगी. 10% आरक्षण के लिए जो क्राइटेरिया तय किया गया है उसके हिसाब से भारत की 95% आबादी आरक्षण के लिए योग्य है. अब उसमें तो प्रतिस्पर्धा बनी ही रहेगी यह सवर्णों के लिए खुद बहुत कंफ्यूज करने वाली स्थिति है.”चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अतुल ने सिद्धांत से सवाल किया, “आरक्षण का लक्ष्य था सामाजिक, शैक्षिक समानता लाना. जो चीजें जातियों से तय होती हैं उसको खत्म करने के लिए आरक्षण लाया गया था. हम पाते हैं कि लंबे समय से आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग भी हो रही थी. लेकिन यह 10% कोटा सामाजिक समानता के लक्ष्य को कहीं ना कहीं असफल करने वाली बात नहीं लगती?”इसका जवाब देते हुए सिद्धांत ने कहा, “आर्टिकल 15 (4) 16 (4) जिसकी आप बात कर रहे हैं उसमें सोशली और एजुकेशनली बैकवर्ड लोगों के बारे में जिक्र होता है, लेकिन इकोनॉमिकली बैकवर्ड के बारे में हम सिर्फ सुनते आ रहे थे. नरेंद्र मोदी उसे लेकर आ गए कि 10% आरक्षण आर्थिक आधार और पिछड़े लोगों को दिया जाएगा.”वो आगे कहते हैं, “66,000 प्रति महीना कमाने वाले आदमी को आप गरीब मानते हैं. तो देखना होगा कि इकोनोमिकली बैकवर्ड का क्लॉज़ जोड़ने के बाद भी आप हासिल क्या कर रहे हैं. कोई नई तस्वीर बन भी रही है या नहीं. क्योंकि हो सकता है सुप्रीम कोर्ट इसे रद्द कर दे, तब यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी की इस पॉलिटिक्स का क्या होगा.आरक्षण के मौजूदा स्वरूप को लेकर जो यथास्थिति है उसके बारे में बताते हुए सिद्धांत ने कहा, “2 साल पहले मैंने बीएचयू पर एक स्टोरी की थी. इसमें यह सामने आया, कि बीएचयू में असिस्टेंट प्रोफेसर की कुल 900 पोस्ट है जिसमें 850 केवल जनरल केटेगरी के प्रोफेसर हैं, एसटी कैटेगरी का एक भी प्रोफेसर नहीं है, एससी के 15 और ओबीसी के कुल 35 असिस्टेंट प्रोफेसर वहां पर कार्यरत है. यह स्थिति जब बनी हुई है नौकरियों में तो फिर सवर्ण के लिए आरक्षण की जरूरत ही क्या है.”इस मसले पर जयया निगम ने भी अपनी राय कुछ इस तरह से रखी, “आरक्षण का यह बिल आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों के लिए लाया गया है और अभी तक इसमें जितनी बातें सामने आई हैं उससे यह कहा जा सकता है इसका फायदा सभी धर्मों के लोगों को मिलेगा लेकिन इस पर अभी तक तार्किक रूप से ऐसा कुछ नहीं आया है, जिसमें यह साफ हो कि सरकार आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए लोगों को कैसे पहचानेगी. इसमें एक बात और सामने आ रही है यूथ फॉर इक्वलिटी की, जो सामान्य श्रेणी के लोगों का एक फोरम है. यूथ फॉर इक्वलिटी इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गया है. मतलब सवर्णों के अंदर भी दो मत हैं. अब आप गरीब सवर्ण कैसे तय करेंगे यह आने वाले समय में समाज के लिए एक बड़ी बहस हो सकती है.”पैनल की विस्तृत राय जानने और अन्य मुद्दों के लिए सुने पूरी चर्चा। See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 51: सरकारी एजेंसियों की निगरानी, एनआईए का 17 जगहों पर छापा और अन्य
Apr 14 2019 60 mins  
इस हफ्ते चर्चा का मुख्य विषय रहा नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी द्वारा 17 जगहों पर छापा मारकर आईएस के 10 कथित आतंकियों की गिरफ्तारी. इसके अलावा नोएडा के पार्क होने वाली जुमे की नमाज को लेकर पैदा हुआ विवाद, गृह मंत्रालय द्वारा 10 सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को किसी के भी कंप्यूटर डाटा निगरानी की अनुमति और पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों परिणाम के बाद आया नितिन गडगरी का बयान भी चर्चा में शामिल रहे. इसके बाद से अटकलें लगाई जा रही हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में खटपट चल रही है.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान हिदुस्तान टाइम्स के एसोसिएट एडिटर राजेश आहुजा शामिल हुए. साथ ही न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियल भी चर्चा का हिस्सा रहे. हमेशा की तरह चर्चा का संचालनन्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल ने राजेश से सवाल किया, "एनआईए द्वारा की गई कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर जो सवाल खड़े हो रहे है कि चुनाव का मौसम आते ही इस तरीके की कार्रवाई खुफिया एजेंसियां करती हैं. आईएम से जुड़े मामलों में भी हमने देखा था कि युवकों को गिरफ्तारी भी होती है लेकिन कोर्ट में वो साबित नहीं हो पाती, क्या वास्तव एनआईए और अन्य एजेंसीयां सरकार के इशारे पर काम करती है या उनकी कोई स्वायत्तता भी है?"राजेश इसका जवाब देते हुए कहते है, “एनआईए के अधिकारियों ने बताया है कि इस पूरे मॉडयूल की चार महीने से निगरानी की जा रही थी. अधिकारी इनकी बातचीत पर नज़र रखे हुये थे, इनका एक हैंडलर भी था जिसने इन सब को उकसाया और एक ऐसा दस्ता बनाने को कहा. ऐसा पहली बार नहीं हुआ है पिछले 3 सालों मे देश के अलग अलग हिस्सो में पहले भी ऐसे दर्जनों मामले सामने आए जो इस्लामिक स्टेट से प्रभावित थे. खुशकिस्मती से केवल मध्य प्रदेश ट्रेन ब्लास्ट के अलावा बाकी सभी बाकी सभी दस्ते कुछ कर पाते उससे पहले ही सुरक्षा एजेंसियों ने उनका भंडाफोड़ दिया. तो यह कहना सही नहीं होगा कि आगामी चुनावों के चलते एनआईए ने इस तरह की कार्रवाई कर रही है.”मुद्दे को आगे बढ़ते हुए अतुल ने पूछा, "राजनाथ सिंह ने 2016 में जब आईएस का प्रकोप चरम पर था, तब एक बड़ा बयान दिया था कि आईएस भारत के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं है. तो क्या यह माना जाए कि 2 साल में स्थितियां बदल गई हैं?”इस पर राजेश ने जवाब देते हुए कहा, "इसे हमें तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखना होगा. भारत में लगभग 25 करोड़ मुसलमान हैं उनमें से सौ-सवा सौ लोग अगर भटक जाते है तो यह बहुत बड़ी संख्या नहीं है. दूसरी तरफ यूरोप में पांच हज़ार से ज्यादा लोग आईएस में शामिल हुए और वापस आकर बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया. भारत में ऐसे युवाओं को केवल गिरफ्तार किया गया बल्कि बहुत से ऐसे मामले भी थे जहां बच्चों को जाने से रोका गया, उनके परिवारों को काउंसलिंग दी गई. यहां तुलनात्मक रूप से संख्या बहुत कम है इसलिए आईएस को बहुत बड़ा खतरा नहीं माना गया.”आगे राहुल को चर्चा में शामिल करते हुए अतुल ने सवाल किया, “सोशल मीडिया के अतिवाद के दौर में हर विषय को लेकर एक माहौल बना दिया जाता है. व्यक्तिगत रूप से हम तय कर पाने की स्थिति में नहीं होते कि क्या सही है क्या गलत है. क्योंकि अतीत ऐसा रहा है कि इंडियन मुजाहिद्दीन के नाम पर तमाम युवाओं को गिरफ्तार किया गया फिर कुछ भी साबित नहीं हो पाया है.”इसका जवाब देते हुए राहुल ने कहा, “सुरक्षा एजेंसियों के दोनों तरह के रिकॉर्ड हमारे सामने हैं हम यह भी नहीं कह सकते कि एजेंसियां पॉलिटिकल टाइमिंग के हिसाब से काम करती हैं और दूसरी तरफ ऐसा भी नहीं है कि इनकी कार्यशैली इतनी मजबूत रही है कि इन पर आंख बंद करके भरोसा कर लिया जाय. जैसे मोहम्मद आमिर के मामले में हमने देखा कि जब वह जेल गया था, तब केवल 18 वर्ष का ही था और 18 वर्ष जेल में रहने के बाद वो निर्दोष साबित हुआ. उसकी लगभग सारी जिंदगी जेल में कट गई और उसके बाद हमारा सिस्टम ऐसे लोगों के पुनर्वास का कोई इंतजाम नहीं कर पाता. लेकिन सिर्फ टाइमिंग की वजह से एनआईए की कार्रवाई को नकारा नहीं जा सकता. क्योंकि यह बात सच है कि किसी भी तरह का चरमपंथ काम करता है और उसके अनेक उदाहरण हमने देखे हैं. कश्मीर की अगर हम बात करें तो 90 के दशक में वह क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल हुआ करता था लेकिन आज वह क्षेत्रीय अस्मिता से ज्यादा धार्मिक कट्टरता का सवाल बन चुका है. कश्मीर में चरमपंथ बढ़ा है, इसे नकारा नहीं जा सकता.” See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 50: सज्जन कुमार को सज़ा, फ्रांस में आंदोलन और अन्य
Apr 14 2019 51 mins  
एनएल चर्चा अपने 50वें अध्याय पर पहुंच गई. इस लिहाज से इस बार की चर्चा बेहद ख़ास रहीं. 50वीं चर्चा को हमने न्यूज़लॉन्ड्री के यूट्यूब चैनल पर लाइव प्रसारित किया.इस बार की चर्चा का मुख्य विषय रहा 1984 के सिख विरोधी दंगों के एक मामले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को हुई उम्रकैद की सज़ा. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल डील के मामले में हुए कथित घोटाले के आरोपों से जुड़ी सारी याचिकाओं को ख़ारिज करना, दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के नेता एमके स्टालिन द्वारा राहुल गांधी को अगला प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की घोषणा और साथ ही फ्रांस में बीते डेढ़ महीने से चल रहे यलो वेस्ट आंदोलन पर हमारी चर्चा केंद्रित रही.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान द वायर की सीनियर एडिटर आरफा खानम शेरवानी हमारे साथ जुड़ी साथ ही साथ न्यूज़लॉन्ड्री के ओपिनियन राइटर व स्तंभकार आनंद वर्धन भी इस चर्चा का हिस्सा रहे. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल भी चर्चा में शामल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 49: पांच राज्यों के चुनाव, उर्जित पटेल का इस्तीफा और अन्य
Apr 14 2019 67 mins  
इस बार की चर्चा का केंद्र पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में आए नतीजे रहे. इसके आलावा आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल का समय से पहले अपने पद से इस्तीफा देना, नए गवर्नर के रूप में शक्तिकांता दास का पद संभालना, रफेल विमान सौदे पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आदि विषय इस बार की चर्चा के मुख्य बिंदु रहे.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान न्यूज़ 24 चैनल की पत्रकार साक्षी जोशी और वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी शामिल हुए. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल भी चर्चा का हिस्सा रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने पांच राज्यों के विधानसभा के चुनावी नतीजों से की. उन्होंने पैनल के सामने एक सवाल रखा, “जिस रूप में भाजपा पिछले 4-5 सालों में बदली है, हमने देखा कि हर विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद नरेंद्र मोदी दिल्ली की सड़कों पर विजय परेड निकालते थे. उस दौरान मोदी जो भाषण देते थे उसमें एक विचित्र सी साम्यता दिखाई देती थी. वो अमित शाह को जीत का पूरा श्रेय देते थे बजाय पूरी पार्टी और उसके संगठन के. ये एक अलग तरीके की रणनीति दोनों नेताओं के बीच में विकसित हुई थी. अब इस हार से क्या उस जुगलजोड़ी के ऊपर किसी तरह का दबाव बढ़ा है?”इसके जवाब में हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा, “जब हम माध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान के चुनावी नतीजों की बात करते हैं तो इससे पहले के भारतीय जनता पार्टी के जितने भी चुनाव हैं उसकी स्थिति में और इसमें एक बड़ा बेसिक सा अंतर है. फर्क ये हैं की ये वो 3 राज्य हैं जहां की मुख्यमंत्रियों को समय-समय पर नरेंद्र मोदी के कद का नेता समझा जाता रहा. यहां तक की अगर आप लोगों ने ध्यान दिया हो तो 2013 -14 के दौरान कई बार चर्चा चली कि शिवराज सिंह चौहान भी प्रधानमंत्री पद के एक ताकतवर दावेदार हैं.”हर्षवर्धन आगे कहते हैं, “पर शायद ऐसा नहीं हो सका. मैं ये नहीं मानता कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने इन चुनावों में उस तरह से अपनी भूमिका नहीं निभाई जैसे बाकी राज्यों में करते थे. उसके बावजूद वे चुनाव हारे. मेरा मानना है कि मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ से बहुत अच्छा सन्देश है कि एक अरसे के बाद मतलब मुझे नहीं याद है की कब इस तरह से कोई चुनाव पूरी तरह स्थानीय मुद्दों पर लड़ा गया. राजस्थान एक बहुत बुरा चुनावी कैंपेन रहा. वहां कोई जमीनी मुद्दा नहीं था. विपक्ष के अभियान का एकमात्र मुद्दा था वसुंधरा अहंकारी हैं. यानी सब हवा हवाई मुद्दे थे.”नतीजों पर हो रही बहस का दूसरा पहलू था राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को मिली चमत्कारिक सफलता. क्या इससे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता स्थापित हो गई है या फिर इसे सिर्फ तुक्के में मिली जीत और एंटी इंकंबेंसी का नतीजा मानकर खारिज किया जा सकता है? साक्षी जोशी इस पर हस्तक्षेप करती हैं, “राहुल गांधी एक परिपक्व नेता के तौर पर साल भर पहले ही स्थापित हो गए थे. गुजरात चुनावों के दौरान उन्होंने जिस तरह से चुनाव अभियान की कमान संभाली वह ध्यान देने लायक है. उन्होंने. उन्होंने बार-बार एक बात कही कि आप (भाजपा के लोग) मुझे पप्पू कहते हैं. आप मुझे चाहे जो भी कहें लेकिन मेरे सवालों का जवाब जरूर दें. वो सवाल बहुत जरूरी हैं. तो जिस तरह से उन्होंने मुद्दों को पकड़े रखा और विपक्ष के उकसावे में बिना फंसे अपना अभियान चलाया वह उनकी क्षमता को साबित करता है.”राहुल कोटियाल ने इसके एक और पहलू पर रोशनी डाली, “राहुल गांधी की जो छवि साल भर पहले थी, ऐसा नहीं है कि उन्होंने उसमें कोई बड़ा बदलाव किया है. इन 3-4 सालों में मोदी की अपनी असफलताओं का इन नतीजों में भूमिका ज्यादा है. जिस तरह से उन्होंने अपनी छवि बनाई थी कि वो सबकुछ हल कर देंगे और बाद में जिस तरह से विधवा के संबंध में उनके अटपटे बयान आए, जिस तरह से प्रधानमंत्री की बातों को संसद की कार्यवाही से हटाना पड़ा, उन सबने मिलकर मोदी के लिए एक नकारात्मक माहौल बनाना शुरू कर दिया है.”राफेल डील और उर्जित पटेल के इस्तीफे पर भी दिलचस्प सवाल और निष्कर्ष के साथ साक्षी जोशी और राहुल कोटियाल ने इस चर्चा में हस्तक्षेप किया. हर्षवर्धन जी ने भी कुछ जरूरी, ज़मीनी जानकारियां साझा की. उनका पूरा जवाब और अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एपिसोड 48: किसान आंदोलन, राममंदिर विवाद, राजस्थान चुनाव और अन्य
Apr 14 2019 51 mins  
इस बार की चर्चा का केंद्र रहा दिल्ली के रामलीला मैदान में देश भर से इकट्ठा हुए किसान और उनका संसद मार्च. इसके अलावा अयोध्या और बनारस में राम मंदिर निर्माण पर दो अलग-अलग संतों के आयोजन हुए, साथ ही साथ राजस्थान चुनाव में कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप का मुद्दा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भगवान हनुमान को दलित समुदाय का बताने से मचे विवाद आदि विषय इस बार की चर्चा के मुख्य बिंदु रहे.इस बार की चर्चा में बतौर मेहमान शामिल हुए मीडिया विजिल वेबसाइट के संस्थापक सदस्य और पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल भी चर्चा में शामिल रहे. न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज इस समय राजस्थान चुनाव की कवरेज कर रहे हैं. वो हमसे फोन पर जुड़े. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवादाता अमित भारद्वाज के सामने एक सवाल रखकर की, “अमित हम देखते आ रहे हैं कि गुजरात के बाद राजस्थान का एक हिस्सा पिछले 3-4 सालों में हिंदुत्व की प्रयोगशाला के तौर पर उभरा है. अलवर के इलाकों में समय-समय पर गौरक्षकों का आतंक दिखा. अलवर के इलाके में कई मॉब लिंचिंग की घटनाएं देखने को मिली. क्या इन घटनाओं का असर राजस्थान के चुनाव पर दिख रहा हैं?”अमित ने कहा, “मैंने अपने कवरेज की शुरुआत राजस्थान के अलवर और भरतपुर इलाके से की थी. अलवर में विधानसभा की 11 सीटें है और भरतपुर में 7. अलवर इलाके में उग्र हिंदुत्व के कारण एक डिवाइड दिख रहा है. आप अगर मुस्लिम वोटर्स के पास जाएंगे तो उनकी एक अलग प्रतिक्रिया है और अगर आप हिन्दू वोटर के पास जाएंगे तो उनकी एक अलग प्रतिक्रिया है. यह कहीं ना नहीं पिछले कुछ सालों में हुई घटनाओं के कारण है. चाहे वो मॉब लिंचिंग हो या गौरक्षा हो. तमाम जो हिंदूवादी सांगठनों ने जो गतिविधियां की हैं, उनका असर इस चुनाव में साफ़-साफ़ दिख रहा है. इस इलाके में जब हमने कुछ लोगों से बात की तो पाया कि भाजपा को एक बढ़त है, हालांकि बहुतायत में युवा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से खुश नहीं है. वहां युवा नारा लगा रहे थे- मोदी तुझसे बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं.”वो आगे कहते हैं, “एक चीज़ और है जो व्हाट्स ऐप के जरिएए फैलाया जा रहा है. एक सीट है रामगढ़, जहां पर रकबर खान की हत्या हुए थी. उस सीट पर कांग्रेस की प्रत्याशी है सफिया खान उनका एक वीडियो वायरल किया गया, जिसमें वो बयान दे रही हैं कि हर हालत में चुनाव जीतना है चाहें कुछ भी करना पड़े. उस वीडियो को हिंदूवादी संगठन के लोग खूब फैला रहे हैं. तो भाजपा की कोशिश डिवाइड के ऊपर चुनाव लड़ने की दिखती है.”यहां पर अतुल ने बात आगे ले जाते हुए कहा, “अमित, मैं यह समझना चाह रहा था की क्या पूरे राज्य में किसी तरह की हवा किसी पार्टी के पक्ष में बह रही है? मसलन हमने देखा है कि 2014 के जो लोकसभा चुनाव या फिर बंगाल के विधानसभा चुनाव ऐसे थे जहां साफ तौर पर एक हवा दिख रही थी. भविष्यवाणी करना आसान था. क्या इस तरह की ऐसी कुछ एंटी इंकम्बेंसी वेव राजस्थान में महसूस हो रही है?”इस पर अमित का जवाब आया, “राजस्थान में बड़ा इंट्रेस्टिंग ट्रेंड है. अगर आप राजस्थान का इतिहास देखे तो जो पार्टी प्रचंड बहुमत से सरकार बनाती है अगले चुनाव में बड़े ही शर्मनाक तरीके से हार जाती हैं. जैसे अशोक गेहलोत की सरकार जब हारी तो 25 सीटों पर सिमट के रह गई. उससे पहले भैरों सिंह शेखावत के साथ ऐसा हुआ हैं. इस बार लोग लगातार कह रहे हैं कि टक्कर कांटे की है.”अमित ने बताया, “जब प्रधानमंत्री ने भरतपुर में सभा की तो वहां से कुछ लोग प्रधानमंत्री के भाषण के बीच से ही जाना शुरू हो गए. हालांकि यह संख्या कम थी. लोग खुल कर बोल रहे थे की प्रधानमंत्री हमारे मुद्दों पर बात ही नहीं कर रहे हैं, इसलिए हम जा रहे हैं. ऐसी स्थिति में आप कंफ्यूज हो जाते हैं की जनता असल में करने क्या वाली हैं.”राजस्थान के चुनाव में तीसरे मोर्चे की भूमिका और कई अन्य दिलचस्प सवाल और निष्कर्ष के साथ अभिषेक श्रीवास्तव और राहुल कोटियाल ने इस चर्चा में हस्तक्षेप किया. अमित ने भी कुछ जरूरी, ज़मीनी जानकारियां राजस्थान से साझा की. उनका पूरा जवाब और अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 47: ट्विटर और पैट्रियार्की विवाद, इमरान-ट्रंप टकराव, सीबीआई और अन्य
Apr 14 2019 53 mins  
इस बार की चर्चा विशेष रूप से ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी की भारत यात्रा के दौरान मचे घमासान को समर्पित रही. हालांकि वह अपने देश लौट चुके हैं. इसके अलावा भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने घोषणा की है कि स्वास्थ्य सही न होने के कारण वे 2019 का चुनाव नहीं लड़ेंगी, हालांकि उन्होंने राजनीति से सन्यास नहीं लिया है. पाकिस्तान के करीबी मित्र अमेरिका द्वारा 1.66 बिलियन डॉलर की सुरक्षा सहायता राशि रद्द करने का फैसला और भारत की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई की लगातार उलझती गुत्थी के इर्दगिर्द इस बार की चर्चा केंद्रित रही.इस बार की चर्चा में स्वतंत्र पत्रकार स्वाति अर्जुन बतौर मेहमान शामिल हुई साथ ही राजनीतिक पत्रकार सैय्यद मोजिज़ इमाम भी पहली बार चर्चा का हिस्सा बने. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज भी चर्चा का हिस्सा रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने स्वाति अर्जुन के सामने एक सवाल रखकर की, “ट्विटर सीईओ जैक डोर्सी ने कुछ महिला पत्रकार और कुछ महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग की. उस मीटिंग में किसी ने उन्हें एक पोस्टर गिफ्ट किया, जिस पर लिखा था- स्मैश द ब्राह्मिनिकल पैट्रियार्की यानी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का नाश हो. इसे जाति विशेष से जोड़कर जिस तरह से दक्षिणपंथी समूहों ने हमला किया, उसे किस हद तक जायज या नाजायज कहा जा सकता है?"स्वाति ने कहा, “यह जो मुद्दा उठा है मुझे लगता है यह ब्लेसिंग इन डिस्गाइज़ मोमेंट है. सोशल मीडिया के लिए ट्विटर, फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म के लिए. अगर हम भारत में देखे तो हाल के 2-4 सालों में सोशल मीडिया ट्रोलिंग, गाली-गलौज, लिंचिंग जैसी चीजें लगातार बढ़ती जा रही है. पता नहीं कितनी महिलाओं को सोशल मीडिया पर रेप करने की धमकी दी गई हैं. महिलाओं के ख़िलाफ़ भद्दी भाषा का भी इस्तेमाल किया जाता है. तो इसलिए मैं इसको ब्लेसिंग इन डिस्गाइज़ मोमेंट ही मानती हूं.”वो आगे कहती हैं, “जहां तक सवाल है जाति का तो सोशल मीडिया में कहा जाता है कि पढ़ा-लिखा तबका है जो एक ख़ास तबके से ही आता है. वो ब्राह्मणवाद को ब्राह्मण कैसे समझ लेते हैं. जब आप ब्राह्मणवाद की बात कर रहे हैं तो आप ब्राह्मणवादी पितृसत्ता की बात कर रहे हैं. और जिस दलित महिला ने ये पोस्टर डोर्सी को दिया उनका ये अभियान काफी सालों से चल रहा है जो की दलित महिलाओं का ग्रुप हैं.”उन महिलाओं ने बस यही बताया की मैं एक पिछड़ी, निचली जाति से आती हूं तो जब भी मेरे ऊपर कोई हमला करता है तो उसमें जाति का एंगल जोड़ देता है.यहां पर अतुल ने हस्तक्षेप किया, “मुझे लगता हैं जिस तरह से ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को ब्राह्मण जाति से जोड़ा गया उसके दो पहलु हैं. पहला, जो प्रभावी संस्कृति है देश की उस पर सवर्ण जातियों का कब्जा है. जाहिर है ब्राह्मण उसमें शीर्ष पर है. अगर किसी तरह की अच्छाई या बुराई इसमें है तो प्रतीकात्मक रूप से ब्राह्मण को इस्तेमाल किया जाता है. क्योंकि यह ब्राह्मणों की हितैषी की संस्कृति है.” See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 46: बीबीसी की फ़ेक न्यूज़ पर रिसर्च, सीएनएन-ट्रंप टकराव, रफाल विवाद और अन्य
Apr 14 2019 45 mins  
इस बार की चर्चा विशेष रूप से फ़ेक न्यूज़ को समर्पित रही. बीबीसी द्वारा फेक न्यूज़ के ऊपर किया गया एक रिसर्च इस हफ्ते बहस में रहा. इसके अलावा अमेरिका में ट्रंप प्रशासन द्वारा सीएनएन के व्हाइट हाउस संवाददाता जिम एकोस्टा का पास निलंबित करना, बदले में सीएनएन द्वारा ट्रंप को अदालत में घसीटना और एएनआई समाचार एजेंसी की संपादक स्मिता प्रकाश द्वारा रफाल लड़ाकू जहाज बनाने वाली कंपनी दसों के सीईओ का साक्षात्कार इस हफ्ते की एनएल चर्चा के प्रमुख विषय रहे.इस बार की चर्चा में बीबीसी डिजिटल हिंदी के संपादक राजेश प्रियदर्शी बतौर मेहमान शामिल हुए. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल, विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज भी शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत अतुल चौरसिया ने राजेश प्रियदर्शी के सामने एक सवाल के साथ की- “बीबीसी के रिसर्च की बड़ी चर्चा है. हम चाहेंगे कि आप संक्षेप में इसके मुख्य नतीजों और रिसर्च के तरीके के बारे में बताएं.”राजेश प्रियदर्शी ने बताया, “फ़ेक न्यूज़ को लेकर हर तरफ से कहा जाता है कि दूसरा पक्ष फ़ेक न्यूज़ फैला रहा है. समस्या की जड़ वहां है जहां आम आदमी किसी न्यूज़ पर भरोसा करके उसे आगे बढ़ाता है. यह काम वो किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए करता है.”वो आगे कहते हैं, “हमने इस रिसर्च के जरिए यह जानने की कोशिश की है कि फ़ेक न्यूज़ फैलाने वाले लोग कौन हैं. किन वजहों से वो ऐसा करते हैं. उनके दिमाग में क्या है. ऐसे लोगों का मोटीवेशन क्या है. इस पर बीबीसी ने एक क्वालिटेटिव रिसर्च की है, जिसमें चीजों को गहराई से समझने की कोशिश की गई है. हमने राष्ट्रीय स्तर पर कोई सर्वेक्षण नहीं किया है. अलग-अलग शहरों में अलग-अलग आयु, आय और जेंडर के 40 लोगों के सोशल मीडिया बिहेवियर को परखा गया है.”यहां अतुल ने हस्तक्षेप किया, “आपने कई बातें बताई. रिसर्च से एक बात सामने निकल कर आई कि भारत में फ़ेक न्यूज़ के पीछे नेशनलिज्म बड़ा फैक्टर है जो लोगों को फ़ेक न्यूज़ की दिशा में प्रेरित कर रहा है. दुनिया भर में दक्षिणपंथी सोच का प्रभाव फ़ेक न्यूज़ के ऊपर ज्यादा है. इस समय ज्यादातर देशों में ऐसी ही सरकारें भी हैं. तो इसमें सरकारों की क्या भूमिका दिखती है.”राजेश के मुताबिक इसमें चार चीजें मुख्य रूप से भर कर सामने आई. हिंदू सुपीरियॉरिटी, हिंदू धर्म का पुनरुत्थान, राष्ट्रीय अस्मिता और गर्व, एक नायक का व्यक्तित्व (इस मामले में मोदी). ये चारो चीजें आपस में गुंथी हुई हैं.राहुल कोटियाल ने इसके एक दूसरे पहलु पर रोशनी डालते हुए कहा, “इस रिसर्च को किसी अकादमिक दस्तावेज में शामिल नहीं किया जाएगा. इसकी वजह शायद इसका छोटा सैंपल साइज़ है. यह विरोधियों को इस रिसर्च को खारिज करने का अवसर भी देता है. बीबीसी इस सवाल से कैसे निपटेगा?”जवाब में राजेश कहते हैं, “मूल बात यह है कि बीबीसी कोई अकादमिक संस्था नहीं है. यह येल या हार्वर्ड नहीं है. हमारी चिंता मीडिया फ्रटर्निटी में मौजूद फ़ेक न्यूज़ की समस्या थी. यह रिसर्च कोई अंतिम सत्य नहीं है.”अमित भारद्वाज का सवाल इस पूरी चर्चा को एक अलग धरातल पर ले जाता है. उन्होंने कहा, “इस रिसर्च से यह बात उभर कर सामने आई कि हिंदुत्व और नेशनलिज्म फ़ेक न्यूज़ के अहम फैक्टर हैं. रिपोर्ट पढ़कर हिंदुत्व का फैक्टर बड़ी प्रमुखता से सामने आता है. लेकिन रिपोर्ट में नेशनलिज्म शब्द चुना गया, हिंदुत्व नहीं. क्या यह सोच-विचार कर उठाया गया क़दम था?”इस सवाल के साथ ही अतुल ने भी एक सवाल जोड़ा, “आपने बताया कि 40 लोगों से सहमति ली गई कि आप उनके सोशल मीडिया बिहेवियर का आकलन करना चाहते हैं. बहुत संभव है कि जिन लोगों पर आप रिसर्च कर रहे थे उनके दिमाग में कहीं न कहीं यह बात चल रही हो कि उनके ऊपर नज़र रखी जा रही है, ऐसे में उनका व्यवहार सामान्य न रहकर चैतन्य हो सकता है.”इन सवालों के बेहद दिलचस्प जवाब राजेश प्रियदर्शी ने दिए. उनका पूरा जवाब और अन्य विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए पूरी चर्चा सुने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 45: रिज़र्व बैंक विवाद, नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी, कर्नाटक उपचुनाव और अन्य
Apr 14 2019 59 mins  
भारतीय रिजर्व बैंक की स्वायत्तता पर सरकार का खतरा, डोनाल्ड ट्रम्प और मीडिया के बीच टकराव, इसकी भारतीय संदर्भ में विवेचना, कर्नाटक में लोकसभा की तीन और विधानसभा की दो सीटों पर हुआ उपचुनाव, इसमें जेडी(एस) और कांग्रेस गठबंधन की जीत, पं. नेहरू के आवास तीनमूर्ति भवन की नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम और लाइब्रेरी की गवर्निंग बॉडी में 4 नए सदस्यों की नियुक्ति आदि इस हफ्ते की चर्चा के मुख्य विषय रहे.इस बार चर्चा में बतौर मेहमान शामिल हुए पत्रकार नीरज ठाकुर, जो मूलरूप से आर्थिक मामलों के पत्रकार हैं. इनके अलावा स्तम्भ लेखक आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज भी चर्चा में शामिल हुए. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल चौरसिया ने पूछा, “आरबीआई एक्ट का सेक्शन 7 यानी जिस रेयर लॉ की बात हो रही है, वह सरकार को किस तरह के अधिकार देता है?”इसका जवाब देते हुए नीरज ठाकुर ने कहा, “सरकार के पास पैसे की कमी पड़ गयी है, और वह जल्द से जल्द कुछ कुछ निर्णय लेना चाह रही है. जिसे आरबीआई मना कर रहा है. आरबीआई हमेशा से अपनी स्वायत्तता को बचाए रखना चाहता है, जबकि सरकारें हमेशा से चाहती रही हैं कि वह उनके हिसाब चले. इसके अंदर सेक्शन 7 सरकार को किसी भी तरह का निर्देश जारी करने का अधिकार सरकार को देता है, जिसे आरबीआई को मानना ही पड़ेगा.”नीरज ने इस संकट के उत्पन्न होने की वजहें और भारतीय अर्थव्यवस्था में पैदा हुए उटापटक के सूत्र नोटबंदी से जोड़े. जिसको लेकर सरकार ने समय-समय पर बड़े-बड़े दावे किए थे. लेकिन आज की तारीख में यह बात साबित हो गई कि नोटबंदी असफल रही.अतुल ने नोटबंदी के सवाल को आगे बढ़ाते हुए आर्थिक विशेषज्ञ प्रियरंजन दास का हवाला दिया जिन्होंने कहा है कि सरकार का आकलन था कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था में करीब साढ़े तीन से चार लाख करोड़ रुपए का काला धन वापस नहीं लौटेगा. लिहाजा सरकार यह शेष रकम रिजर्व बैंक से लेगी. लेकिन नोटबंदी में सारा पैसा वापस आ गया. अब सरकार वही साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए रिजर्व बैंक से उसके रिजर्व से वसूलना चाहती है.आनंद वर्धन ने इसका जवाब देते हुए कहा, “अब जबकि सत्ता का केन्द्रीकरण बहुत अधिक है, और इसमें संवादहीनता और पारदर्शिता की कमी है. नोटबंदी के उद्देश्य पहले भी बार-बार बदलते रहे हैं. इसमें सरकारी संवाद भी बहुत हद तक लचर रहा है. शायद सरकार की सोच चुनाव के पहले इस पैसे के जरिए कुछ लोकलुभावन योजनाओं को बड़े पैमाने पर शुरू करने की है.”नीरज ने सरकार द्वारा रिज़र्व बैंक के ऊपर बनाए जा रहे दबाव को पूरी तरह से राजनीतिक निर्णय बताया.अमित भारद्वाज के मुताबिक पंजाब नेशनल बैंक घोटाला सामने आने के बाद से चीजें बदली हैं. जैसे फरवरी सर्कुलर है जिसके जरिए 11 बैंकों को पीसीए के तहत लाया गया. विरल आचार्य ने जैसे कहा कि जो आरबीआई या केंद्रीय बैंक के स्वायत्तता के साथ जो खिलवाड़ करेगा, उसे मार्केट की नाराजगी झेलनी पड़ेगी. उस बयान के बाद अरुण जेटली का बयान आया कि आरबीआई को सरकार के मुताबिक ही काम करना चाहिए क्योंकि वह चुनी हुई संस्था है और लोगों के प्रति जवाबदेह है. इससे आरबीआई और सरकार के बीच का टकराव सतह पर आ गया.आगे उन्होंने कहा कि रघुराम राजन की छवि सरकार विरोधी बना दी गई थी, लिहाजा राजन की इच्छा के बाद भी उन्हें दूसरा कार्यकाल न देते हुए उर्जित पटेल को नया गवर्नर सरकार ने नियुक्त किया. उनके बारे में यह धारणा बनाई गई कि वे गुजरात से आते हैं और मोदी के करीबी हैं. अब इस संकट के बाद अगर उर्जित पटेल इस्तीफा देकर दे जाते हैं तो दुनिया के बाजार में सरकार की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता को बड़ा धक्का लगेगा.पैनल की विस्तृत राय जानने और अन्य मुद्दों के लिए सुनें पूरी चर्चा. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 44: हाशिमपुरा, डीडी न्यूज़ पत्रकार की मौत, पाकिस्तान में ईशनिंदा और अन्य
Apr 14 2019 55 mins  
दंतेवाड़ा में हुआ नक्सली हमला, पाकिस्तान में आसिया बीबी के ईशनिंदा मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और पाकिस्तानी अवाम का विरोध, राम मंदिर की सुनवाई की तारीख बढ़ने और हाशिमपुरा नरसंहार पर आया दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला आदि इस बार की एनएल चर्चा का विषय रहे.इस बार की चर्चा में दो खास मेहमानों ने टेलीफोन के जरिए हिस्सा लिया. इनमें हैदराबाद से पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम, जिन्होंने नक्सली इलाकों में काफी पत्रकारिता की है और साथ ही पाकिस्तान से बीबीसी के पूर्व पत्रकार हफीज चाचड़ शामिल हुए. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल, विशष संवाददाता अमित भारद्वाज भी शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल चौरसिया ने दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले और दूरदर्शन के कैमरामैन अच्युतानंद साहू की मौत पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे किसी भी हिंसाग्रस्त इलाके में काम करने वाले पत्रकारों की क्या चुनौतियां हैं, जो पत्रकार वहां जा रहे है उनको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? यह बड़ा प्रश्न है. इसके जवाब में मालिनी सुब्रमण्यम ने कहा, “यह बहुत ही बड़ा घटना है. और इस बात पर दोनों पक्षों को, सरकार और माओवादी, सफाई देने की जरूरत है. हालांकि माओवादियों ने एक पर्चा जारी कर कहा है कि- “पत्रकारों पर हमला करने का उनका कोई उद्देश्य नहीं था. उन्होंने पुलिस के ऊपर हमला किया था. जैसे ही उन्होंने पुलिस को देखा तो हमला कर दिया. इस हमले को लेकर प्रपोगेंडा चलाया जा रहा है कि माओवादियों ने पत्रकारों को निशाना बनाया. उन्हें बिलकुल भी पत्रकारों के बारे में नहीं था पता था.”अतुल ने पुलिस और पत्रकारों के साथ होने की ओर ध्यान खींचते हुए सवाल किया कि क्या पत्रकारों को ऐसे युद्धरत इलाकों में किसी भी एक पार्टी (सुरक्षा बल या माओवादी) के साथ रिपोर्टिंग के लिए जाना चाहिए? क्योंकि वहां किसी एक पार्टी के साथ होने की सूरत में रिपोर्टर खुद ब खुद दूसरी पार्टी के निशाने पर आ जाते हैं. मालिनी ने डीडी के पत्रकारों द्वारा की गई एक चूक बताया. उनके मुताबिक पत्रकार को स्वतंत्र रूप से ऐऐसे इलाकों में जाना चाहिए. पुलिस चाहे कितनी भी संख्या में हो, पत्रकार के साथ होना खतरे का सबब है.इसी चर्चा को आगे बढ़ते हुए राहुल कोटियाल का एक सवाल आया कि यह जो घटना घटी है, क्या इसको एक छोटी-मोटी घटना मान लिया जाये या फिर इसमें कोई बड़ा संदेश छिपा है? मालिनी ने जवाब में कहा, “इसमें से एक संदेश पत्रकारों को लिए है. एंबुश आए दिन होते रहते हैं. तो ऐसे इलाकों में पत्रकारों की अपनी पहचान के साथ जाना होगा. जैसा कि माओवादियों ने भी कहा है कि कोई पत्रकार चुनाव कवर करने आ रहा है, वह स्वतंत्र होकर आए. किसी भी तरह की सुरक्षा न ले.”न्यूज़लांड्री के रिपोर्टर अमित भारद्वाज ने एक नए पहलू की पर रोशनी डालते हुए सवाल किया कि दरगा कमेटी द्वारा जारी चिट्ठी, जिसमें माओवादियों ने पत्रकारों और चुनाव कर्मियों से कहा कि वो आयें चुनाव कवर करें, चुनाव प्रक्रिया में शामिल हों लेकिन बिना सुरक्षाबलों के। हम उन्हें क्षति नहीं पहुंचाएंगे, लेकिन वहीं दूसरी तरफ अटैक करते हैं। तो क्या इसमें विरोधाभाष नजर नहीं आता? जिसके जवाब में मालिनी ने कहा कि हर पक्ष स्वयम को बचाने की कोशिश कर रहा है।इस विषय के आखिर में अतुल ने कहा कि डीडी न्यूज़ के पत्रकारों की तरफ से यह बड़ी चूक हुई है. दुनिया भर के संघर्षरत इलाकों में, युद्धग्रस्त इलाकों में रिपोर्टिंग के लिए जाने वाले पत्रकारों को एक स्पष्ट गाइडलाइंस फॉलो करने की जरूरत है. उन्हें क्या करना है, क्या नहीं करना है, इसकी स्पष्ट समझ होनी चाहिए. यह ज़िम्मेदारी पत्रकारिता संस्थानों की भी है कि वे ऐसे पत्रकारों को व्यापक प्रशिक्षण देकर ही युद्धरत इलाकों में रिपोर्टिंग के लिए भेजें.पैनल की विस्तृत राय जानने और अन्य मुद्दों के लिए सुनें पूरी चर्चा. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 43: शबरीमाला, गुजरात से पलायन, स्वामी सानंद की मृत्यु और अन्य
Apr 14 2019 55 mins  
गुजरात में उत्तर भारतीयों पर हुए हमले के बाद उनका पलायन, शबरीमाला मंदिर मुद्दे पर हो रही राजनीति और राजनीतिक पार्टियों का महिलाओं के मुद्दे पर दोहरा रवैया, इलाहाबाद को मिले नए नाम प्रयागराज और गंगा की सफाई के लिए अनशन पर बैठे स्वामी सानंद की मृत्यु इस हफ्ते की एनएल चर्चा का मुख्य विषय रहे.इस बार चर्चा में स्तंभ लेखक और ओपिनियन लेखक आनंद वर्धन, न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल, न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल चौरसिया ने शबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिला के प्रवेश संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा की जा रही सियासत का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा, “महिलाओं के जो मुद्दे हैं, राजनीतिक पार्टियां उन्हें भी धर्म के चश्मे से ही देख रही हैं. दुर्भाग्य यह है कि इसमें कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों एक ही मंच पर आती दिख रही हैं.”अतुल आगे कहते हैं, “कुछ ही महीने पहले हमने देखा कि तीन तलाक के मुद्दे पर मौजूदा सरकार ने महिला सशक्तिकरण के बड़े बड़े दावे किए थे और मुस्लिम महिलाओं की बेहतरी की बातें कही थी. आज शबरीमाला के मुद्दे पर वही भाजपा सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ वहां आंदोलन चला रही है.”चर्चा को विस्तार देते हुए अमित भारद्वाज ने सबरीमाला के प्रसंग में बात करते हुए इसका ऐतिहासिक विवरण दिया और इसे वर्तमान संदर्भ से जोड़ा. आनंद वर्धन ने शबरीमाला प्रकरण को एक संस्थागत विषय मानते हुए इसे पूरे हिंदू समाज की समस्या के तौर पर देखने की प्रवृत्ति को गलत बताया. इस तरह की दिक्कतें किसी एक संस्था से जुड़ी हो सकती हैं. और इसके नकारात्मक पक्ष भी हो सकते हैं लेकिन इसे पूरे हिंदू धर्म से जोड़ा जा रहा है. ऐसे तमाम मंदिर हैं जहां महिलाओं के प्रवेश पर कोई प्रतिबंध नहीं हैं.गुजरात और उत्तर भारतीयों पर हुई हिंसा के मामले में हो रही राजनीति पर राहुल कोटियाल ने कहा कि इस तरह का नस्ल भेद आपको लगभग हर जगह देखने को मिलेगा, जहां किसी दूसरे क्षेत्र के लोग आकर रहते हैं. आगे उन्होंने कहा कि इस राजनीति का कोई चेहरा नहीं है.अमित भारद्वाज ने गुजरात के पलायन के पीछे चल रही राजनीति की ओर इशारा किया. उनके मुताबिक इस घटना के समय और स्वरूप को देखकर कहा जा सकता है कि इसके पीछे राजनीतिक ताकतें काम कर रही हैं. साथ ही अमित ने इस मसले को संक्षिप्त में समझाते हुए इसे गुजरात के सामाजिक और आर्थिक मामलों से भी जोड़ा.उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इलाहाबाद का नाम बदल कर प्रयागराज किए जाने के कई पहलुओं पर चर्चा हुई. आनंद वर्धन ने इस पर बात रखते हुए कहा कि भारत में नाम बदलने की राजनीतिक संस्कृति हमेशा रही है, उत्तर प्रदेश में भी रही है. आगे उन्होने कहा कि नाम बदलना संघ के उन सांस्कृतिक प्रोजेक्ट्स का हिस्सा है जो सबसे कम प्रतिरोध उत्पन्न करते हैं. अतुल चौरसिया ने इलाहाबाद के नाम पर चर्चा करते हुए उसके इतिहास पर रोशनी डाली. आनंद ने आखिर में लालू प्रसाद द्वारा पटना का नाम बदलकर अज़ीमाबाद करने की योजना का किस्सा सुनाया.स्वामी सानंद की 112 दिन के अनशन के बाद हुई मृत्यु पर बात करते हुए राहुल कोटियाल ने उनके और उनके पहले स्वामी निगमानंद की मृत्यु की भी चर्चा की. राहुल ने यह भी बताया कि गंगा को लेकर संत समाज की मांगें क्या हैं? और गंगा को साफ और अविरल बनाए रखने के लिए जो कदम उठाए जाते रहे हैं, वह कितने अपर्याप्त हैं. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 42: #MeToo, हिन्दी मीडिया में महिलाएं, यौन उत्पीड़न और अन्य
Apr 14 2019 60 mins  
इस बार की एनएल चर्चा बाकी एपीसोड से अलग रही. पूरी चर्चा सिर्फ कामकाजी महिलाओं का दफ्तरों, या कार्यस्थलों में होने वाला शोषण पर केंद्रित रही. #MeToo आंदोलन में उठी आवाजें, भारतीय मीडिया में इस अभियान से मची उथल-पुथल, एमजे अकबर, आलोक नाथ जैसे बड़े नामों का नाम आना इस हफ्ते की प्रमुख चर्चा रही. लिहाजा इसके अलग-अलग पहलुओं तथा महिलाओं से जुड़े विषयों पर आधारित रही इस बार की न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा.इस बार की चर्चा में मीडिया में काम करने वाली कुछ महिलाओं ने हिस्सा लिया. लेखिका एवं वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री, बीबीसी हिन्दी की पत्रकार सर्वप्रिया सांगवान तथा न्यूज़लॉन्ड्री की सबएडिटर चेरी अग्रवाल उपस्थित रही. इस चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के सहायक संपादक राहुल कोटियाल ने किया.चर्चा की शुरुआत करते हुए राहुल ने #MeToo आंदोलन के इतिहास पर रोशनी डाली और बताया कि इसे भारत का #MeToo आंदोलन कहा जा रहा है. राहुल ने कहा, “हालांकि यह अभियान अभी यह बहुत सीमित तबके के बीच है और उन्हीं की आवाज़ें हम तक पहुंच रही हैं.”इसके जवाब में गीताश्री ने कहा कि स्त्रियों के लिए दुनिया तो सिर्फ 20 साल पहले ही खुली है कि वह अपना करियर बना सकी, एजुकेशन में आ सकी. उन्होंने आगे जोड़ा, “हम (महिलाएं) अपनी दुनिया को उस समय एक्सप्लोर नहीं कर पाये थे, अभी जिस वक़्त में हम लोग जी रहे हैं, हमने अपनी दुनिया को एक्सप्लोर कर लिया है और अब चुप रहना मुश्किल है.”सर्वप्रिया सांगवान ने इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए मीडिया के दफ्तरों में महिलाओं की मौजूदगी पर अपनी राय रखी. उन्होंने कहा, “टीवी मीडिया के अंदर बहुत सारी लड़कियां काम कर रही हैं, एंकर्स भी हैं. लेकिन रिपोर्टर्स तो बहुत ही कम हैं. जहां पर एक्चुअल में पत्रकारिता का काम करना है, वहां नहीं हैं. वह काम पुरुषों के लिए ही ज्यादा मुफीद माना जाता है. लेकिन एंकर के तौर पर बहुत सारी लड़कियां हैं क्योंकि वहां पर आपको सुंदर चेहरे चाहिए होते है. दिखाना होता है ताकि लोग एक बार रुक जाएं. आखिर कौन लोग हैं जो चेहरा देखकर रुक जाते हैं.”चेरी अग्रवाल ने इसे लड़कियों की सामाजिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिकता से जोड़ा. उन्होंने कहा, “अगर मैं या मेरे जैसी बहुत सारी लड़कियां अपने घर पर बताएं कि उनका सेक्सुअल हरासमेंट हुआ है तो पहली बात वो बोलेंगे की बेटा आप वापस आ जाओ. और यह एक बड़ी भूमिका निभाता है.” #MeToo मामले में मीडिया की स्थिति पर बात करते हुए चेरी ने कहा कि ऐसा नहीं है कि आवाज केवल एक सीमित तबके की ही आ रही है, बल्कि ये मीडिया है जो अपनी भूमिका एक सीमित दायरे तक सीमित रखे हुए है.राहुल कोटियाल ने वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हरासमेंट को कम करने के ऊपर कहा कि अगर हम ये कोशिश करें कि सेक्सुअल हरासमेंट को लेकर जो अप्रोच है, सोच है, उसका कोई एक उपाय हो सकता है तो यह संभव नहीं है. जिस तरह से हम नए कर्मचारी को बता सकते हैं कि क्या-क्या करें उसी तरह की एक ट्रेनिंग पुरुषों के लिए हो सकती है, इसको अनलर्न करने के लिए. और यही छोटे-छोटे फैक्टर हैं, जो लॉन्ग टर्म में चीजों को एक दिशा में ले जाते हैं. जैसे यह अभियान चल रहा है तो ये भी कहीं न कहीं उस अनलर्निंग की दिशा में अपनी भूमिका अदा कर रहा है.पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए सुनें पूरी चर्चा. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 41: किसानों का दिल्ली मार्च, शबरीमाला पर फैसला और अन्य
Apr 14 2019 49 mins  
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड से आए किसानों पर हुआ लाठीचार्ज, शबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर केरल में महिलाओं का व्यापक विरोध और लखनऊ में विवेक तिवारी की पुलिसकर्मी द्वारा हत्या जैसे विषयों पर आधारित रही इस हफ्ते की न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा.स्वतंत्र पत्रकार और दिल्ली यूनिवर्सिटी में अस्थायी शिक्षिका स्वाति अर्जुन इस हफ्ते चर्चा की मेहमान पत्रकार रहीं. न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल, प्रतीक गोयल पैनल में शामिल रहे. इसके अलावा अमित भारद्वाज फोन पर चर्चा में जुड़े. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.शबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की आयुसीमा पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला और उस पर केरल में मचे संग्राम पर विस्तृत चर्चा हुई. चर्चा की शुरुआत करते हुए अतुल चौरसिया ने कहा, “या तो आप आस्तिक हो सकते हैं या फिर नास्तिक. आस्था में तर्क के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता है.”अतुल ने आगे जोड़ा, “आप यज्ञ में आहुति देते हैं तो उसके लिए तीन उंगलियों से आहुति देने का प्रावधान है. तर्क यह कहता है कि पूरे हाथ से उठाकर आहुति आग में डाल दीजिए. सिर्फ तीन उंगलियों से क्यों? बाकी दो उंगलियों से भेदभाव क्यों? लेकिन आस्था में यह तर्क काम नहीं करता. इस लिहाज से शबरीमाला मामले में असहमति का आदेश देने वाली जज इंदु मल्होत्रा काफी हद तक सही हैं.”राहुल कोटियाल ने इससे असहमति जताते हुए कहा, “धर्म में सुधार का विचार भी समय के साथ-साथ चलता रहता है. हमारे यहां समय-समय पर इसके तमाम उदाहरण हैं. सती प्रथा एक समय में समाज में पूरी तरह से स्वीकार्य थी. लेकिन राजा राममोहन राय ने अंग्रेजों के साथ मिलकर इसका प्रतिरोध किया और अंतत: यह कुप्रथा समाज से समाप्त हो गई.”राहुल आगे जोड़ते हैं, “इस तरह के कानून कम से कम एक मौका देते हैं जहां किसी भी तरह की आस्था के शिकार लोग कम से कम अपने लिए न्याय की अपेक्षा कर सकते हैं. यही स्थिति तीन तलाक़ के ऊपर आए फैसले में भी हमने देखा था.”स्वाति ने इसका एक अन्य पक्ष सामने रखा. उन्होंने कहा, “समाज की संरचना में महिलाओं की स्थिति ऐसी कर दी गई है कि वे कोई स्वतंत्र निर्णय ले पाने की स्थिति में ही नहीं होती है. यहां एक महिला के वोट देना का निर्णय भी उसके परिवार के लोग ही तय करते हैं. जो महिलाएं शबरीमाला मंदिर के फैसले के खिलाफ आज सड़कों पर उतर रही हैं उनमें से अधिकतर अपने परिवारों के दबाव में ऐसा कर रही होंगी.”प्रतीक ने इसमें केरल और तमिलनाडु के इलाके में पारिवारिक संस्था के ऊपर अपनी बात रखते हुए बताया कि- “केरल और इस इलाके में समाज एक हद तक स्त्रीवादी है. वहां बच्चियों के प्यूबर्टी एज का जश्न मनाया जाता है.”बाकी विषयों पर पैनल की विस्तृत राय जानने के लिए सुनें पूरी चर्चा. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एपिसोड 40: आधार, एडल्टरी, अयोध्या, अमिताभ और अन्य
Apr 14 2019 58 mins  
इससे पहले की चर्चा में इस हफ्ते क्या खास रहा, न्यूज़लॉन्ड्री के पाठकों को हमें यह सूचित करते हुए खुशी हो रही है कि आगामी 2 अक्टूबर को न्यूज़लॉन्ड्री हिंदी अपनी पहली वर्षगांठ मना रहा है. इस अवसर पर हमने एक विशेष परिचर्चा का आयोजन किया है, जिसका शीर्षक है- “गांधी का राष्ट्रवाद बनाम संघ का राष्ट्रवाद: कितने दूर, कितने पास.” कार्यक्रम नई दिल्ली के लोधी रोड स्थित इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में शाम 6 से 8 बजे तक होगा. ध्यान रहे, इस परिचर्चा में भाग लेने के लिए आपको न्यूज़लॉन्ड्री का सब्सक्रिप्शन लेना होगा. जो पहले से सब्सक्राइबर हैं, वह यहां रजिस्टर कर सकते हैं.राफेल डील को लेकर भाजपा औककांग्रेस के बीच जारी कशमकश, आधार पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, एडल्टरी कानून धारा 497 को निरस्त किया जाना, बॉलीवुड अभिनेत्री तनुश्री दत्ता के यौन उत्पीड़न के आरोपों पर अमिताभ बच्चन का यह कहना, "वह न तो नाना पाटेकर, न ही तनुश्री हैं, ऐसे में वह कुछ नहीं कह सकते", अयोध्या राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद मामले से जुड़े "मस्जिद इस्लाम का अभिन्न अंग है या नहीं" की सुनवाई के दौरान कोर्ट का कहना कि मामले को बड़े बेंच में नहीं भेजा जाएगा, इस हफ्ते चर्चा के प्रमुख विषय रहे हैं.चर्चा के मेहमान पत्रकार रहे एस मेघनाद. साथ ही पैनल में थे न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता राहुल कोटियाल और अमित भारद्वाज. न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने चर्चा का संचालन किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 39: मायावती का गठबंधन, मोहन भागवत का बयान, देहरादून के स्कूल में गैंगरेप व अन्य
Apr 14 2019 46 mins  
छत्तीसगढ़ में मायावती की बसपा और अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस से गठबंधन का फैसला, डूसू अध्यक्ष अंकित बसोया की डिग्री पर बवाल, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का दिल्ली में तीन दिवसीय आयोजन, देहरादून के स्कूल में गैंगरेप आदि इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के प्रमुख विषय रहे.गांव कनेक्शन के कंसल्टिंग एडिटर हृदयेश जोशी चर्चा में मेहमान पत्रकार के रूप में शामिल हुए. हृदयेश के साथ पैनल में थे न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज और राहुल कोटियाल. न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने चर्चा का संचालन किया.अगले तीन महीने में छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. छत्तीसगढ़ में मायावती की बसपा ने अजित जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस के साथ गठबंधन किया है. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 38: सफाई कर्मचारियों की मौत, सेरेना विलियम्स, चंद्रशेखर रावण व अन्य
Apr 14 2019 52 mins  
केरल की नन के साथ जलंधर के बिशप द्वारा बलात्कार का आरोप, सेरेना विलियम्स का रेफरी पर नस्लवाद का आरोप, भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर रावण की रिहाई और दिल्ली के मोती नगर क्षेत्र में सफाईकर्मियों की सीवर में मौत- इन विषयों पर आधारित रही इस हफ्ते की न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा.वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भाषा सिंह, स्तंभ लेखक आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री के असिस्टेंट एडिटर राहुल कोटियाल पैनल में शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 37: 377, समलैंगिकता, कन्हैया कुमार और नोटबंदी
Apr 14 2019 60 mins  
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया गया, बीते जनवरी में जिग्नेश मेवानी की रैली के दौरान रिपब्लिक के अर्नब गोस्वामी द्वारा तथ्यहीन रिपोर्टिंग और अपमानजनक टिप्पणियों पर एनबीएसए की फटकार, संभावना कि कन्हैया कुमार बेगूसराय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं और रिजर्व बैंक का नोटबंदी से जुड़ा ताजा आंकड़ा जहां आरबीआई ने कहा कि 99 फीसदी से ज्यादा पैसा बैंकों में वापस आ गया. इन विषयों पर आधारित रही इस हफ्ते की न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा.सुप्रीम कोर्ट में धारा 377 को निरस्त करने की याचिका डालने वाले याचिकाकर्ता यशवेन्द्र सिंह इस बार चर्चा में बतौर मेहमान शामिल हुए. साथ ही पैनल में जुड़े न्यूज़लॉन्ड्री के विशेष संवाददाता अमित भारद्वाज और स्तंभ लेखक आनंद वर्धन. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 36: राहुल गांधी का बयान, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी, आतिशी 'मार्लेना' व अन्य
Apr 14 2019 57 mins  
राहुल गांधी का 1984 दंगों के संबंध में बयान (जिसमें उन्होंने कहा कि 1984 दंगों में पार्टी के स्तर पर कांग्रेस की संलिप्तता नहीं थी), भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का मालदीव चुनावों के संबंध जारी ट्वीट, (मालदीव चुनावों में अगर किसी प्रकार की धांधली होती है, तो भारत सरकार को मालदीव पर हमला कर देना चाहिए), देश भर में मानवाधिकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां, आप नेत्री आतिशी मार्लेना के नाम में बदलाव आदि रहे इस हफ्ते की न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के मुख्य विषय. स्वतंत्र पत्रकार नेहा दीक्षित इस हफ्ते चर्चा की अतिथि पत्रकार थीं. पैनल में न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज और राहुल कोटियाल भी मौजूद थे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 35: कुलदीप नैयर, केरल की बाढ़ और आप की उठापटक
Apr 14 2019 58 mins  
केरल में आई बाढ़ की आपदा से उबरने के लिए यूएई की ओर से कथित आर्थिक मदद की पेशकश, नवजोत सिंह सिद्धू का पाकिस्तान सेना प्रमुख जनरल बाजवा से गले मिलना, आम आदमी पार्टी के भीतर खींचतान, वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का निधन और राहुल गांधी द्वारा विदेशी जमीन पर दिया गया भाषण इस हफ्ते चर्चा के प्रमुख विषय थे.इस बार चर्चा के विशिष्ट अतिथि रहे फिल्म समीक्षक मिहिर पांड्या. साथ ही पैनल में मौजूद रहे न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज और राहुल कोटियाल. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.15 अगस्त से 24 अगस्त के बीच आम आदमी पार्टी से उसके दो वरिष्ठ सदस्यों आशुतोष और आशीष खेतान ने इस्तीफा दे दिया. दोनों पेशे से पत्रकार थे और आम आदमी पार्टी के गठन के बाद राजनीति में आए थे.आप में शुरू हुई इस नई उठापटक के संबंध में अमित भारद्वाज ने कहा, "पिछले छह महीनों में आप के तीन बड़े नेताओं (कुमार विश्वास, आशुतोष और आशीष खेतान) ने पार्टी से किनारा कर लिया है. इसके केन्द्र में तीन राज्यसभा सीटें हैं. पार्टी ने संजय सिंह सहित दो गुप्ताओं को राज्यसभा भेजा. वहीं से यह सारा मामला शुरू हुआ है.""हमने देखा है नेताओं का आना-जाना तब होता है जब पार्टियां सत्ता से बाहर होती हैं. यहां आप सत्ता में है फिर भी उसके नेता पार्टी से किनारा कर रहे हैं," अतुल ने कहा.साथ ही अतुल ने यह भी कहा, “योगेंद्र यादव या प्रशांत भूषण के अलगाव की तुलना में आशुतोष और आशीष का जाना एकदम अलग है. इन दोनों ने बेहद शांति से व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए, नेतृत्व पर कोई सवाल खड़ा किए बिना पार्टी से किनारा किया है, इस लिहाज से यह किसी पद या महत्वाकांक्षा से इतर पार्टी से पैदा हो रहे मोहभंग का मामला दिखता है. योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार के इस्तीफे के बाद जिस तरह से नाकारात्मक रिपोर्टिंग हुई थी, वैसा इस बार देखने को नहीं मिल रहा है.”राहुल कोटियाल ने बताया, "अब तक आप के अंदर हुए इस्तीफों को तीन स्तरों पर देखा जाना चाहिए. पहला, योगेन्द्र यादव, आनंद कुमार और प्रशांत भूषण का इस्तीफा जो कि काफी हद तक सैद्धांतिक कारणों से जुड़ा था. दूसरा, कुमार विश्वास का पार्टी से किनारा जो कि स्पष्ट रूप से राज्यसभा की सीट न मिलने के चलते पैदा हुई कुंठा का नतीजा था. तीसरा, आशुतोष और आशीष खेतान का इस्तीफा है जिस पर फिलहाल पार्टी का रुख अस्पष्ट है. बहुत संभव है कि ये किसी तरह की निगोशियेशन की कोशिश हो."मिहिर पांड्या ने अतुल की बात से सहमति जताते हुए अपनी बात शुरू की. उनके मुताबिक, "आम आदमी पार्टी चुनावी राजनीति की तयशुदा ढर्रे में बदल गई है. दरअसल, एक-एक करके वे सारे लोग जो विनिंग कैंडिडेट नहीं है या उन्हें समझ आ गया है कि वे उस ढांचे में फिट नहीं बैठते जिसमें चुनाव जीता जाता है, ऐसे में उन्हें समझ आ रहा है कि पार्टी को उनकी जरूरत नहीं है."मिहिर ने बताया कि पिछले कुछ समय में पार्टी में जिस तरह के सैद्धांतिक बदलाव हुए हैं वह भी चिंता का विषय है. ऐसा लगता है अरविंद केजरीवाल को समझ आ गया है कि भारतीय राजनीति में उन उसूलों पर राजनीति नहीं कर सकते, जिसकी कल्पना उन्होंने की थी.साथ ही चर्चा में एक सवाल आम आदमी पार्टी के नेतृत्व के ऊपर भी उठा. अतुल ने पैनल से केजरीवाल और सिसोदिया के नेतृत्व के संबंध में पैनल की राय जानना चाहा. अमित ने बताया कि न सिर्फ दिल्ली में बल्कि अन्य राज्यों में भी नेतृत्व का संकट गहराता जा रहा है. उन्होंने पंजाब का उदाहरण दिया जहां से आप को अब तक दिल्ली के बाद सबसे बड़ी सफलता मिली है. वहां पार्टी में खींचतान चल रही है. निश्चित रूप से आप नेतृत्व में दिल्ली दरबार वाली कार्यसंस्कृति के संकेत मिल रहे हैं जिससे पार्टी के भीतर कसमसाहट है.वहीं पार्टी जिन्हें चुनाव लड़ने का अवसर दे रही है, उनके पास संसाधनों की घोर कमी है. अमित के मुताबिक "आशुतोष से पार्टी ने चुनाव लड़ने की पेशकश की थी लेकिन उन्होंने मना कर दिया था. खेतान भी चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे. संसाधनों के आभाव में भाजपा जैसी पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ना बहुत मुश्किल है."बाकी विषयों के लिए पूरी बातचीत सुनें. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.





एपिसोड 31: अलवर लिंचिंग, इमरान खान, मुजफ्फरपुर बालिका गृह व अन्य
Apr 14 2019 74 mins  
अलवर में अकबर खान की मॉब लिंचिंग, मराठा आरक्षण, पाकिस्तान के चुनाव में इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना और मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों के साथ यौन उत्पीड़न की खबर इस हफ्ते चर्चा के मुख्य विषय रहे.चर्चा के विशिष्ट अतिथि थे वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी. साथ ही पैनल में मौजूद रहे राहुल कोटियाल और रोहिण कुमार. साथ ही फोन पर न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज भी जुड़े. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


मॉब लिंचिंग: क्या है व्हाट्सएप की भूमिका?
Apr 14 2019 26 mins  
एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार व्हाट्सएप अफवाहों और फेक न्यूज़ के आधार पर देशभर में पिछले एक महीने में 20 लोगों की हत्या हो चुकी है. क्विंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 से अबतक मॉब लिंचिंग में 65 लोगों की जान जा चुकी है. भारत सरकार ने व्हाट्सएप को अफवाहों पर लगाम लगाने की चेतावनी दी है. जबाव में व्हाट्सएप ने सरकार से कहा कि वह भारत में व्हाट्सएप के दुरुपयोग से चिंतित है. "यह एक चुनौती है और हमें भारत सरकार, नागरिक समाज और तकनीकी कंपनियों को साथ मिलकर काम करना पड़ेगा."साथ ही व्हाट्सएप ने अखबारों में भी विज्ञापन दिया. यह कुछ साधारण सलाह हैं जिसे व्हाट्सएप संदेशों के मद्देनज़र ध्यान दिया जाना है. मसलन व्हाट्सएप पर प्राप्त संदेश को फॉरवर्ड करने के पहले समझना, सवाल करना, दूसरे स्रोतों से क्रॉसचेक करना और सोच-विचार कर कुछ भी साझा करने जैसी सलाहें शामिल थी. सुनिए क्या है इसपर पत्रकारों की राय. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 30: युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण, मॉब लिंचिंग, अविश्वास प्रस्ताव व अन्य
Apr 14 2019 88 mins  
युवाओं को सैन्य परीक्षण देने की योजना, मॉब लिंचिग पर सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश, मानसून सत्र में आया अविश्वास प्रस्ताव और पाकिस्तान में होने वाले चुनाव के पहले नवाज शरीफ की गिरफ्तारी जैसे मुद्दे इस हफ्ते चर्चा के मुख्य विषय रहे.द वायर उर्दू के संपादक महताब आलम और न्यूज़लॉन्ड्री के स्तंभ लेखक आनंद वर्धन चर्चा के अतिथि बने. इनके साथ ही पैनल में न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज और राहुल कोटियाल भी शामिल हुए. न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने चर्चा का संचालन किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 29: धारा 377, जियो इंस्टिट्युट, शशि थरूर व अन्य
Apr 14 2019 68 mins  
सुप्रीम कोर्ट में धारा 377 पर जारी सुनवाई, शशि थरूर का थिरुवनंतपुरम में हिंदू पाकिस्तान संबंधी बयान, मानव संसाधन व विकास मंत्रालय द्वारा अंबानी के जियो इंस्टिट्युट को इंस्टिट्युट ऑफ प्रॉमिनेंस का दर्जा दिया जाना, रामगढ मॉब लिंचिंग के दोषियों को केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा द्वारा स्वागत किया जाना व अन्य इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के प्रमुख विषय रहे.राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम चर्चा के विशिष्ट अतिथि थे. इसके साथ पैनल में न्यूज़लॉन्ड्री के संवाददाता अमित भारद्वाज और रोहिण कुमार भी शामिल रहे. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 28: आप-एलजी विवाद, खरीफ की कीमत, माब लिंचिंग व अन्य
Apr 14 2019 81 mins  
दिल्ली में तीन साल से चल रहे आप और एलजी के अधिकारों के विवाद पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला, बच्चा चोरी के अफवाह पर देश भर में हो रही मॉब लिंचिग की घटनाएं, भारत में महिलाओं की असुरक्षा को लेकर आया थॉमसन रॉयटर्स का सर्वेक्षण, असम में चल रहे एनआरसी के आंकड़े और खरीफ की फसल पर बढ़ाया गया न्यूनतम समर्थन मूल्य व अन्य मुद्दे इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के मुख्य विषय रहे.एनडीटीवी की वरिष्ठ पत्रकार नग़मा सहर और स्वतंत्र पत्रकार मनीषा भल्ला इस बार की चर्चा के विशिष्ट अतिथि थे. उनके साथ पैनल में मौजूद थे न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज. न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने चर्चा का संचालन किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 27: वंदे मातरम, आपातकाल की वर्षगांठ, पत्थलगड़ी और अन्य
Apr 14 2019 55 mins  
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस पर तुष्टिकरण और बंटवारे का आरोप, आपातकाल की वर्षगांठ, मीडिया संस्थानों से नोटबंदी के दौरान एक सहकारिता बैंक (जिसके निदेशक अमित शाह थे) में पांच दिनों के अंदर 745 करोड़ रूपए जमा होने की खबर का हटाया जाना, झारखंड के खूंटी में पत्थलगड़ी आंदोलन, स्विस बैंकों में पैसे जमा होने की गति बढ़ना व अन्य मुद्दे इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के मुख्य विषय रहे.मीडिया विजिल के संस्थापक व वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव चर्चा के विशिष्ट अतिथि थे. उनके साथ पैनल में मौजूद थे न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज. न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने चर्चा का संचालन किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एपिसोड 26: जम्मू-कश्मीर, एयरटेल विवाद, हापुड़ और अन्य
Apr 14 2019 69 mins  
बीते मंगलवार को जम्मू-कश्मीर में भाजपा का पीडीपी से गठबंधन खत्म कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना, हापुड़ में गोकशी के नाम पर भीड़ द्वारा कासिम की हत्या, एयरटेल द्वारा पूजा सिंह नाम की युवती की आपत्ति के बाद मुस्लिम धर्म के कस्टमर केयर एग्जेक्यूटिव की जगह हिंदू कस्टमर केयर एग्जेक्यूटिव मुहैया करवाया जाना, जज लोया की स्टोरी करने वाले पत्रकार निरंजन टाकले का करीब आठ महीने से बेरोजगार होना व अन्य मुद्दे रहे इस हफ्ते चर्चा के मुख्य विषय.चर्चा के मुख्य अतिथि रहे बचपन बचाओ आंदोलन से जुड़े अनिल पाण्डेय, न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज और उपसंपादक रोहिण कुमार. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 25: शुजात बुख़ारी की हत्या, अरविंद केजरीवाल का धरना, अखिलेश यादव व अन्य
Apr 14 2019 69 mins  
राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की अज्ञात हमलावरों द्वारा गोली मारकर हत्या, अखिलेश यादव पर सरकारी बंगले को क्षतिग्रस्त करने का आरोप, दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार और गवर्नर के बीच तनातनी, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में स्नातक की छात्रा पर धार्मिक भावनाएं आहत करने का मुकदमा आदि इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के प्रमुख विषय रहें.इस सप्ताह चर्चा के पैनल में शामिल थे विस्फोट डॉट कॉम के संपादक संजय तिवारी, ओपिनियन लेखक आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्टर अमित भारद्वाज. अतुल चौरसिया, न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक ने चर्चा का संचालन किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 24: प्रणब मुखर्जी, शिलॉन्ग हिंसा, भीमा कोरेगांव और अन्य
Apr 14 2019 59 mins  
प्रणब मुखर्जी का संघ के तृतीय वर्ष समारोह में संबोधन, कश्मीर में सीआरपीएफ की गाड़ी से कुचलकर एक युवक की मौत, शिलॉन्ग में दलित सिख और खासी आदिवासियों के बीच झड़प और हिंसा और इसी वर्ष हुए भीमा कोरेगांव हिंसा के संदर्भ में सामाजिक कार्यकर्ताओं का पुलिस द्वारा गिरफ्तारी रहे इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के मुख्य विषय.चर्चा की विशिष्ट अतिथि थी वरिष्ठ पत्रकार मनीषा भल्ला. साथ में पैनल में मौजूद थे न्यूज़लॉन्ड्री के रिपोर्टर अमित भारद्वाज और उपसंपादक रोहिण कुमार. न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक ने चर्चा का संचालन किया See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

कोबरापोस्ट ऑपरेशन 136: टाइम्स, इंडिया टुडे समेत तमाम बड़े खिलाड़ी फंदे में
Apr 14 2019 29 mins  
शुक्रवार को इंवेस्टिगेटिव मीडिया संस्था कोबरापोस्ट ने ऑपरेशन 136 का दूसरा हिस्सा फेसबुक लाइव के जरिए जारी किया. कोबरापोस्ट के यूट्यूब चैनल पर इस स्टिंग ऑपरेशन से संबंधित कुल 50 वीडियो डाले गए हैं, जिनमें मीडिया जगत की कई जानी मानी हस्तियां मोल-तोल करते हुए रिकॉर्ड हुई हैं.इस स्टिंग के पहले भाग में हमने देखा था कि मीडिया जगत की बड़ी हस्तियां पैसे के बदले हिंदुत्व का एजेंडा अपने चैनल, अखबार के जरिए बढ़ाने को राजी थे. दूसरे हिस्से में भी वही बात सामने आई है.इनमें टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडिया टुडे, हिंदुस्तान टाइम्स, ज़ी न्यूज़, नेटवर्क18, स्टार इंडिया, एबीपी न्यूज़, रेडियो वन, रेड एफएम, लोकमत, एबीएन आंध्रा ज्योति, टीवी5, दिनमलार, बिग एफएम, के न्यूज़, इंडिया वॉइस, द न्यू इंडियन एक्सप्रेस, एमवीटीवी और ओपेन मैगज़ीन शामिल है. सुनिए इसी विषय पर पत्रकारों की बातचीत. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 23: कोबरापोस्ट, राना अयूब को धमकी, प्रणब मुखर्जी का नागपुर गमन व अन्य
Apr 14 2019 71 mins  
कोबरापोस्ट का ऑपरेशन-136, पत्रकार रवीश कुमार और राना अयूब को दी जा रही जान से मारने की धमकी, टाइम्स नाउ द्वारा तरुण तेजपाल मामले के सीसीटीवी फुटेज जारी करना और प्रणब मुखर्जी का आरएसएस के मुख्यालय नागपुर में स्वयंसेवकों को संबोधित करने का फैसला इस बार की चर्चा के मुख्य विषय रहे.वरिष्ठ पत्रकार और इंडिया टीवी के पूर्व संपादक दिलीप मंडल और वरिष्ठ टेलीविज़न पत्रकार प्रशांत टंडन इस बार की चर्चा के विशेष मेहमान रहे. कार्यक्रम का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.दिलीप मंडल ने एक दिलचस्प उदाहरण से कोबरापोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन-136 को समझाया. उन्होंने कहा, “ऐसा मानिए कि रामलीला हो रही है. लोग भक्ति भाव से राम, सीता हनुमान आदि पात्रों को मंच पर देख रहे हैं. इस बीच अचानक से कोई दर्शक मंच के पीछे पांडाल में चला जाय. संभव है कि वहां लक्ष्मण बना पात्र सिगरेट पी रहा हो. हो सकता है कि राम वहां आयोजकों से अपने भुगतान के लिए लड़ रहा हो. कोबरापोस्ट ने जो दिखाया है, वह परदे के पीछे लंबे समय से होता आ रहा है. अब यह कैमरे के जरिए सामने आ गया है.”वो आगे कहते है, “विश्वसनीयता मीडिया में एक प्रोडक्ट है. तो अगर उस प्रोडक्ट की विश्वसनीयता घटती है तो मीडिया के लिए निश्चित रूप से संकट का काल है. यहां मीडिया लिटरेसी का भी मसला आता है. हमारा देश में मीडिया लिटरेसी बहुत कम है. इसके बनिस्बत पश्चिम में लोगों में मीडिया लिटरेसी एक हद तक आ चुकी है. लोगों को पता है कि सीएनएन डेमोक्रेट्स के साथ है और फॉक्स पब्लिकन के साथ जाएगा. दोनों ही इस बात को छुपाते नहीं हैं. लोग भी दोनों की ख़बरों को उसी संदर्भ में लेते हैं. इसके बनिस्बत आप यहां 20 पन्ने कुछ भी लिखकर छाप दीजिए. आम लोगों में इस बात की समझ नहीं है कि यह क्यों या कहां से आ रहा है.”प्रशांत टंडन ने इस बहस के एक अन्य पहलू की ओर ध्यान खींचा. उन्होंने कहा, “पुष्प शर्मा आचार्य अटल के रूप में जिन तीन चरणों की बात कर रहे थे, यहां मीडिया में वह प्रोजेक्ट पहले से ही चल रहा है, बल्कि वह अपने दूसरे और तीसरे चरण में है. यहां महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या हिंदुत्व के अलावा कोई और स्क्रिप्ट भी चल सकती थी?”प्रशांत आगे कहते हैं, “मान लीजिए पुष्प शर्मा ये कहते कि वे पहले चरण में देश के महापुरुषों में स्थापित करने के लिए वे महात्मा फूले और आंबेडकर के पक्ष में अभियान चलाना चाहते हैं. दूसरे चरण में हम आरक्षण के सवाल पर, उसकी जरूरत पर लोगों को जागरूक करेंगे, आरक्षण विरोधियों को उजागर करेंगे और फिर तीसरे चरण में मनुवाद के खिलाफ लोगों का ध्रुवीकरण करेंगे. क्या तब लोग 500 करोड़ या 1000 करोड़ के बदले यह स्क्रिप्ट खरीदते? ऐसा नहीं है कि एंकर और संपादक किसी कारपोरेट दबाव के चलते ऐसा कर रहे हैं. इसके पीछे अहम वजह मीडिया न्यूज़रूम की संरचना है. कुछ साल पहले मीडिया स्टडीज़ ग्रुप ने एक सर्वे जारी किया था. उसमें मीडिया के फैसला करने वाली जगहों पर 75 फीसदी से ज्यादा हिंदू, सवर्ण और पुरुष पाए गए.”इस स्टिंग ऑपरेशन का एक और पहलू सामने आया जब कुछ बड़े पत्रकारों ने स्टिंग ऑपरेशन को पत्रकारिता मानने से ही खारिज कर दिया. इस विषय पर अपनी बात रखते हुए अतुल चौरसिया ने कहा, “जिन पत्रकारों ने स्टिंग ऑपरेशन को पत्रकारिता नहीं माना है उन्होंने अपने संपादकत्व में दिलीप सिंह जुदेव का स्टिंग ऑपरेशन चलाया है. सिर्फ इतना ही नहीं वह स्टिंग ऑपरेशन उनके अपने पत्रकार ने नहीं किया था. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक स्टोरी पर भरोसा करें तो जुदेव का स्टिंग कांग्रेस पार्टी का प्लांट था. ऐसे में स्टिंग ऑपरेशन को पत्रकारिता के एक औजार के रूप में खारिज करना दोहरेपन को उजागर करता है.”अतुल ने आगे जोड़ा, “ऐसे मौके आते हैं जब पत्रकारों के पास ख़बर को सामने लाने का कोई और विकल्प ही नहीं बचता. सिर्फ उन्हीं स्थितियों में स्टिंग ऑपरेशन को जायज माना जाना चाहिए.” पैनल के दोनों मेहमान इस राय से सहमत थे. कोई भी स्टिंग को पत्रकारिता के एक औजार के रूप में खारिज नहीं करता.बाकी विषयों पर विस्तार से सुनने के लिए पॉडकास्ट लिंक पर जाएं. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 22: स्टरलाइट कांड, कैराना उपचुनाव, बंगलुरु में विपक्ष का जमावड़ा व अन्य
Apr 14 2019 63 mins  
उत्तरा प्रदेश के कैराना में होने वाला लोकसभा का उपचुनाव, एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में लगा विपक्षी नेताओं का मजमा, तमिलनाडु के तूतीकोरिन इलाके में वेदांता के स्टरलाइट कॉपर प्लांट में मजदूरों पर की गई पुलिस की फायरिंग, म्यामांर में रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी द्वारा की गई हिंदुओं की हत्या पर आई एमनेस्टी इंटरनेशन की रिपोर्ट और सूचना प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर द्वारा शुरू किया गया फिटनेस संबंधी चैलेंज इस बार की चर्चा के मुख्य विषय रहे.चर्चा की विशिष्ट अतिथि रही राज्यसभा टीवी और एनडीटीवी की पूर्व एंकर और हिंद किसान चैनल की पत्रकार अमृता राय. साथ में न्यूज़लॉन्ड्री के मैनेजिंग एडिटर रमन किरपाल, और न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज फोन पर कैराना से कार्यक्रम में जुड़े. कार्यक्रम का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया.तमिलनाडु के तूतीकोरिन में स्थित वेदांता की स्टरलाइट तांबा फैक्ट्री का विरोध कर रहे ग्रामीणों पर की गई पुलिस फायरिंग में 11 लोगों की मौत पर विस्तार से बात हुई. शुरुआत में अतुल चौरसिया ने कहा, “यह विवाद स्टरलाइट के विस्तार की कार्रवाई से बढ़ा. यहां पहले से ही सालाना चार लाख टन तांबे का शोधन हो रहा है जिसे बढ़ाकर सालाना आठ लाख टन करने की हरी झंडी सरकार ने दे दी थी. इस पर वहां के ग्रामीणों ने विरोध करना शुरू किया. ग्रामीणों का आरोप है कि तूतीकोरिन इलाके में की पूरी आबोहवा जहरीली हो चुकी है. सांस लेना भी दूभर है. दूसरी तरफ अंडरग्राउंड जल के सभी स्रोत भी बुरी तरह से प्रदूषित हो चुके हैं.”इस पर अमृता राय ने विस्तार से अपनी बात रखते हुए कहा, “सबसे पहले 1992-93 में यह कारखाना महाराष्ट्र के रत्नागिरी में लगाने की कोशिश हुई थी जिसका बड़े पैमाने पर विरोध हुआ. आखिरकार 1993 में मजबूरन इसे तमिलनाडु में लगाया गया. जिस इलाके में यह कारखाना लगा हुआ है वहां हवा से लेकर पानी तक सब कुछ प्रदूषित हो गया है. हमने पाया कि 1994 में ही इस इलाके से सटे खेतों में काम करने वाली महिलाएं बीमार होकर गिर गई थीं. न्यूज़मिनट की एक ख़बर में मैंने पढ़ा कि शुरुआत में इस फैक्ट्री को सालाना 70,000 हजार टन तांबा शोधन करने की अनुमति थी. लेकिन शुरू से ही इसमें निर्धारित सीमा से ज्यादा तांबे का शोधन होता रहा. अब इस इलाके में लोगों के बीमार होने, जल प्रदूषण के 25 से ज्यादा वाकए हो चुक हैं. टीवी पर एक रिपोर्ट में देखा कि एक आदमी के फेफड़े पूरी तरह से सूख गए हैं, एक छोटी बच्ची थी जिसके सिर से बाल उड़ गए थे. ये तो कुछेक घटनाएं थी जो हम जानते हैं. इस इलाके में इस तरह के अनगिनत पीड़ित होंगे.”वो आगे कहती हैं, “शुरुआत से ही इस कारखाने का बुरा अअसर लोगों के ऊपर दिखने लगा था, इसके बावजूद यह चलता रहा. बीच में 2013 में ऐसी भी स्थिति आई जब फैक्ट्री में रिसाव हुआ और बड़े पैमाने पर लोग बीमार हो गए, तब इस फैक्ट्री को बंद करना पड़ा था. लेकिन बाद में कानूनी दांवपेंच में उलझा कर इसे फिर से शुरू कर दिया गया. यह भी अपने आप में चिंताजनक है कि लोग वहां पिछले 100 दिनों से विरोध कर रहे थे. यहां मीडिया के ऊपर भी सवाल खड़े होते हैं. क्यों यह मुद्दा पहले चर्चा में नहीं आया.”रमन किरपाल ने पुलिस की कार्रवाई और सिस्टम के कामकाज पर रोशनी डाली. उन्होंने कहा, “वेदांता कंपनी किस-किस को चंदा देती है. इसमें भाजपा भी है, कांग्रेस भी है. इस तरह से यह एक पूरा नेक्सस बन जाता है. यह एक संगठित सिस्टम है जो कभी रुकता नहीं. दूसरी बात पुलिस रूल में साफ-साफ लिखा है कि उसे बहुत दर्लभ मौकों पर ही गोली चलानी है. वो भी हमेशा कमर के नीचे. फिर भी पुलिस नहीं मानी. आप कश्मीर में पैलेट गन का इस्तेमाल करते हैं, यहां क्यों नहीं कर सकते.”अपना एक संस्मरण सुनाते हुए रमन ने कहा, “1994 के मुजफ्फरनगर चौराहा हत्याकांड में आरोपी आईएएस अधिकारी को सीबीआई जांच से बचाने के लिए खुद मुलायम सिंह यादव ने अंड़गा लगाया और उसके खिलाफ जांच का आदेश नहीं दिया. हमारे देश का सिस्टम ही ऐसा है कि यहां एक हद से ज्यादा कुछ होता नहीं है.” See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 21- कर्नाटक का उहापोह, वाराणसी पुल हादसा, असम का एनआरसी व अन्य
Apr 14 2019 86 mins  
कर्नाटक में चुनाव नतीजों के बाद जारी दांव-पेंच, सुनंदा पुष्कर की मौत में शशि थरूर का पुलिस चार्जशीट में नाम, बनारस में फ्लाईओवर ढहना, गुड़गांव में सार्वजनिक स्थल पर नमाज़ के खिलाफ हिंदुत्वादी समूहों का विरोध, असम का नेशनल रजिस्टर सिटीजन बिल व अन्य मुद्दे इस हफ्ते चर्चा के प्रमुख विषय रहे.चर्चा के विशिष्ट अतिथि रहे वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, ओपिनियन राइटर आनंद वर्धन और न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज. कार्यक्रम का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 20: कर्नाटक चुनाव, जिन्ना विवाद, प्रेस फ्रीडम व अन्य
Apr 14 2019 70 mins  
कर्नाटक चुनाव, प्रेस फ्रीडम में खिसकता भारत, बिहार के जहानाबाद में लड़की से छेड़छाड़ की घटना, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर पर विवाद, न्यूज़ 18 के एंकर सुमित अवस्थी का पैनलिस्ट पर हाथ चलाना रहे इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के मुख्य विषय.चर्चा के विशिष्ट थे इंडिया न्यूज़ के डिप्टी एडिटर सुशांत सिन्हा और न्यूज़लॉन्ड्री के ओपिनियन राइटर आनंद वर्धन. कर्नाटक से फोन लाइन पर जुड़े न्यूज़लॉन्ड्री के संवाददाता अमित भारद्वाज. चर्चा का संचालन किया न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.


एपिसोड 19: आसाराम, सरोज खान का बयान, महाभियोग व अन्य
Apr 14 2019 82 mins  
आसाराम को आजीवन कारावास, सरोज खान का कास्टिंग काउच को लेकर विवादित बयान, कर्नाटक चुनाव में रेड्डी बंधुओं को भाजपा का उम्मीदवार बनाया जाना, मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग के निहितार्थ और संजय दत्त के जीवन पर बन रही फिल्म का ट्रेलर इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के मुख्य विषय रहे.चर्चा में इस बार दो मेहमान शामिल हुए. वरिष्ठ फिल्म समीक्षक और पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज और भारतीय जन संचार संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर आनंद प्रधान. इसके अलावा न्यूज़लॉन्ड्री के संवाददाता अमित भारद्वाज और कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया भी चर्चा का हिस्सा रहे. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 18: मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग प्रस्ताव, असीमानंद की रिहाई व अन्य
Apr 14 2019 90 mins  
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ सात विपक्षी दलों द्वारा महाभियोग लाने का प्रस्ताव, जज लोया की संदिग्ध मौत की जांच की मांग वाली याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किया जाना, प्रधानमंत्री का विदेश दौरा और वेस्टमिंस्टर सेंट्रल हॉल में उनका साक्षात्कार और मक्का मस्जिद केस के आरोपी असीमानंद समेत सभी आरोपियों को कोर्ट द्वारा बरी किया जाना इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के प्रमुख विषय रहे.चर्चा में शामिल रहे ओपिनियन राइटर आनंद वर्धन, कैच न्यूज़ के असिस्टेंट एडिटर चारू कार्तिकेय और संवाददाता अमित भारद्वाज. चर्चा का संचालन न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने किया. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 17: बलात्कार पर सरकार की चुप्पी, उपवास 'उत्सव', जुकरबर्ग व अन्य
Apr 14 2019 75 mins  
जम्मू-कश्मीर कठुआ और यूपी के उन्नाव में बलात्कार की घटना और आरोपियों को सत्ता का संरक्षण, पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनावों के स्थगित किए जाने की मांग को लेकर हिंसा, राहुल गांधी और प्रधानमंत्री का उपवास, डेटा लीक के मामले में फेसबुक मखिया मार्क जुकरबर्ग की कांग्रेस में पेशी, कुमार विश्वास को आम आदमी पार्टी के राजस्थान प्रभारी से हटाया जाना व अन्य मुद्दे इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के प्रमुख विषय रहे.चर्चा में शामिल रहे वरिष्ठ पत्रकार जितेन्द्र कुमार, न्यूज़ नेशन के अभिषेक पराशर और न्यूज़लॉन्ड्री संवाददाता अमित भारद्वाज. चर्चा का संचालन किया न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया ने. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.









एपिसोड 9: पीएनबी फ्रॉड, रफेल डील, आप के तीन साल और अन्य
Apr 11 2019 73 mins  
पीएनबी घोटाला और उसमें नीरव मोदी की संलिप्तता, रफेल डील पर सवालिया निशान, फिलीस्तीन में प्रधानमंत्री मोदी के घोषणाओं की चर्चा, आम आदमी पार्टी के तीन साल, जेएनयू में एटेंडेंस को लेकर वीसी और छात्रों में तनातनी, अंकित सक्सेना की हत्या पर जेएनयू छात्रसंघ की पूर्व उपाध्यक्ष और आजतक एंकर अंजना ओम कश्यप का फर्जी ट्वीट को कार्यक्रम का आधार बनाना, रहे इस हफ्ते न्यूज़लॉन्ड्री चर्चा के अहम विषय.चर्चा में शामिल रहे न्यूज़लॉन्ड्री संपादक अतुल चौरसिया, वरिष्ठ पत्रकार अजित शाही, ओपिनियन राइटर आनंद वर्धन और संवाददाता अमित भारद्वाज. See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.

एपिसोड 8: प्रधानमंत्री का संसद में बयान, झोलाछाप डॉक्टर की करतूत, मालदीव संकट व अन्य
Apr 11 2019 74 mins  
संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बयान, उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में एक झोलाछाप डॉक्टर द्वारा करीब 40 लोगों को एचआईवी से संक्रमित करने का मामला, भाजपा सांसद विनय कटियार द्वारा मुसलमानों के खिलाफ दिया गया बयान, राज्यसभा में नेता विपक्ष गुलाम नबी आज़ाद का यह कहना कि राज्यसभा टीवी को भाजपा टीवी बनाने की कोशिश हो रही है और साथ में भारत के दक्षिण-पश्चिमी पड़ोसी मालदीव में फिर से पैदा हुआ राजनीतिक संकट इस बार की चर्चा के मुख्य विषय रहे.चर्चा में इस बार अतुल चौरसिया, आनंद वर्धन और अमित भारद्वाज के साथ एनडीटीवी के एडिटर न्यूज़ प्रियदर्शन बतौर मेहमान शामिल हुए.झोलाछाप डॉक्टर की करतूत को देश की लचर और जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था का नतीजा बताते हुए प्रियदर्शन ने कहा, “दरअसल इस समस्या की जड़ ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर मौजूद घनघोर गरीबी है. संसाधनों के अभाव में लोग इस तरह के झोलाछाप चिकित्सकों के पास इलाज कराने के लिए मजबूर हैं. देश के किसी भी जिले के सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में जाकर देखा जा सकता है वहां, स्वच्छता की बजाय नरक का साम्राज्य दिखेगा. 20-30 साल पहले तक यही चिकित्सालय बेहतर तरीके से काम करते थे. दिनोंदिन इनकी दशा बदतर हुई है.”आनंद ने विनय कटियार के बयान पर कहा कि ये मौजूदा सरकार के फुट सोल्जर्स हैं, जिन्हें ज्यादा तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए. संभव है कि चर्चा में आने के लिए हताशा में भी वे इस तरह के बयान दे रहे हों.अमित भारद्वाज ने प्रधानमंत्री के लोकसभा और राज्यसभा में दिए गए भाषण में की गई कुछ दिलचस्प तथ्यात्मक गलतियों की ओर ध्यान दिलाया. मसलन बैंकों के एनपीए के आंकड़े को उन्होंने पूर्ववर्ती सरकार की नाकामी से जोड़ा जो कि असल में एनपीए के आंकड़े न होकर कुल लोन की मात्रा थी.इस पर आनंद वर्धन का तर्क था कि अक्सर कुछ नेता सरकारी बाबुओं के ऊपर जरूरत से ज्यादा निर्भर होने के कारण ऐसी गलती करते हैं. इस मामले में भी लगता है कि जिस अधिकारी ने मोदीजी को आंकड़े उपलब्ध करवाए उसने जिम्मेदारी से अपना काम नहीं किया.न्यूज़लॉन्ड्री के कार्यकारी संपादक अतुल चौरसिया के मुताबिक वर्तमान प्रधानमंत्री द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर किया गया हमला उनके पद की गरिमा के अनुरूप नहीं था. अतुल कहते हैं, “भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दो महान नेताओं को उनकी मौत की आधी सदी बाद इस तरह से आमने-सामने खड़ा करना एक प्रधानमंत्री को शोभा नहीं देता. आज से 50 साल बाद परिस्थितियों को समग्रता से रखे बेगैर कोई कहे कि मोदी ने आडवाणी का मौका छीन लिया, तो ठीक नहीं होगा. प्रधानमंत्री स्वस्थ नजीर स्थापित नहीं कर रहे हैं.” See acast.com/privacy for privacy and opt-out information.









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